मतदाता सूची की खामियों को कौन करेगा दूर?  

मतदाता सूची संबंधी विसंगतियों का सवाल कोई नई बात नहीं है। हां, इतना जरूर है कि नेताओं द्वारा समय-समय पर इसे उठाते रहने का अंदाज बिल्कुल बदल जाता है। जब कोई नेता सत्ता में होते हैं तो वोटर लिस्ट पर कुछ बोलते हैं और वही नेता जब विपक्ष में चले जाते हैं तो अपने ही पुराने स्टैंड के ठीक उलट बोलते हैं। इससे यह मुद्दा भी दिनोंदिन उलझता चला जा रहा है। इसलिए हर किसी के जेहन में सिर्फ यही सवाल उठेगा कि आखिर वोटर लिस्ट से जुड़ी आशंकाओं का समुचित समाधान क्या है? आखिर मतदाता सूची की खामियों को कौन और कैसे दूर करेगा? यक्ष प्रश्न है।

आपने देखा, सुना या भुगता होगा कि जब कोई व्यक्ति अपना वोट डालने अपने मतदान केंद्र पर जाता है तो उसका नाम ही मतदाता सूची से गायब मिलता है। कभी-कभी तो अधिकारी या नेता यह भी बताते हैं कि लोकसभा-विधानसभा चुनाव के लिए अलग वोटर लिस्ट बनती है और स्थानीय निकाय के चुनावों के लिए अलग। ऐसे में बहुत लोगों का नाम तो दोनों सूची में मिलता है जबकि कुछ के नाम किसी एक सूची से नदारद होता है। यह बहुत बड़ा गड़बड़झाला है। इसे अविलंब रोकने की जरूरत है।

मतदाता सूची में नाम जुड़वाने और कटवाने की गंभीर शिकायतें

इसके अलावा एक ही मतदाता का दो बार नाम होना, दो अलग-अलग मतदान केंद्रों पर नाम होना, निकटतम मतदान केंद्र से नाम काटकर दूर के मतदान केंद्र पर जोड़ देना आदि आम शिकायत मिलती रहती है। वहीं, सर्वाधिक गंभीर आरोप यह है कि मतदाता सूची में सत्ताधारी नेताओं के इशारे पर किसी के नाम कटवाए जाते हैं तो किसी के नाम जोड़वाये जाते हैं।

आप यह देखकर हैरत में पड़ जाएंगे कि जिस व्यक्ति का नाम राजस्व रिकार्ड में है, जो व्यक्ति बैंक या डाकघर खाताधारक है, जो व्यक्ति रेंट पर सालों से क्षेत्र विशेष में रह रहा है, जो व्यक्ति वर्षों से क्षेत्र विशेष में कार्यरत है, उसके नाम तक गायब रहते हैं। वहीं, मृतकों के नाम भी चलते रहते हैं। कहीं-कहीं तो विवाहित वधुओं के नाम सालों तक नहीं जुड़ते।

वोटर लिस्ट में हेर-फेर पर संसद में हंगामा और बहस

यही हाल 18 साल की उम्र हासिल कर चुके बहुतेरे युवाओं का है। यदि इस लापरवाही के लिए अधिकारियों की जिम्मेदारी और जुर्माना फिक्स कर दिया जाए तो ये लापरवाही थम सकती है।यही कारण है कि हाल ही में बजट सत्र 2025 की दूसरी पारी के पहले दिन ही संसद में वोटर लिस्ट के मुद्दे पर जमकर हंगामा हुआ।

लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने इस मुद्दे पर चर्चा की मांग की लेकिन राज्यसभा में तत्काल चर्चा का नोटिस खारिज होने के बाद समूचे विपक्ष ने जमकर हंगामा किया। कुछ समय बाद सदन से वॉकआउट भी कर दिया। उधर जेपी नड्डा ने वॉकआउट को गैर-जिम्मेदाराना बताया।

बता दें कि विपक्षी दलों ने महाराष्ट्र, हरियाणा और पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में वोटर लिस्ट तथा मतदाता पहचान पत्र में कथित हेर-फेर की शिकायतों का दावा करते हुए सत्रावकाश के बाद शुरू हुए बजट सत्र के पहले ही दिन आक्रामक तरीके से इसे उठाते हुए संसद में इस पर बहस की मांग की है।

लोकसभा में शून्यकाल के दौरान तृणमूल कांग्रेस के सौगत रॉय ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा राज्य के मुर्शिदाबाद और बर्धमान संसदीय क्षेत्रों और हरियाणा में समान नंबर के ईपीआईसी मौजूद होने के दावे को उठाते हुए कहा कि चुनाव आयोग को देश को यह जवाब देना चाहिए कि मतदाता सूचियों में यह गलतियां क्यों हुईं जबकि वोटर लिस्ट में खामियों का मसला महाराष्ट्र और हरियाणा में आया तो इस पर ध्यान दिलाया गया।

वोटर लिस्ट में गड़बड़ी पर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया

टीएमसी सांसद के मुद्दा उठाने के बाद राहुल गांधी ने विपक्ष की ओर से स्पीकर के समक्ष चर्चा की मांग रखी। इसके बाद शून्यकाल में टीएमसी के कल्याण बनर्जी ने बंगाल में मतदाताओं की संख्या में वृद्धि का दावा करते हुए आरोप लगाया कि गुजरात और हरियाणा से इन्हें लाया जा रहा है जो बर्दाश्त करने लायक नहीं है। उन्होंने कहा कि आयोग चाहे दावे करे मगर स्पष्ट है कि पिछले कुछ सालों में कोई निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव नहीं हुआ है और उचित काम नहीं करने के लिए चुनाव आयोग के खिलाफ कार्यवाही की जानी चाहिए।  

