जब युद्धवीरजी के सामने मौन हो गये रफी साहब
हैदराबाद में हिन्दी मिलाप की स्थापना के 75 साल पूरे होने के उत्सव के बीच उन परंपराओं को भी याद किया जा रहा है, जिनकी मिलाप ने शुरुआत की थी। यहाँ साहित्य और संस्कृति की रक्षा को प्राथमिकता देते हुए साहित्यकारों और कलाकारों को हमेशा प्रोत्साहित किया गया। मिलाप द्वारा शुरू की गयी कलाकारों और साहित्यकारों के सचित्र प्रकाशन की परंपरा काफी लोकप्रिय रही।
मिलाप के संस्थापक एवं स्वतंत्रता सेनानी युद्धवीरजी कलाकारों को प्रोत्साहित करने के लिए सदा तत्पर रहते। इसी उद्देश्य से उन्होंने बैसाखी मेलों का आयोजन शुरू किया। देश भर से कलाकारों को आमंत्रित किया जाने लगा। स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर के कलाकार जब नुमाइश मैदान में आयोजित बैसाखी मेले में रंगारंग सांस्कृतिक छंटाए बिखेरते, तो वह दृश्य देखते ही बनता था। एक बार की घटना है कि युद्धवीरजी ने विख्यात गायक कलाकार मुहम्मद रफी साहब को बैसाखी मेले में आमंत्रित किया।
लोगों को विश्वास नहीं था कि वे आएंगे, लेकिन रफी साहब न केवल आये, बल्कि मंच पर जमकर गीतों की प्रस्तुति भी दी। कार्यक्रम के दौरान युद्धवीरजी विशेष पंजाबी वेशभूषा में मंच पर आये और कहा कि राष्ट्रीय एकता के प्रतीक इस महान कलाकार की कला का मूल्य कौन आंक सकता है। यह कहते हुए कि .. अपनी प्रतिष्ठा प्रेम का प्रतीक उन्हें समर्पित करते हैं.. युद्धवीरजी ने अपनी पगड़ी उतारकर रफी साहब को पहना दी।
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युद्धवीरजी के इस अंदाज से रफी साहब इतने भावुक हो गये कि उनके मुँह से कोई बोल नहीं निकल पा रहा था। कुछ देर के अविस्मरणीय मौन के बाद रफी साहब ने कहा, आज मैं पूरी तरह से बिक गया। आज मुझे जो मिला है, वह कोई और क्या देगा?.. उसके बाद फिर क्या था, घंटों उनके गीतों का सिलसिला चलता रहा।
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