सुरक्षित कार्यस्थल व स्वस्थ कर्मचारी से समृद्ध होगा राष्ट्र

प्रतिवर्ष 28 अप्रैल को अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आइएलओ) द्वारा विश्व कार्यस्थल सुरक्षा एवं स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। वास्तव में, इस दिवस का मुख्य उद्देश्य कार्यस्थलों पर काम करने वालों की उचित सुरक्षा, उनके बेहतर स्वास्थ्य तथा दुर्घटनाओं की रोकथाम के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। यह दिवस हमें यह याद दिलाता है कि सुरक्षित कार्यस्थल केवल कर्मचारियों का अधिकार ही नहीं, बल्कि उत्पादकता (प्रोडेक्टीविटी) बढ़ाने और समाज तथा राष्ट्र के आर्थिक विकास के लिए भी अनिवार्य है।

सच तो यह है कि कोई भी काम किसी व्यक्ति की जान या उसके स्वास्थ्य से बड़ा नहीं हो सकता। स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है। हमारे यहां कहा भी गया है कि-पहला सुख निरोगी काया। दुनिया की तमाम धन-दौलत, ऊंचे पद और सुख-सुविधाएं, विलासिता सबकुछ व्यर्थ हैं, यदि मनुष्य का शरीर ही स्वस्थ न हो। हमें यह याद रखना चाहिए कि स्वस्थ मस्तिष्क ही हमारी रचनात्मक सोच का आधार है और मस्तिष्क व शरीर स्वस्थ होगा तभी कोई मनुष्य कठिन परिश्रम कर सकता है।

सच तो यह है कि जब हम स्वस्थ और सुरक्षित होते हैं, तब अधिक रचनात्मक, अधिक उत्पादक बनते हैं और जीवन में सफलता का आधार तैयार करते हैं। स्वस्थ रहकर हम न केवल अपने जीवन का असली आनंद लेते हैं, बल्कि अपनी आर्थिक स्थिति को भी सुरक्षित रख सकते हैं। आपको बताता चलूं कि अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन विश्वभर में विभिन्न श्रमिकों के अधिकारों तथा सुरक्षित कार्यस्थलों के लिए कार्य करता है।

हर वर्ष लाखों लोग कार्यस्थल हादसों के शिकार

आज पूरी दुनिया में हर वर्ष लाखों लोग कार्यस्थल दुर्घटनाओं या काम से जुड़ी अनेक बीमारियों व रोगों का शिकार होते हैं। विश्व कार्यस्थल सुरक्षा एवं स्वास्थ्य दिवस को मनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य कार्यस्थल दुर्घटनाओं को रोकना, व्यावसायिक रोगों से बचाव करना, कर्मचारियों के मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य की रक्षा करना तथा एक सुरक्षित, सुंदर व अच्छी कार्य संस्कृति विकसित करना है।

आपको बताता चलूं कि व्यावसायिक रोग वे रोग या बीमारियाँ हैं, जो किसी व्यक्ति को उसके काम, कार्यस्थल या पेशे की परिस्थितियों के कारण हो जाती हैं। अर्थात नौकरी या व्यवसाय से जुड़े वातावरण, रसायनों, धूल, शोर, तनाव, मशीनों या संक्रमण के कारण होने वाले रोग व्यावसायिक रोग कहलाते हैं। आज बहुत से लोग ऐसे कल-कारखानों में काम करते हैं, जहां उन्हें अनेक प्रकार की बीमारियां घेर लेती हैं।

उदाहरण के तौर पर पटाखों के कारखानों में जलने की दुर्घटनाएं, बारूद की गंध, धुएँ से आंखों व त्वचा के गंभीर और खतरनाक रोग तथा विस्फोट से चोट लगने की घटनाएं होती हैं। बीड़ी बनाने के उद्योगों में खांसी, अस्थमा, फेफड़ों की बीमारी, त्वचा एलर्जी तथा निकोटीन से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं होती हैं। रसायनों के कारखानों में सांस, त्वचा, आंखों, लीवर और फेफड़ों के रोगों का खतरा बना रहता है। इन उद्योगों में काम करने वाले श्रमिकों को व्यावसायिक रोगों का अधिक खतरा इसलिए रहता है।

