युग दर्पण

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चाह खुशियों की थी उसने ग़म दिया।

और कहते हैं के हमने कम दिया।।

ख़्वाहिशें महकूँ बहारों की तरहा,

बेरहम ने ख़िज़ां का मौसम दिया।।

जो हँसा पल थे दिये मैंने उसे,

उसने तोहफ़े में मुझे मातम दिया।

लब को उसके, मुस्कुराहट दी सदा,

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मेरी आँखों के लिये कुछ नम दिया।

पास उसके लगता, कुछ था ही नहीं,

दर्द था मेरे लिए हरदम दिया।

बढ़ गई है उम्र ज़ख़्मों की ‘नरेन’

-नरेंद्र राय

बेवफा ने जबसे कुछ मरहम दिया।

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