मौत के साये में पीड़ाहरन की अग्रदूत – डॉ. गायत्री पालाट
सदियों के अंधेरे को चीरने के लिए रोशनी की एक छोटी-सी लकीर भी क्रांतिकारी परिवर्तन का काम करती है। फिर वह तो एक ऐसी ज्योति बनकर प्रज्ज्वलित हुईं, जिससे कई और दिये रोशन हुए और ज्योति से ज्योति जगाते चलने की एक नयी परंपरा का उदय हुआ। बात डॉ. गायत्री पालाट की है, जिन्होंने मानव धर्म को एक नया अर्थ प्रदान करते हुए उन लोगों की पीड़ा हरने के कर्म को एक अभियान का रूप दिया, जो खुली आँखों से अपनी मौत को क़रीब आते देख रहे हैं, जो असीम और अंतहीन पीड़ा से कराह रहे हैं। उन्होंने एक ऐसा तंत्र विकसित किया, जो सामान्य चिकित्सा के समानांतर दर्द निवारण का काम करे। आज जिसे पैलीएटिव केयर अर्थात दर्द निवारण एवं उपशामक चिकित्सा कहा जाता है, डॉ. गायत्री पालाट भारत में उसकी अग्रदूत बनकर उभरी हैं। उन्होंने पीड़ा हरने को ही अपने जीवन का मिशन बनाया है।
डॉ. गायत्री दक्कन प्रांत के सबसे बड़े सरकारी कैन्सर अस्पताल एमएनजे इंस्टीट्यूट ऑफ ऑन्कोलॉजी एवं रीजनल कैंसर सेंटर में पेन एंड पैलीएटिव मेडिसिन (दर्द निवारण एवं उपशामक चिकित्सा) विभाग की प्रोफेसर व प्रमुख तथा टू वर्ल्ड्स कैंसर कोलैबोरेशन, कनाडा की भारतीय निदेशक हैं।
वर्ष 2006 में वे इंटरनेशनल नेटवर्क ऑफ कैंसर ट्रीटमेंट एंड रिसर्च की ओर से प्रतिनिधि के रूप में एक वर्ष के लिए पैलीएटिव केयर की परियोजना पर हैदराबाद आई थीं, लेकिन फिर हैदराबाद को ही उन्होंने अपनी कर्मभूमि बना लिया। उन्होंने एमएनजे अस्पताल में आउटपेशेंट, इनपेशेंट, घरेलू देखभाल सेवाओं और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को विकसित कर पैलीएटिव केयर विभाग की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रारंभिक दिनों में उन्होंने एक एनेस्थेटिस्ट के रूप में प्रशिक्षण प्राप्त किया, पर कुछ ही दिनों में इस कार्य में वे दक्ष बन गयी थीं। उन्हें भारत के डिप्लोमेट ऑफ द नेशनल बोर्ड (एनेस्थिसियोलॉजी) से सम्मानित किया गया। वे पोस्ट ग्रैजुएशन के बाद असम और बाद में केरल में काम करने के दौरान मरीजों के दर्द निवारण के लिए किये जा रहे प्रयासों के संपर्क में आयीं। यही संपर्क उन्हें हैदराबाद ले आया और यहीं से उन्होंने तेलंगाना सहित भारत के विभिन्न राज्यों के साथ ही विश्व के कई देशों में पैलीएटिव केयर तंत्र स्थापित करने में प्रेरक और मार्गदर्शक की भूमिका निभाई।
डॉ. गायत्री ने इंस्टीट्यूट फॉर पैलीएटिव मेडिसिन, सैन डिएगो हॉस्पिस (अमेरिका) से इंटरनैशनल पैलीएटिव केयर लीडरशिप में डिप्लोमा भी प्राप्त किया है। राष्ट्रीय स्तर पर, उन्होंने सरकार और अन्य हितधारकों के साथ मिलकर दर्द निवारक दवाओं के नियमों में संशोधन करने में अग्रणी भूमिका निभाई। उन्हें जब महसूस हुआ कि यह कार्य केवल सरकारी स्तर पर पर्याप्त नहीं होगा, तो फिर बहुआयामी स्तर पर काम करने के लिए गैर सरकारी संस्था (एनजीओ) पेन रिलीफ एंड पैलीएटिव केयर सोसाइटी की स्थापना की।

वर्तमान में वह इस संस्था की कार्यकारी सचिव हैं, जो लाइफ एट योर डोरस्टेप नामक पहल के माध्यम से घरेलू पैलीएटिव केयर प्रदान करती है। इस संस्था के वालंटियर घर तक पहुँचकर न केवल मरीजों की देखभाल करतें हैं, बल्कि जन-वकालत और पैलीएटिव केयर में प्रशिक्षण प्रदान करने का कार्य भी संस्था द्वारा किया जाता है।
डॉ. पालाट ने इंडियन एसोसिएशन फॉर पैलीएटिव केयर सहित विभिन्न शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थानों के पाठ्यक्रम विकास में भी योगदान दिया है। उनकी इन्हीं सेवाओं के लिए उन्हें युद्धवीर फाउंडेशन के स्मारक पुरस्कार के लिए चुना गया है। इस क्रम में उनसे साक्षात्कार के दौरान जीवन और कार्य से जुड़े विभिन्न विषयों पर चर्चा हुई। यहाँ कुछ अंश प्रस्तुत हैं।
आपका बचपन कहाँ गुज़रा? स्कूली शिक्षा और चिकित्सक बनने की यात्रा कैसी रही?
