सीप का मोती
सागर की गहराइयों में सीप चुपचाप रहती,
शांत, सहनशील हर दर्द वो सहती,
रेत का एक कण सीने में बरसों रहता,
पीड़ा को धैर्य में ढाल मोती बन चमकता।
हर दिन लहरें आतीं कभी प्यार से थपथपातीं,
कभी क्रूर थपेड़ों से सीने को चीर जातीं,
दर्द को ज़हर नहीं बना सीप हार नहीं मानती,
शांति से रेत के कण को परतों में है ढालती।
कोई देखे न संर्घष चमक सबको भाए,
सीप की खामोशी में ही मोती की पहचान समाए,
कितना अकेला होता होगा सीप का नन्हा मन,
दर्द को सहता तभी बनता है अनमोल धन।
सीप सिखाती है जीवन को दुःख से मत घबराना,
दर्द की गोद में ही सफलता का रत्न पाना,
सिखलाता है मोती तकलीफ बेकार नहीं होती,
सह कर संर्घष पाए उजला रंग सीप यही है कहती।
सीप ने सिखाया चुप रहना,
दर्द को दिल में भर हर ठोकर को सहना,
जो भीतर पीड़ा को सहेज लेता मुस्कान में,

वही सीप बनकर चमकता है जिंदगी के जहान में।।
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