लंबे समय तक बैठने से बढ़ती स्वास्थ्य समस्याएँ

कार्यालय कर्मियों में लंबे समय तक कंप्यूटर पर बैठने से गर्दन व कमर दर्द की समस्या होती है। अत्यधिक तनाव से मानसिक समस्याएँ, जैसे चिंता और अवसाद, बढ़ सकती हैं। अस्पताल कर्मियों में संक्रमण का खतरा बना रहता है, जैसे हेपेटाइटिस बी तथा कोविड। ऐसे उद्योगों और कार्यस्थलों पर काम करने वालों के लिए मास्क, दस्ताने, वेंटिलेशन, प्रशिक्षण, नियमित स्वास्थ्य जांच तथा सुरक्षा कानूनों का पालन अत्यंत आवश्यक है। इसी उद्देश्य से यह दिवस हर वर्ष मनाया जाता है।

हाल ही में तमिलनाडु के विरुधुनगर में पटाखा फैक्ट्री में भीषण विस्फोट हुआ, जिसमें 25 से अधिक लोगों की जान गई। इतना ही नहीं, केरल के त्रिशूर में भी एक अन्य पटाखा इकाई में विस्फोट से लगभग 13 श्रमिकों की मृत्यु हुई और कई घायल हुए।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसी साल यानी कि वर्ष 2026 में अमेरिका के वेस्ट वर्जीनिया स्थित एक रासायनिक संयंत्र में गैस रिसाव की घटना में 2 लोगों की मृत्यु और कई लोग प्रभावित हुए।

वास्तव में, इन सभी उक्त घटनाओं से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि औद्योगिक सुरक्षा नियमों की अनदेखी, प्रशिक्षण की कमी और आपातकालीन व्यवस्था का अभाव कार्यस्थल दुर्घटनाओं का प्रमुख कारण बनता है। यहां यह कहना ग़लत नहीं होगा कि यह दिवस केवल कारखानों तक सीमित नहीं है, बल्कि कार्यालयों, स्कूलों, अस्पतालों, निर्माण स्थलों, खेतों, दुकानों और ऑनलाइन कार्यस्थलों पर भी समान रूप से लागू होता है।

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विरुधुनगर में पटाखा फैक्ट्री में भीषण विस्फोट

हमें यह बात अपने मन में रखनी चाहिए कि यदि हमारे देश के कार्यस्थल सुरक्षित होंगे तो कर्मचारी सुरक्षित व स्वस्थ रहेंगे और यदि किसी देश के कर्मचारी स्वस्थ व सुरक्षित होंगे तो वह देश खुशहाली और उन्नयन की ओर अग्रसर होगा। शायद यही कारण है कि इस दिवस का नारा माना जाता है-सुरक्षित कार्यस्थल, स्वस्थ कर्मचारी, समृद्ध राष्ट्र। यदि इस दिवस के इतिहास की बात करें तो अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने वर्ष 2003 में इसे मनाना शुरू किया था।

इसका मकसद सुरक्षित काम को अंतरराष्ट्रीय एजेंडे में लाना था। उल्लेखनीय है कि 28 अप्रैल को वर्ष 1996 से ही ट्रेड यूनियन आंदोलन द्वारा मृत और घायल श्रमिकों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्मृति दिवस के रूप में भी मनाया जाता रहा है। वास्तव में, यह दिवस मृतकों के लिए शोक मनाता है और जीवितों के लिए लड़ता है और यही इसका मूल व अहम संदेश भी है। आज मानसिक स्वास्थ्य को भी पेशेवर स्वास्थ्य जोखिमों की श्रेणी में शामिल कर लिया गया है।

सुनील कुमार महला
सुनील कुमार महला

आज एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) और संचार क्रांति का युग है। अच्छी बात यह है कि रोबोट और एआई अब खतरनाक कार्यों, जैसे गहरी खदानों या जहरीली गैसों के बीच, इंसानों की जगह ले रहे हैं, जिससे मौतें कम हुई हैं। किन्तु इसका नकारात्मक पक्ष भी है। एआई की वजह से बढ़ती जॉब इनसिक्योरिटी अर्थात नौकरी जाने का डर श्रमिकों में नए प्रकार का मानसिक तनाव पैदा कर रही है। निष्कर्ष के रूप में वर्ष 2026 का यह दिवस हमें बताता है कि अब सुरक्षा का दायरा कारखाने की दीवारों से निकलकर कर्मचारी के मानसिक स्वास्थ्य और पर्यावरणीय चुनौतियों तक फैल चुका है।

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