मेरा जन्म तो केरल के पालघाट में 24 अत्तूबर 1968 को हुआ। चूँकि पिताजी सशस्त्र बलों में थे, तो जहाँ उनकी पोस्टिंग होती थी, वहाँ रहना पड़ता। इसलिए छात्रावस्था का अधिकतर हिस्सा उत्तर भारत और उत्तर-पूर्वी राज्यों में गुज़रा। आगरा और चंडीगढ़ के स्कूलों में शिक्षा प्राप्त की। घर में तो मलयाली बोलते थे, लेकिन बाहर की दुनिया में हिंदी ही संपर्क की भाषा थी। पिताजी का स्थानांतरण जब असम में हुआ तो वहीं डिब्रूगढ़ में देश के सबसे पुराने मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस में प्रवेश ले लिया।
सुना है कि आप पायलट बनना चाहती थीं, उस सपने का क्या हुआ?
पिताजी चूंकि एयरफोर्स में थे, तो स्वाभाविक है कि मुझे भी पायलट बनने का सम्मोहन था, लेकिन जैसा कि आप जानते हैं कि वह इंजीनियरिंग और मेडिसिन की ओर झुकाव का दौर था और पिताजी ने मेरे लिए मेडिकल क्षेत्र चुना। जब मैंने एमबीबीएस में प्रवेश लिया और उस दृष्टि से शरीर को समझने का प्रयास किया तो लगा कि मुझे यहीं आना था, सो पहुँच गयी।

आप इस समय भारत में पैलीएटिव केयर का प्रमुख चेहरा हैं, सबसे पहले यह शब्द आपने कब सुना था? एमबीबीएस के दौरान दिमाग में किस प्रकार की विशेषज्ञता का विचार था?
कालीकट में एनस्थेसिया में पीजी करने के दौरान हमारे विभागाध्यक्ष थे, डॉ. राजगोपाल। वे उन दिनों पैलीएटिव केयर में भारत के अग्रदूत समझे जाते थे। उन दिनों वे एक स्वैच्छिक संगठन पेलियम इंडिया के प्रमुख के रूप में भी काम कर रहे थे। हम पीजी विद्यार्थी के रूप में मरीज को देखने के लिए उनके साथ जाते थे। वहीं मैंने पहली बार पैलीएटिव केयर के बारे में सुना था। उससे पहले तो मेडिकल की पढ़ाई के दौरान यह शब्द कहीं नहीं सुना था।
उसके बाद मैंने अमृता इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, कोची में पैलीएटिव केयर विभाग में काम करना शुरू किया। यहाँ भी मेरा मार्गदर्शन डॉ. राजगोपाल कर रहे थे। उनके साथ काम करने के दौरान शायद अनजाने में मुझे भावी चुनौतियों के लिए तैयार किया जा रहा था। सन् 2006 में इंटरनैशनल नेटवर्क ऑफ कैंसर ट्रीटमेंट एंड रिसर्च ने चेन्नई में अपना वार्षिक सम्मेलन आयोजित किया।
बड़े सम्मेलनों में होने वाली एक सामान्य सहायक बैठक के दौरान कई संगठनों ने मिलकर भारत के उन क्षेत्रों में उपशामक चिकित्सा कार्यक्रम विकसित करने के प्रस्ताव पर चर्चा की, जहाँ यह अभी तक उपलब्ध नहीं थी। उसी बैठक में आंध्र प्रदेश (अविभाजित) को ऐसे क्षेत्रों में से एक के रूप में चुना गया। हैदराबाद में प्रस्तावित इस नए कार्यक्रम का नेतृत्व करने के लिए मेरा नाम सुझाया गया।
हैदराबाद में काम करने के लिए आपको ही क्यों चुना गया?
