वे जो उतरते हैं सीवर के नरक में…

सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री द्वारा हाल ही में राज्यसभा में प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार, पिछले 31 वर्षों में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान 1,248 लोगों की जान गई है। इनमें सबसे अधिक मौतें तमिलनाडु (253), गुजरात (183), उत्तर प्रदेश (133) और दिल्ली (116) में हुई हैं।

मतलब साफ है कि भारत में मैनुअल सीवर सफाई पर कानूनी प्रतिबंध के बावजूद, इस खतरनाक प्रथा के कारण होने वाली मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। यह स्थिति तब है जब भारत में 1993 से मैनुअल स्कैवेंजिंग और सीवरों की मैनुअल सफाई पर प्रतिबंध लागू है।

इसके बाद, 2013 में मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोजगार का निषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम (पीईएमएसआर अधिनियम) लागू किया गया, जिसने इस प्रथा पर पूरी तरह से रोक लगा दी। यदि किसी मजदूर को परिस्थितिवश सीवर में उतरना ही पड़े, पड़ता है, तो उस वक़्त 27 कानूनी दिशानिर्देशों का पालन करना अनिवार्य है।

लेकिन यह दुर्भाग्य और शर्मिंदगी का विषय नहीं तो और क्या है कि आज भी अनेक सफाईकर्मियों को सीवर के नरक में असुरक्षित उतरना पड़ता है? सामाजिक न्याय और मानवाधिकार की सब दुहाइयाँ धरी रह जाती हैं! और मैनुअल सीवर सफाई के दौरान होने वाली मौतों की घटनाएँ लगातार सामने आती रहती हैं।

देश की राजधानी तक में सीवर की सफाई के दौरान मजदूरों की मौत की खबरें इस बात का प्रमाण है कि प्रतिबंध और सुरक्षा उपायों के बावजूद, जमीनी हकीकत में कोई खास बदलाव नहीं आया है। ग़ौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि सीवर सफाई के दौरान मौत होने पर पीड़ित के परिजनों को 30 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए।

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मैनुअल सीवर सफाई रोकने के लिए सख्त कदम जरूरी

इसके बावजूद, कई मामलों में मुआवजा राशि कम दी जाती है, जो न्यायालय के निर्देशों का उल्लंघन है।
इन घटनाओं के पीछे कई वजहें हैं। पहली, कानून के बावजूद, मैनुअल सीवर सफाई जारी है, जो मजदूरों की जान के लिए खतरा बनती है।

दूसरी, सुरक्षा उपकरणों की कमी और उचित प्रशिक्षण का अभाव मजदूरों की मौत की अहम वजह है। तीसरी, संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों की लापरवाही और जवाबदेही की कमी भी इन मौतों के लिए जिम्मेदार है। इस समस्या के समाधान के लिए ठोस कदम उठाने की ज़रूरत है। मैनुअल सीवर सफाई पर पूर्ण प्रतिबंध को सख्ती से लागू किया जाए और उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।

सीवर सफाई के लिए आधुनिक मशीनों और तकनीकों का उपयोग बढ़ाया जाए, जिससे मजदूरों की जान जोखिम में न पड़े। साथ ही, मजदूरों को उचित सुरक्षा उपकरण और प्रशिक्षण प्रदान किया जाए, ताकि वे सुरक्षित रूप से काम कर सकें। इसके अलावा, समाज में जागरूकता फैलाना भी बेहद अहम है। मैनुअल स्कैवेंजिंग एक अमानवीय प्रथा है, जो हमारे समाज के कमजोर वर्गों को प्रभावित करती है।

इस प्रथा को समाप्त करने के लिए समाज के सभी वर्गों को मिलकर प्रयास करना होगा। सरकार को भी इस दिशा में ठोस नीतियाँ बनानी होंगी। मैनुअल स्कैवेंजर्स के पुनर्वास के लिए प्रभावी कार्पाम चलाए जाएँ, ताकि वे इस खतरनाक काम को छोड़कर सुरक्षित और सम्मानजनक रोजगार प्राप्त कर सकें।

साथ ही, सीवर प्रणाली के आधुनिकीकरण पर जोर दिया जाए, ताकि मैनुअल सफाई की ज़रूरत ही न पड़े। वरना जब तक यह अमानवीय प्रथा विद्यमान है, तब तक एक सभ्य और सुरक्षित समाज होने का हमारा दावा खोखला है!

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