आश्विन मास है पितरों और माता दुर्गा को प्रसन्न करने की अवधि

विक्रम पंचांग में आश्विन मास को विशेष स्थान दिया गया है। यही वह महीना है जिसमें पितृपक्ष और शारदीय नवरात्र दोनों आते हैं। शास्त्रां में इस समय के लिए स्पष्ट नियम बताए गए हैं कि कौन-से कार्य करने चाहिए और किनसे बचना चाहिए। मान्यता है कि इन नियमों का पालन करने से पितरों की कृपा मिलती है और देवी दुर्गा का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है, जिससे जीवन में सुख-समृद्धि और भाग्य का बदलाव संभव होता है।

महत्व

विक्रम पंचांग में आश्विन मास को खास दर्जा दिया गया है। यह मास भाद्रपद के बाद और कार्तिक से पहले आता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता है कि इसका कृष्ण पक्ष पितृपक्ष कहलाता है, जबकि शुक्ल पक्ष में शारदीय नवरात्र आते हैं। यह महीना एक तरफ पितरों की शांति और तृप्ति के लिए समर्पित है, तो दूसरी ओर देवी दुर्गा की साधना और विजयशक्ति का प्रतीक भी है। शास्त्रां में इसे पुण्यफल देने वाला महीना कहा गया है।

करने योग्य कार्य

गरुड़ पुराण के अनुसार, पितृपक्ष में किया गया श्राद्ध और तर्पण पितरों तक सीधा पहुंचता है। मनुस्मृति भी कहती है कि पूर्वजों को तृप्त किए बिना संतान का कल्याण संभव नहीं है। श्राद्ध और तर्पण, अन्न, वस्त्र, गो-दान और ब्राह्मण भोजन कराने से पितृदोष का नाश होता है। स्वधा स्तोत्र, विष्णु सहस्त्रनाम या गीता पाठ पितरों को प्रसन्न करने का उत्तम साधन है।

शारदीय नवरात्र

स्कंद पुराण में लिखा है कि आश्विन के शुक्ल पक्ष की नवरात्र में दुर्गा साधना से नौ ग्रह संतुलित होते हैं और जीवन से संकट दूर होते हैं। महाभारत में भी उल्लेख है कि अर्जुन ने आश्विन मास में दुर्गा की उपासना कर पाशुपतास्त्र प्राप्त किया था। इन नौरात्रों में दुर्गा सप्तशती, चंडी पाठ और देवी कवच का पाठ करना उत्तम माना गया है। उपवास और साधना से घर में शांति और सुख-समृद्धि आती है।

निषेध कार्य

शास्त्रां में साफ चेतावनी दी गई है कि इस समय कुछ काम करने से परिणाम शुभ प्राप्त नहीं होते हैं, जैसे- विवाह, गृह-प्रवेश और नए कार्यों की शुरुआत आदि। इन कार्यों को पितृपक्ष में वर्जित माना गया है। मांस, मद्य और तामसिक भोजन का सेवन पितरों का अपमान माना जाता है। पौधों और पेड़ों की कटाई इस दौरान नहीं करनी चाहिए।

झूठ बोलना, क्रोध करना और अपशब्द कहना पाप-फल को कई गुना बढ़ा देता है। गरुड़ पुराण कहता है कि पितृपक्ष में किए गए दान और श्राद्ध से पूर्वज तृप्त होते हैं और आशीर्वाद देते हैं। मनुस्मृति श्राद्ध के बिना पितरों की आत्मा संतुष्ट नहीं होती है। स्कंद पुराण नवरात्र में देवी साधना से नौ ग्रहों के दोष दूर होते हैं।

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पद्म पुराण इस महीने के उपवास और पूजन से संतान-सुख, धन और आयु की वृद्धि होती है। आश्विन मास वास्तव में तप, संयम और साधना का महीना है। इसमें किए गए शुभ कर्म कई गुना फल देते हैं और बुरे कर्म भी उतने ही भारी पड़ते हैं. अगर पितरों को तृप्त करना है और देवी दुर्गा की कृपा चाहिए, तो इस महीने शास्त्रां में बताए नियमों का पालन जरूर करना चाहिए। यही नियम न सिर्फ जीवन को संवारते हैं बल्कि भाग्य को भी बदलने की ताकत रखते हैं।

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