मैं डॉ. राजगोपाल और डॉ. सुरेश के साथ समुदाय में पैलीएटिव केयर के क्षेत्र में काम कर रही थी। यह वही कार्य था, जिसे आज हम पैलीएटिव केयर का केरल मॉडल कहते हैं, जो दुनिया भर की प्रेरणा का स्रोत है। शायद उन्होंने सामुदायिक कार्यों में मेरी रुचि देखकर मुझे चुना होगा। यद्यपि मैं उनके विश्वास और भरोसे से सम्मानित महसूस कर रही थी, लेकिन इस परियोजना के विशाल स्वरूप ने मुझे चिंतित भी किया।

फिर भी भावी जीवन में संभावित सुधार ने मुझे इस जिम्मेदारी को स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया और मैं हैदराबाद चली आयी। उस समय वाईएस राजशेखर रेड्डी यहां मुख्यमंत्री थे। इत्त़ेफ़ाक यह था कि वे स्वास्थ्य और चिकित्सा के क्षेत्र में क्रांतिकारी सुधार का दृष्टिकोण रखते थे और उनके साथ कई बार इस मुद्दे पर चर्चा का अवसर मिला।
हैदराबाद में प्रारंभिक दिनों में कार्य का अनुभव कैसा रहा?
जब मैं पहली बार 2006 में इस अनजान शहर में आयी थी और इस अस्पताल (एमएनजे) में प्रवेश किया था, तब से मेरा जीवन उतार-चढ़ाव से भरी एक यात्रा ही रहा है। कभी अत्यधिक खुशी के क्षण, तो कभी सफलताओं के लिए संघर्ष करना पड़ा है। हमने अपने सपने को साकार करने की दिशा में धीरे-धीरे, छोटे-छोटे कदम उठाए, क्योंकि भारत के विभिन्न हिस्सों में उपशामक चिकित्सा पेशेवरों और आम जनता के लिए लगभग अज्ञात थी और आज भी बहुत अधिक जागरूकता नहीं आई है।
उस समय एमएनजे अस्पताल के निदेशक डॉ. बीएन. राव इस क्षेत्र में काफी रुचि रखते थे, उन्होंने अपने पास से प्रशिक्षण के लिए दो चिकित्सक भी कोची भेजे थे। मैं जब हैदराबाद आयी तो वो इस तरह के मामले देख रहे थे। मुझे उन डॉक्टरों के साथ एक टीम दी गयी और जहाँ यह विभाग काम कर रहा है, यह पूरा क्षेत्र हमारे उपयोग के लिए दिया गया।
डॉ. दुर्गा प्रसाद, डॉ.वासन, डॉ. श्रीनिवास और दूसरे साथियों की टीम में मैंने पाया कि उनमें नये क्षेत्र में काम करने की भूख थी। कुछ समय बाद प्रशासन ने उपशामक चिकित्सा की विशेषज्ञता तथा एमएनजे इंस्टीट्यूट में पैलीएटिव केयर विभाग को आधिकारिक मान्यता प्रदान की तथा एक संकाय पद सृजित कर पूरे विभाग का दायित्व मुझे सौंपा। मैं अत्यंत प्रसन्न और अत्यधिक राहत महसूस कर रही थी। यह वास्तव में उपशामक चिकित्सा के क्षेत्र में न केवल राज्य के लिए बल्कि पूरे देश के लिए एक ऐतिहासिक कदम था।
एमएनजे में पैलीएटिव केयर को एक निर्धारित दिशा में ले जाने के लिए किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
किसी भी काम को शुरू करने के लिए शुरू में मुश्किलें तो आती ही हैं। प्रमुख मुद्दा यह था कि अधिक लोग इसके बारे में जानते नहीं थे। इस नई और रोमांचक परियोजना को शुरू करने के लिए मेरे पास केवल टीम के कुछ सदस्य थे। एक छोटा धूल-धूसरित कमरा था, जिसमें ईंटों और सीमेंट के ढेर लगे थे। मैंने अपने आईएनसीटीआर कार्यक्रम प्रमुख को पत्र लिखकर पूछा कि मुझे वास्तव में क्या करना चाहिए। उनका उत्तर था, जो उचित लगे, वही करें। यहीं से एक ऐसी यात्रा शुरू हुई, जो परीक्षाओं से भरी रही।

