दिवाली 2025 के बाद , दिल्ली फिर हुई धुआं-धुआं!
दिल्ली साल 2016 से अब तक देखा जाए तो 9 बार से ज्यादा सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात की स्थिति से गुजर चुकी है। देखा गया है कि हर बार यह स्थिति दिवाली के अगले दिन जरूर बिगड़ती है और मजे की बात है तब इस स्थिति पर दिल्ली वाले बहुत हद तक अफसोस भी जताते हैं। लेकिन अगली बार जब दिवाली आती है, वह इसे जरा भी याद नहीं रखते और फिर से स्थिति बद से बदतर हो जाती है।
21 अक्तूबर 2025 की सुबह दिल्ली एक बार फिर पिछले कई सालों की तरह दिवाली के अगले दिन वाले भयावह दृश्यों के साथ जगी। चारों तरफ धुंध और धुएं का दमघोंटू साम्राज्य था। दिवाली की रात पटाखों की आवाज और रोशनी के बीच धीरे-धीरे जो जहर घुलना शुरु हुआ था, उसमें अदालत की मर्यादा, प्रशासन की नाकामी और जनता की जिद, सबकी अपनी-अपनी हिस्सेदारी थी। नतीजा यह निकला कि दिवाली के अगले दिन सुबह 6 बजे राजधानी के कई इलाकों में एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) बढ़कर 720 के ऊपर पहुंच गया।
जबकि दिवाली एक दिन पहले यानी 19 अक्तूबर 2025 को दिल्ली का एक्यूआई 298 था यानी दिवाली के अगले दिन 200 प्रतिशत से भी ज्यादा दिल्ली में प्रदूषण की बढ़ोत्तरी हो गई और इसे अगर विश्व स्वास्थ्य संगठन के आईने में देखें तो यह मान्य प्रदूषण स्तर से 45 गुना ज्यादा था। दिवाली के अगले दिन दिल्ली में वायु प्रदूषण की यह गंभीर स्थिति थी कि राजधानी के कई इलाकों मसलन सफदरजंग, आनंद विहार, नरेला और पंजाबी बाग जैसे इलाकों में दृश्यता घटकर 100 मीटर से भी कम रह गई थी।
पर्यावरण प्रदूषण (रोकथाम और नियंत्रण) प्राधिकरण के मुताबिक यह बीते 5 वर्षों में सबसे खराब दिवाली की अगली सुबह थी। अभी तक 2021 को सबसे प्रदूषित दिवाली की अगली सुबह समझा जाता था, जिसका एक्यूआई 556 दर्ज हुआ था। जबकि 21 अक्तूबर 2025 की सुबह यह 720 की गंभीरतम श्रेणी में था। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) और पुलिस की संयुक्त टीमें यूं तो रातभर गश्त करती रहीं, लेकिन शुरु के तीन घंटों में ही 2700 से ज्यादा बार लोग अदालत द्वारा दी गई अनुमति का उल्लंघन करते पाये गये, जबकि पूरी रात में यह संख्या बढ़कर 50,000 से भी ज्यादा पहुंच गई।
ग्रीन पटाखों के कारण दिल्ली में गंभीर वायु प्रदूषण
इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अदालत द्वारा दिल्ली को सीमित समय यानी रात में 8 से 10 के बीच ग्रीन पटाखे फोड़ने की सुप्रीम कोर्ट द्वारा जो अनुमति दी गई थी, वह कितनी घातक साबित हुई, 21 अक्तूबर 2025 की सुबह तक आल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस (एम्स) में सांस लेने में दिक्कत महसूस कर रहे मरीजों की जो संख्या वहां पहुंची, वह रोज के मुकाबले 40 से 50 प्रतिशत ज्यादा थी और इनमें सबसे ज्यादा बच्चे और बुजुर्ग थे।