वहीं, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री सदन के नेता जेपी नड्डा ने वॉकआउट को गैर-जिम्मेदाराना बताते हुए विपक्षी सांसदों को संसदीय नियमों का रिफ्रेशर कोर्स करने की नसीहत दी और आरोप लगाया कि 267 के तहत नोटिस देकर संसद और लोकतंत्र को बदनाम करने की कोशिश हो रही है। सरकार किसी भी मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है मगर विपक्ष की बहस में दिलचस्पी नहीं।

हालांकि सुलगता सवाल यह भी है कि चुनाव के समय ही वोटर लिस्ट में गड़बड़ी की शिकायत क्यों आती है? इससे पहले संबंधित नेता या मतदाता क्या करते हैं क्योंकि चुनाव आयोग ने 2025 के लिए जो स्पेशल समरी रिवीजन रिपोर्ट जारी की है, उसके मुताबिक मतदाता सूची के सालाना पुनरीक्षण के दौरान केवल महाराष्ट्र से शिकायतें मिलीं। बाकी किसी राज्य से मतदाता सूची में गड़बड़ी के एक भी मामले सामने नहीं लाए गए।  

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मतदाता सूची पुनरीक्षण में राजनीतिक दलों की भूमिका

यक्ष प्रश्न है कि मतदाता सूची में गड़बड़ी को लेकर राजनीतिक दलों की ओर से जिस तरह चुनाव के समय हो-हल्ला खड़ा किया जाता है लेकिन अगर वे हर साल मतदाता सूची में होने वाले पुनरीक्षण के समय तत्परता दिखाएं तो शायद इनमें गड़बड़ी रह ही न पाए हालांकि ऐसा होता नहीं। आलम यह है कि राजनीतिक दलों की मौजूदगी में कई महीने तक चलने वाली इस प्रािढया में उनकी ओर से गड़बड़ी का एक भी मामला सामने नहीं आता ।  

मसलन, चुनाव आयोग ने एसएसआर (स्पेशल समरी रिवीजन) 2025 को लेकर ऐसी ही जानकारी साझा की है। उसमें दो टूक शब्दों में बताया गया है कि महाराष्ट्र को छोड़कर किसी भी राज्य से कोई शिकायत जिला निर्वाचन अधिकारी (डीईओ) स्तर पर भी नहीं मिली है। वहीं, बंगाल से पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान भी मतदाता सूची में गड़बड़ी को लेकर जिस तरह से मामले को गरमाया गया, उसके बाद चुनाव आयोग ने पूरी स्थिति साफ की है।

आयोग के मुताबिक जनवरी 2025 में अंतिम रूप दी गई मतदाता सूची के सालाना पुनरीक्षण के लिए सात अगस्त 2024 को अधिसूचना जारी की गई थी। इस दौरान प्रत्येक मतदान केंद्र पर बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) के साथ राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंट (बीएलए) की तैनाती की गई थी। बता दें कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण हर साल होता है।

लोकतंत्र और चुनाव प्रक्रिया में नेताओं का प्रभाव

बीते वर्ष इनमें 89 को जिला निर्वाचन अधिकारी के स्तर पर ही निपटा दिया गया, जबकि एक शिकायत बाद में राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) तक पहुंची थी। सुनवाई के बाद उसे भी निपटा दिया गया। बाकी किसी राज्य से मतदाता सूची में गड़बड़ी का एक भी मामला सामने नहीं लाया गया। जबकि देशभर में इसे लेकर बूथ स्तर पर व्यापक अभियान चलाया जाता है जिसमें मतदाता की मौत होने या फिर एक जगह से दूसरी जगह पर उनके शिफ्ट होने पर मतदाता सूची से उनके नाम हटाए जाते हैं।

यह प्रक्रिया सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में की जाती है। हालांकि, आम तौर पर चर्चा यही रहती है कि इस दौरान भी महज खाना-पूर्ति ही की जाती है। प्राय बीएलओ मतदान केंद्रों से गायब रहते या कुछ घण्टे में औपचारिकता पूरी करके चले जाते हैं । ऐसे आंकड़ों पर भरोसा करना वाकई हैरतअंगेज है।  

किसी भी देश में लोकतंत्र की सफलता वहां के नेताओं की नेकनीयती पर ही निर्भर करती है क्योंकि वहां के जम्बोजेट प्रशासनिक अधिकारियों की फौज पर नियंत्रण प्राय सत्ताधारी नेताओं का ही होता है। हमारे चतुर राजनेतागण यदि दूरगामी सियासी हितों की पूर्ति के लिए विपक्ष को भी साध कर चलें तो सोने पर सुहागा, यानी चित्त भी उनकी और पट्ट भी उन्हीं जैसों की, क्योंकि सत्ता पक्ष और विपक्ष की कुर्सियां तो प्राय उन्हीं के बीच बदलती रहती हैं। यही वजह है कि पूरे प्रशासन पर कभी प्रत्यक्ष रूप से तो कभी अप्रत्यक्ष/परोक्ष रूप से उन्हीं लोगों का पूरा नियंत्रण होता है।

-(कमलेश पांडेय)   

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