प्रारंभिक दिनों में हमने देखा कि जब मरीज़ के उपचार की सारी उम्मीदें समाप्त हो जातीं तब उसे हमारे पास भेजा जाता, लेकिन धीरे-धीरे जागरूकता बढ़ी। अब तो जैसे ही मरीज़ किसी विभाग में उपचार के लिए आता है और अधिक दर्द की शिकायत करता है तो उसे समानांतर रूप से उसी दिन हमारे विभाग में भेजा जाता है। इस यात्रा में खास बात यह थी कि हमारे साझेदारों और वित्तपोषकों ने नये प्रयोग और नई चीज़ें आज़माने की स्वतंत्रता दी, हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
सहयोगी और निरंतर समर्थन देने वाली प्रबंधन टीम, वरिष्ठों का हम पर भरोसा, वरिष्ठ अधिकारियों से किसी भी समय संपर्क करने की स्वतंत्रता तथा लगातार बढ़ता हुआ सामुदायिक स्वयंसेवकों का आधार यह सब ऐसे तत्व थे, जो हैदराबाद में पैलीएटिव केयर की नींव को मज़बूत करते गये। आज यह आश्चर्यजनक है कि यह कार्यक्रम एक विभाग से बढ़कर क्षेत्रीय प्रशिक्षण और जागरूकता केंद्र बन गया, लेकिन बीते दो दशकों में सबसे बड़ी चुनौती प्रबंधन में बार-बार होने वाला परिवर्तन रहा, लेकिन उत्साहवर्धक रहा कि प्रत्येक प्रबंधन ने कार्यक्रम का समर्थन किया।
सरकार ने पूरे कार्यक्रम का वित्तपोषण अपने हाथ में ले लिया, जिससे इसे स्थायित्व मिला। यहाँ के समुदाय के साथ काम करना एक अनूठा अनुभव था। यहाँ की चुनौतियाँ अलग थीं, लेकिन एक बात समान थी। मौत के साये में जीने वाले मरीजों और उनके परिवारों के लिए पर्याप्त सहायता व्यवस्था का अभाव, जिसको दूर करने के लिए धीरे-धीरे सामुदायिक समर्थन बढ़ता रहा।
किसी भी नयी परियोजना पर कार्य के दौरान कई तरह के संघर्ष होते हैं, आपके साथ हालात कैसे रहे?
मैंने अस्पताल में मुझसे पूर्व कार्य करने वाले चिकित्सकों को स्पष्ट रूप से बताया कि जो पहले इस कार्यक्रम को अनौपचारिक रूप से चला रहे थे, वही प्रभारी रहेंगे। मेरी भूमिका उन्हें कार्यक्रम विकसित करने में सहयोग देना और राज्य स्तर की गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करना थी। यह व्यवस्था अत्यंत सहायक सिद्ध हुई। टीम के सदस्य मुझसे समान स्तर पर खुलकर बातचीत करने में सहज हुए। हमने शुरुआत में ही एक साझा दृष्टि और आवश्यक लक्ष्यों पर सहमति बनाई।
हम लगभग हर सप्ताह मिलते थे, अपने कार्यों को साझा करते थे, नए प्रोजेक्ट पर चर्चा करते थे और सकारात्मक परिणामों का उत्सव मनाते थे। कभी-कभी समय प्रबंधन, जिम्मेदारियों के बंटवारे और गुणवत्ता बनाए रखने जैसे मुद्दों पर मतभेद होते थे, जिन्हें हम सामूहिक चर्चा के माध्यम से सुलझाते थे। हम स्वयं को याद दिलाते रहते थे कि यह सामान्य 9 से 5 की नौकरी नहीं, बल्कि एक बड़े उद्देश्य को पूरा करने का प्रयास है।
यह सही है कि बहु-विषयक टीम में काम करना टीम के लिए एक चुनौतीपूर्ण पहलू होता है, लेकिन धीरे-धीरे हमने ऐसा वातावरण बनाया, जहाँ सभी की भूमिका का सम्मान किया जाता। हमने रोगी-केंद्रित, नैतिक और टीम-आधारित देखभाल का उदाहरण प्रस्तुत किया। खुले संवाद और आपसी सम्मान ने हमारी टीम में मजबूत विश्वास और निष्ठा स्थापित की। फिर हमने स्वयंसेवकों को भी निर्णय-निर्माण, प्रशिक्षण और रोगी देखभाल में शामिल करना शुरू किया।
आपने बच्चों के लिए भी तो पैलीएटिव केयर सुविधाओं की शुरूआत की?