हालांकि दिल्ली के सरकारी स्कूलों में भी शिक्षा निदेशालय ने प्रदूषण की भयावहता देखते हुए अगले दो दिनों के लिए फिजिकल क्लासेस पर पाबंदी लगा दी। लेकिन इस सबके बावजूद दिल्ली के लोगों ने अदालत की अनुमति का जो दुरुपयोग किया, वह भयावह था। इसरो के एमओडीआईएस सैटेलाइट ने 19-21 अक्तूबर 2025 के बीच पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में 10 फीसदी की गिरावट दर्ज की थी।
इसके बावजूद दिल्ली में जिस तरह वायु प्रदूषण की दर रॉकेट की तरह ऊपर की ओर बढ़ी, इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि 2025 की दिवाली दिल्लीवासियों के लिए कितनी खतरनाक रही। वायु प्रदूषण से संबंधित विभिन्न तरह की स्थितियों का आंकलन करते हुए आईआईटी दिल्ली के वायु प्रदूषण अध्ययन केंद्र ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि दिल्ली की हवा में इस कदर जहर का बढ़ना केवल और केवल तथाकथित ग्रीन पटाखों की ही देन थी।
दिवाली के बाद दिल्ली में प्रदूषण और स्वास्थ्य संकट
क्योंकि उसकी एक रात पहले यानी 20 अक्तूबर की रात दिल्ली के एयर क्वालिटी इंडेक्स की स्थिति अगले दिन की स्थिति से 55 फीसदी कम थी। वैज्ञानिकों ने इस सबके जोड़-घटाव से यह निष्कर्ष निकाला है कि दिवाली की अगली सुबह दिल्ली के वातावरण में जो प्रदूषण की जहरीली स्थिति थी, उसमें पराली सहित दूसरे प्रदूषण कारकों का योगदान सिर्फ 18 फीसदी था, बाकी सब तथाकथित त्योहार की खुशी में की गई आतिशबाजी का नतीजा था।
दिल्ली साल 2016 से अब तक देखा जाए तो 9 बार से ज्यादा सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात की स्थिति से गुजर चुकी है। देखा गया है कि हर बार यह स्थिति दिवाली के अगले दिन जरूर बिगड़ती है और मजे की बात है तब इस स्थिति पर दिल्ली वाले बहुत हद तक अफसोस भी जताते हैं। लेकिन अगली बार जब दिवाली आती है, वह इसे जरा भी याद नहीं रखते और फिर से स्थिति बद से बदतर हो जाती है। यह अलग बात है कि सोशल मीडिया पर कुछ लोग हो-हल्ला जरूर खड़ा करते हैं, लेकिन उनके इस तरह के विरोध से प्रदूषण करने वालों पर कुछ फर्क नहीं पड़ता।
पिछले कई सालों से तो पटाखों के लिए दिल्ली का एक तबका दिवाली आने के पहले # ‘माई राइट टू सेलिब्रेट’ लिखकर न सिर्फ आतिशबाजी को जायज ठहराते रहे हैं बल्कि अदालत पर यह नैतिक दबाव बनाते रहे हैं कि वह लोगों को त्योहार की खुशियों के नाम पर जहर फैलाने की इजाजत दें। लेकिन इस बार इस अधिकार के नाम पर जब अदालत ने प्राकृतिक या ग्रीन पटाखे जलाने की अनुमति दी, तो दिल्लीवासियों ने देखा किस तरह बच्चे और बूढ़े विशेषकर अस्थमा के रोगी तड़पते पाये गये। दिल्ली के लंग केयर फाउंडेशन के प्रमुख डॉक्टर अरविंद कुमार के शब्दों में, हम लोग दिवाली मना नहीं रहे बल्कि खुद को धीमे-धीमे मार रहे हैं।
ग्रीन पटाखों की वास्तविकता और प्रदूषण का सच
