आनुवंशिक और दुर्लभ रोगों में प्रारंभिक पहचान से लेकर वहनीय उपचार पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत : डॉ. जितेंद्र

हैदराबाद, केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने बीआरआईसी-डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एंड डायग्नोस्टिक्स सेंटर (सीडीएफडी) हैदराबाद में नेशनल स्किल डेवलपमेंट सेंटर-समर्थ का शिलान्यास तथा आइडिया-एनए ब्रिक-सीडीएफडी टेक्नोलॉजी इंक्यूबेटर का उद्घाटन किया। अवसर पर उन्होंने कहा कि भारत को आनुवंशिक और दुर्लभ रोगों में प्रारंभिक पहचान से लेकर वहनीयता और व्यक्तिगत उपचार पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। भारत की लगभग 70 प्रतिशत आबादी 40 वर्ष से कम आयु को देखते हुए प्रारंभिक निदान और रोकथाम के माध्यम से स्वास्थ्य में निवेश एक राष्ट्रीय अनिवार्यता है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि सरकार जैव प्रौद्योगिकी और निवारक स्वास्थ्य सेवा को प्राथमिकता दे रही है। भारत अब जीनोमिक्स, जैव प्रौद्योगिकी और निवारक स्वास्थ्य सेवा के माध्यम से जटिल स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना करने के लिए वैज्ञानिक और आर्थिक रूप से सक्षम बन रहा है। उन्होंने कहा कि पूर्व के दशकों में देश संक्रामक रोगों से जूझ रहा था, पर अब देश स्वास्थ्य रक्षा के भविष्योन्मुखी चरण में प्रवेश कर चुका है, जहां आणविक निदान, जीनोम सीक्वेंसिंग, हेमोफीलिया और व्यक्तिगत चिकित्सा स्वास्थ्य सेवा का केंद्र बन रही हैं।

यह प्रयास स्वास्थ्य प्रणाली को व्यक्तिगत उपचार के युग के लिए तैयार कर रहे हैं, जहां समान स्थितियों वाले रोगी अलग-अलग चिकित्सकीय दृष्टिकोणों की आवश्यकता रख सकते हैं। डॉ. जितेंद्र सिंह ने सरकार की नीतिगत दिशा को रेखांकित करते हुए कहा कि जैव प्रौद्योगिकी और स्वास्थ्य को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अभूतपूर्व प्राथमिकता मिली है। दुर्लभ रोगों के मुद्दे का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि 2021 में भारत की पहली राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति का परिचय सरकार के दृष्टिकोण में बड़ा बदलाव था।

जैव प्रौद्योगिकी और स्टार्टअप्स से भारत की वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा

जितेंद्र सिंह ने कहा कि रोग पहचान केवल पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रभावित परिवारों के लिए निरंतर उपचार को भी किफायती बनाना चाहिए। उन्होंने सरकार द्वारा प्रोत्साहित एकीकृत स्वास्थ्य मॉडल के बारे में भी बात की, जिसमें आयुष मंत्रालय के माध्यम से पारंपरिक प्रणालियों का संस्थाकरण और योग को निवारक स्वास्थ्य उपकरण के रूप में वैश्विक मान्यता शामिल है। उन्होंने कहा कि कल्याणकारी प्रथाओं का आधुनिक चिकित्सा के साथ साक्ष्य आधारित एकीकरण जीवनशैली और चयापचय विकारों के प्रबंधन में सकारात्मक परिणाम का परिचायक है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने सीडीएफडी में चल रहे अनुसंधान और नवाचार गतिविधियों की समीक्षा करते हुए जीनोम सीक्वेंसिंग कार्यक्रमों तथा जन जागरूकता के उद्देश्य से आउटरीच प्रयासों जैसे पहल की सराहना की। उन्होंने कहा कि विज्ञान को नागरिकों, विशेष रूप से युवाओं के लिए सुलभ भाषा में संप्रेषित करना जैव प्रौद्योगिकी में विश्वास और रुचि निर्माण के लिए आवश्यक है।

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भारत की बढ़ती जैव-आर्थिक स्थिति को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि वर्षों में बायोटेक स्टार्टअप्स की संख्या कई गुना बढ़ गई है। साथ ही इस क्षेत्र का अर्थव्यवस्था में योगदान भी तेजी से बढ़ा है। टीकों और निवारक स्वास्थ्य सेवा में भारत के नेतृत्व को भी रेखांकित करते हुए कहा कि स्वदेशी नवाचार अब वैश्विक रूप से साझा किए जा रहे हैं, जो देश की वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा में भूमिका को मजबूत कर रहे हैं। अंत में डॉ. जितेंद्र सिंह ने सीडीएफडी में हो रहे कार्य पर संतुष्टि व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे संस्थान एक स्वस्थ, मजबूत और भविष्य के लिए तैयार भारत का निर्माण करने में सार्थक योगदान दे रहे हैं।

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