एक घटना मुझे याद आ रही है। कैन्सर पीड़ित एक बच्चे को काफी खराब हालत में हमारे पास भेजा गया। उसके हाथ की त्वचा बार-बार इंजेक्शनों से छिल गयी थी। वह तंग आकर घर जाना चाहता था। वह हमारे विभाग का पहला बाल-मरीज़ था। हमने जब उसकी देख-रेख की तो वह खुश हुआ, कुछ दिन बाद वह फिर पलटकर अस्पताल आया। काफी दिन तक उसका उपचार चलता रहा।
हालांकि कुछ दिन की सामान्य स्थिति के बाद उसका निधन हो गया, लेकिन वही बालक हमें बच्चों के लिए पैलीएटिव केयर विभाग खोलने की प्रेरणा दे गया। पहले तो हमने एमएनजे में इसकी शुरूआत की। निश्चित रूप से यहाँ कैन्सर पीड़ित बच्चों की देख-रेख हो रही थी। कई ऐसे बच्चे जो कैन्सर से इतर बीमारियों से पीड़ित थे। उनके लिए भी पैलीएटिव केयर सुविधाएं स्थापित करने का विचार हुआ तो निलोफर अस्पताल में बच्चों के लिए यह सुविधा शुरू की गयी।
फिर हमारी संस्था पेन रिलीफ एंड पैलीएटिव केयर में भी बच्चों का विभाग शुरू किया गया। इस कार्य को देखकर देश के दूसरे शहरों, बल्कि दूसरे देशों से भी लोग प्रशिक्षण के लिए आने लगे। अब हम भी बच्चों के उपचार में फॉलोअप करने लगे हैं। बच्चा अगर अधिक दिन तक नहीं आता तो उनके परिवार से संपर्क करते हैं।

मैं एक और बात बताती हूँ। दरअसल, सारी दुनिया में कैन्सर और अन्य ऐसी बीमारियाँ हैं, जिनसे प्रभावित होकर लोग मृत्यु के करीब पहुँचते हैं। ऐसी बीमारियाँ बच्चों को भी होती हैं, लेकिन पश्चिमी देशों में ऐसी बीमारियों से बच्चों के बचने का प्रतिशत काफी अधिक है। वहाँ लगभग 80 प्रतिशत बच्चों की जान बचाने में सफलता मिलती है, लेकिन हमारे देश में ऐसा केवल 20 प्रतिशत बच्चों के साथ ही होता है। ऐसा इसलिए भी है कि मरीज हमारे पास थक-हार कर आते हैं।
जब सब तरफ से जवाब मिल जाता है और लगभग सारे पैसे और हिम्मत खर्च हो जाती है तो लोग एमएनजे आते हैं। दूसरा कारण है कि कैन्सर की पहचान यहां देर से होती है। कुछ लोग तो शुरू में विश्वास ही नहीं करते। उन्हें सही मार्गदर्शन नहीं मिलता। विशेषकर गरीब परिवारों में माँ-बाप के लिए ऐसे बच्चे प्राथमिकता नहीं होते, जो निरंतर बीमार रहते हैं। उनके जीवन की अपनी घोर समस्याएं होती हैं।
कई लोग बीच में ही उपचार छोड़ देते हैं। हमने यह कोशिश की है कि पैलीएटिव केयर के बारे में लोगों में अधिकाधिक जागरूकता लाई जाए और बच्चों के लिए भी यह सुविधा आसानी से उपलब्ध हो सके। पहले तो बच्चों का उपचार कहाँ किया जाए, इसके लिए मार्गदर्शन करना ही मुश्किल था, लेकिन एमएनजे का बाल पैलीएटिव केयर विभाग अब सारी दुनिया के लिए आदर्श बन गया है।
डिएगो हॉस्पिस आईपीएम एलडीआई में भाग लेना कैसा रहा?
वर्ष 2009-10 में मैं डिएगो हॉस्पिस में अंतरराष्ट्रीय लीडरशिप कार्यक्रम की प्रतिभागी थी। दुनिया भर से कुछ लोग इस कार्यक्रम के लिए चुने गये थे। चूँकि यह नया क्षेत्र था, इसलिए सरकार का साथ समन्वय, उच्च अधिकारियों को अपनी स्थिति को साझा करने, मीडिया का सहयोग जैसे कई तत्वों पर आधारित प्रशिक्षण यहाँ प्रदान किया गया। यहाँ मैं दो वर्ष तक रही। काफी कुछ सीखने का अवसर मिला।
मरीजों की बढ़ती मांगों ने किस तरह की चुनौतियां खड़ी कीं?