इससे जो ध्यान देने वाली पहली बात सामने आती है, वह यह है कि क्या वास्तव में ग्रीन पटाखे सचमुच ग्रीन होते हैं? सीएसआईआर-एनईईआरआई द्वारा विकसित ग्रीन क्रैकर्स को 30 प्रतिशत कम प्रदूषणकारी बताया गया था। लेकिन जिस तरह दिल्ली में वायु प्रदूषण का हाल इस साल हुआ है, उससे लगता है कि दावे भले कुछ हों, हकीकत कुछ और ही थी। जिस तरह से 21 अक्तूबर 2025 की रात दिल्ली का वातावरण धुएं की धुंध से भर गया, उससे तो साफ लगता है कि इन पटाखों की महज पैकेजिंग में ही ग्रीन का लेबल लगा था, बाकी ये आम पटाखे ही थे। वैसे भी पहले कई बार अचानक की गई जांच में पाया गया है कि ग्रीन पटाखों के नाम पर बिकने वाले पटाखों में से 70 फीसदी से ज्यादा पटाखे वास्तव में ग्रीन होते ही नहीं।
कई छोटे-छोटे निर्माता पुराने विस्फोटकों से ही ये पटाखे बनाये थे, बस रैपर बदल दिया था। वैसे भी इस साल दिल्ली पुलिस ने अलग-अलग जगहों पर छापा मारकर 152 जगहों पर नकली ग्रीन पटाखों की बिक्री के मामले पकड़े थे। इससे साफ है कि जब तक केंद्रीय निगरानी और ट्रेसिंग सिस्टम नहीं बनेगा, तब तक ग्रीन पटाखों को अनुमति देना भी आत्मघाती होगा। वास्तव में जिस तरह विशेषज्ञ पिछले कुछ सालों से लगातार प्रतिबंध लगा रहे थे, लेकिन कोई विकल्प नहीं दे रहे थे।
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सख्ती और वैकल्पिक उपाय ही बचा सकते हैं दिल्ली
उसके कारण न सिर्फ इस साल दिल्ली में आने वाली नई भाजपा सरकार पर यह दबाव बना कि वह दिल्लीवासियों के लिए दिवाली के मौके पर पटाखे फोड़ने की अनुमति हासिल करे बल्कि एक तरह से अदालत पर भी यह दबाव था, जिस कारण अदालत ने बहुत सीमित अवधि के लिए ग्रीन पटाखों के फोड़ने की अनुमति दी, लेकिन महज दो घंटों की अनुमति का जिस तरह से दिल्ली के लोगों ने उल्लंघन किया, उससे साफ है कि न सिर्फ अदालत और प्रशासन को पटाखों को लेकर सख्त रवैये पर टिके रहना होगा बल्कि जिस तरह की वैकल्पिक व्यवस्था की मांग की जा रही है, उसमें प्रशासन के स्तर पर खरा उतरना होगा। अगर वास्तव में अदालत द्वारा जो अनुमति दी गई थी, दिल्ली के लोग उसी के अनुरूप व्यवहार करते तो शायद यह स्थिति नहीं देखने को मिलती।
दिल्ली में प्रदूषण की जो भयंकर स्थिति बनी, उसके पीछे एकमात्र कारण लोगों द्वारा अदालत और प्रशासन की परवाह न करना रहा है। साथ ही पुलिस की निगरानी व्यवस्था भी बिल्कुल नाकारा साबित हुई। अगर भविष्य में इस साल की स्थिति से सबक नहीं हासिल किया गया तो किसी भी तरह की राहत की जगह लगातार चीजें बिगडेंगी।
अगर वास्तव में कानून पालन की स्थिति भी बनी रहे और लोगों की मांग भी पूरी हो जाए, यह स्थिति बनानी है तो हर कॉलोनी या वार्ड स्तर पर सामूहिक आतिशबाजी के बदले लेजर शो या ड्रोन लाइट शो की व्यवस्था करनी होगी बजाय ग्रीन पटाखों को अनुमति देने की। इसी तरह रियल टाइम कैमरा निगरानी से पहचान और कम से कम 10,000 रुपये तक स्पॉट फाइन की व्यवस्था करनी होगी। तब जाकर लोगों में थोड़ी बहुत अदालत और जिम्मेदारी के प्रति कर्तव्य का भान होगा, नहीं तो हर तरह के दावों के बावजूद दिल्ली इसी तरह प्रदूषण से धुआं-धुआं होती रहेगी।
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