निश्चित ही संख्या बढ़ रही है। यहाँ हमारे पास दो भवनों में विभाग काम कर रहा है, तो दोनों में मिलाकर औसतन 90-95 मरीज आते हैं। यहाँ से कुछ लोगों को वार्ड में एडमिट किया जाता है और कुछ को घर भेजकर उन्हें हमारी संस्था की ओर से होमकेयर सुविधा पहुँचाई जाती है। हमारे पास जो वैन हैं, उनके माध्यम से वालंटियर शहर के विभिन्न हिस्सों में जाकर घर पर मरीजों की देखभाल करते हैं।
अधिकांश मरीज घर पर रहना और वहीं मृत्यु को प्राप्त होना पसंद करते हैं। निश्चित रूप से मरीजों का बढ़ना बड़ी चुनौती है, लेकिन सामुदायिक सहयोग से लोगों को घर पर देख-रेख सुविधाएं पहुंचाने से यह दबाव कम हो सकता है।
कब आपको ख़्याल आया कि घर पहुँचकर मरीजों की देख-रेख के लिए एनजीओ स्थापित करनी चाहिए?
एमएनजे में काम करने के दौरान मुझे एहसास हुआ कि समय के साथ अधिकांश मरीज इतने बीमार हो जाते हैं कि अस्पताल नहीं आ सकते। वे घर पर कष्ट सहते हैं और उसी तकलीफ में उनकी मृत्यु हो जाती है, जबकि जब व्यक्ति अंतिम सांस ले रहा हो तो वह भगवान को याद करता रहे। इसके लिए उस समय उसे अधिक पीड़ा नहीं होनी चाहिए। मैंने सोचा कि यदि मैं केवल अस्पताल में रहूँ, तो मैं कुछ मरीजों की ही सेवा कर पाऊंगी, समुदाय तक नहीं पहुँच पाऊँगी।

इसी कारण आउटरीच के लिए पेन रिलीफ एंड पैलीएटिव केयर सोसाइटी बनाई गयी। 2007 में समान विचारधारा वाले कुछ लोगों के साथ मिलकर यह संस्था स्थापित की गयी। हम सबने इसकी स्थापना के लिए अपनी जमा-पूंजी इसमें लगा दी। आज हमारे पास हैदराबाद में 40 बिस्तरों वाला हॉस्पिस है और हम राज्य सरकार के साथ मिलकर जिला स्तर पर भी पैलीएटिव केयर केंद्र संचालित करते हैं।
जब आपने अपने कार्य में विस्तार के लिए लोगों को प्रस्ताव भेजे तो उनसे अधिक उत्साह नहीं मिला, तो क्या आप निराश होती थीं?
मुझे अपने शुरुआती दिन याद हैं, जब हमने अभी शुरुआत ही की थी और हमारे पास दिखाने के लिए बहुत कुछ नहीं था, लेकिन हमें पता था कि हम आगे बढ़ना चाहते हैं। हमने कई प्रस्ताव लिखे और अनेक लोगों को भेजे, लेकिन कुछ भी नहीं हुआ। एमएनजे के निदेशक बहुत प्रोत्साहित करने वाले थे और उनके प्रोत्साहन से ही एक रविवार सुबह रेड्डीज लैब के संस्थापकों से मिलने का अवसर मिला।
मुझे याद है कि मैंने पूरे आत्मविश्वास के साथ अपना काम दिखाने की कोशिश की। उन्होंने उसे देखने और हमारे अनुरोध पर विचार करने का आश्वासन दिया। उनके सहयोग से हमारी पहली घर पर देख-रेख के लिए वैन सेवा शुरू हुई। उसी बैठक ने हमें वह उपलब्धि दिलाई, जो आज हमारे पास है। हैदराबाद शहर में उन्नत अवस्था के रोगियों के लिए बेहतर घर-आधारित देखभाल। हालांकि दो साल बाद उनका सहयोग बंद हो गया, लेकिन हम चल पड़े थे, यह हमारे काम का ही प्रभाव था कि कुछ साल बाद पलटकर रेड्डीज़ लैब द्वारा हमें फिर से सहयोग प्रदान किया गया। सरकारी स्तर पर पैलीएटिव केयर सेवाओं के विस्तार में आईएएस अधिकार वाकटी करुणा का भी सहयोग काफी महत्वपूर्ण रहा।
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आपने एक मुल़ाकात में कहा था कि लोग ऐसे लोगों की सहायता में दान नहीं करना चाहते, जिनका मरना तय है?
यह सही है। अधिकतर शिक्षा के लिए या फिर अस्पताल में जिनके बचने की उम्मीद होती है, उनके उपचार के लिए आर्थिक सहयोग मिल जाता है, लेकिन कैन्सर जैसे रोगों से पीड़ित, जिनका मरना तय हो जाता है, उनकी देख-रेख में आर्थिक सहयोग के लिए लोग आसानी से सामने नहीं आते। हाँ, वो परिवार जिन्होंने यह दिन देखे हैं, वे इस पुनीत कार्य में सहयोग के लिए सामने आ रहे हैं। लोगों को अंतिम समय के बारे में और सोचना होगा, यह भी कि जब शरीर उपचार की प्रतिक्रिया देना बंद कर दे, तो उस पर कृत्रिम उपायों का बोझ न डाला जाए। वह अपने अंतिम समय अपने परिवार और रिश्तेदारों के बीच बिताए।
मॉर्फिन और ओपिओइड की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए आपको काफी कठिन दौर से गुज़रना पड़ा? आज किस तरह की परिस्थितियाँ हैं?
हमारे कार्यक्रम की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि आंध्र-प्रदेश में चिकित्सा उपयोग के लिए मॉर्फिन की आसान उपलब्धता से संबंधित नारकोटिक नियमों में संशोधन था। कई बार ऐसा होता था कि हमारे पास मॉर्फिन समाप्त हो जाती थी और मरीज तीव्र दर्द से पीड़ित रहते थे। परिवारजन अपनी पीड़ा और कभी-कभी गुस्सा भी व्यक्त करते थे। हम भी कभी-कभी निराशा और उदासीनता के दौर से गुजरते थे।

मॉर्फिन की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए हमें बहुत प्रयास, पैरवी और लंबे समय तक सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़े। अंतत इन प्रयासों से परिवर्तन संभव हुआ। हालाँकि मैं एक एनजीओ का प्रतिनिधित्व कर रही थी, लेकिन सरकारी अस्पताल से जुड़े होने के कारण हमें सरकार तक पहुँच आसान हुई। कई अधिकारियों से मुलाकात तथा जिनेवा से डब्ल्यूएचओ प्रतिनिधि की उच्च-स्तरीय यात्रा ने इस प्रक्रिया को गति दी।
मैंने पहले आईएनसीटीआर सम्मेलन में डॉ. सेसिलिया सेपुल्वेदा से मुलाकात की थी। मैंने उन्हें हमारे कार्यक्रम का दौरा करने के लिए आमंत्रित किया और उन्होंने इसे याद रखा। उनकी यात्रा ने हमें राज्य स्वास्थ्य सचिव तक सीधी पहुँच दिलाई और अंतत बदलाव संभव हुआ। एक अन्य महत्वपूर्ण राष्ट्रीय घटना, जिसने ओपिओइड (दर्द निवारक दवाइयाँ) की उपलब्धता के लिए नियमों में संशोधन को गति दी, वह थी डॉ. राजगोपाल द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका। इसने व्यापक जन-रुचि उत्पन्न की और सभी राज्य सरकारों से स्पष्टीकरण माँगा गया। आज स्थिति कुछ बेहतर होने को है।
आपने एक लेख में अपने गुस्से पर नियंत्रण के बारे में लिखा था, उसका क्या हुआ?
गुस्सा किसी में भी होना स्वाभाविक है, लेकिन मैंने जिस उद्देश्य से लिए जीवन समर्पित किया है, वहाँ इसको कुछ ठंडा होना चाहिए। मैंने अपने गुस्से पर नियंत्रण करना सीख लिया है। इसीलिए भी कि गुस्से में लिए गए निर्णय अक्सर गलत होते हैं। मैंने जिन गुणों को महत्व दिया है, उनमें दूसरों के विकास में निवेश, निष्पक्ष प्रक्रिया, निष्ठा को महत्व, आत्म-जागरूकता और विनम्रता का स्थान ऊपर है। मेरे जीवन की यह यात्रा अत्यंत रोमांचक, चुनौतीपूर्ण और संतोषजनक रही है। इसने मुझे जीवन का अर्थ दिया है और समाज में सार्थक योगदान करने का अवसर प्रदान किया है।
इस पूरी यात्रा में सहयोगी टीम में महिलाओं की क्या भूमिका रही है?
मैं उपशामक चिकित्सा (पैलीएटिव केयर) के क्षेत्र की उन महिलाओं को सलाम करती हूँ, जो तेजी से महत्वपूर्ण निर्णय-निर्माण पदों पर पहुँच रही हैं और इस क्षेत्र में बहुपक्षीय एजेंडा को आकार देने और लागू करने का कार्य कर रही हैं। मेरी अधिकांश महिला सहकर्मी सभी बाधाओं के बावजूद काम पर आती हैं; वे सामाजिक, पारिवारिक और आर्थिक चुनौतियों और जिम्मेदारियों को पार करते हुए यह सब करती हैं। वे यह सब अपने दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास के बल पर करती हैं।
मृत्यु और मृत्यु-निकट स्थितियों का सामना करना और साथ ही कार्य तथा घर के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है; फिर भी हम यह सब करते हैं, क्योंकि हम अपने कार्य के प्रति अत्यंत समर्पित हैं और अपने मरीजों की सहायता करना चाहते हैं।
आज भी लोग डॉक्टर के पास जाने से डरते हैं कि पता नहीं कब जीवन भर की सारी कमाई एक झटके में निकल जाए। ऐसे समय में अपनी सारी कमाई लगाकर ज़रूरतमंद मरीज़ों के लिए निस्वार्थ भाव से काम करने की भावना कहाँ से आती है?
पैसे के बिना कोई काम नहीं होता। लगभग सभी के जीवन में पैसा कमाना एक उद्देश्य होता है। निश्चित रूप से ऐसे लोग बहुत कम होते हैं, जो पैसे के पार निस्वार्थ भावना से कुछ सोचते और करते हैं। ऐसी भावना कहाँ से और क्यों आती है, इसके बारे में तो मैं नहीं बता पाऊँगी, लेकिन अपने बारे में मैं इतना बता सकती हूँ कि मैं खुशकिस्मत हूं कि जो मेरा शौक है, उसी में मैं काम कर रही हूँ। कुछ लोग होते हैं, जिनका शौक कुछ और होता है, लेकिन वो काम कुछ और कर रहे होते हैं।
मेरे सामने विदेश जाने का भी विकल्प था और जीवन में कई सारे मोड़ आये जब यह या वह चुनना था, कोई ऐसी चीज़ थी, जो मुझे इन मरीज़ों के दर्द को कम करने के मिशन की ओर ले आई। जब मैं मरीज़ से बात करते हुए कहती हूँ कि आप इतने दिन जी पाएंगे और संभावित रूप से इतने दिनों में मौत हो सकती है, हम मौत को तो नहीं रोक सकते लेकिन दर्द को कम करना चाहते हैं, तो वो यह सुनकर जब थैंक यू कहता है, तो लगता है, मैंने बिल्कुल सही रास्ता चुना है।
आपने अपने एक लेख में 20 सेकेंड एलीवेटर स्पीच और पाँच मिनट की प्रस्तुति का उल्लेख किया है, इसका क्या तात्पर्य है?
चिकित्सा तंत्र में नयी व्यवस्था या नये तौर-तरीकों के लिए काम करना आसान नहीं होता। सरकार और समुदाय का समर्थन और सहयोग प्राप्त करना, इसके लिए उन्हें तैयार करना भी आसान नहीं होता। विशेषकर सरकार में बैठे उच्च अधिकारियों, मंत्रियों या अपने ही संस्थान के प्रमुखों को समझाना बड़ी चुनौती होती है। इसलिए भी कि उनके पास आपको सुनने के लिए समय की कमी होती है।

कई बार तो कार में सवार होते हुए, विभाग में खड़े-खड़े उन्हें बताना होता है। उदाहरण के रूप में यदि लिफ्ट में आप अधिकारी के साथ हैं, तो बस आपके पास 20 सेकेंड हैं, उतने ही समय में अपनी बात आपको रखनी है। उसे ही 20 सेकेंड एलीवेटर स्पीच कहा जाता है। 5 मिनट की प्रस्तुति इसी प्रकार की होती है कि इतना ही समय यदि मंत्री के पास हो तो उसे उस योजना के बारे में कैसे समझाया जाए। इस प्रशिक्षण से मुझे लोगों के समक्ष अपनी बात रखने में अच्छी सफलता मिली।
मेरे जीवन की सबसे सफल प्रस्तुतियों में से एक आबकारी आयुक्त के सामने दी गई थी। हमने प्रस्तुति तैयार की थी, लेकिन निश्चित नहीं थे कि उसे प्रस्तुत कर पाएँगे या नहीं। अंतत मुझे अवसर मिला और मैंने 5 मिनट की प्रस्तुति दी, जिसने पूरे विमर्श को दिशा दी। यह 5 मिनट का भाषण मुझे कई मंचों पर काम आया। मैंने श्रीलंका, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे देशों में भी पैलीएटिव केयर विशेषज्ञ के रूप में कार्य किया।
मैंने सीखा कि संदेश छोटा, स्पष्ट और सुसंगत होना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति राज्य अधिकारियों को प्रभावित करने में सहायक होती है। ह्यूमन राइट्स वॉच के साथ किए गए अध्ययन ने भी हमारी मदद की। मीडिया के साथ काम करना मेरे लिए हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा, लेकिन हमने पैलीएटिव केयर के मुद्दों को सफलतापूर्वक प्रमुखता दिलाई। मरीजों की कहानियों ने मीडिया को प्रभावित किया।

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