न्याय की गरिमा पर प्रहार !
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पवित्रता पर अभूतपूर्व हमले से देश हतप्रभ है। मुख्य न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई पर एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने जूता फेंकने का प्रयास किया। 71 वर्षीय वकील ने चिल्लाते हुए कहा, सनातन का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान! भले ही जूता बेंच तक नहीं पहुँचा, यह कृत्य न्यायपालिका की गरिमा पर गहरा आघात है। यह घटना व्यक्तिगत आक्रोश से कहीं अधिक है; यह सामाजिक, धार्मिक और संस्थागत संकटों का दर्पण है। मुख्य न्यायाधीश ने इसे उपेक्षा योग्य बताया, लेकिन क्या इसे वाकई नज़रअंदाज़ किया जा सकता है?
घटना का मूल कुछ दिन पूर्व की सुनवाई में है, जब मुख्य न्यायाधीश ने खजुराहो के प्रसिद्ध जावरी मंदिर में स्थित भगवान विष्णु की खंडित मूर्ति की मरम्मत और रख-रखाव करने का आदेश देने की गुहार वाली अर्जी को ख़ारिज करते हुए चुटकी ली थी, आप भगवान विष्णु के परम भक्त हैं, तो अब उन्हीं से प्रार्थना कीजिए। इसे सनातन धर्म का अपमान मानकर वकील ने यह कदम उठाया।
अभिव्यक्ति बनाम मर्यादा: न्यायपालिका पर गहरा सवाल
मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी न्यायिक संदर्भ में थी और वे सभी धर्मों का सम्मान करते हैं। फिर भी, यह घटना धार्मिक संवेदनशीलता के दौर में न्यायिक भाषा की सीमाओं पर सवाल उठाती है। न्यायाधीशों को तथ्यों पर बोलने का अधिकार है, लेकिन धार्मिक मामलों में संयम अनिवार्य है।
लोकतांत्रिक भारत में असहमति का अधिकार मौलिक है। कुछ लोगों को वकील का कृत्य दमित हिंदू भावनाओं की ओर से जोरदार विरोध लग सकता है। लेकिन क्या न्यायालय में जूता फेंकना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं? संविधान अगर अभिव्यक्ति की गारंटी देता है, तो उस पर उचित प्रतिबंध भी लगाता है। शांतिपूर्ण विरोध बहस का रूप ले सकता था, लेकिन हिंसक कृत्य ने इसे आपराधिक बना दिया।
यह घटना न्यायपालिका की गरिमा पर भी सवाल उठाती है। सुप्रीम कोर्ट लोकतंत्र का संरक्षक है। वहाँ ऐसे अवांछित कृत्य को हलके में लेना भविष्य में और हमलों को प्रेरित कर सकता है। जनता का न्याय व्यवस्था पर भरोसा और कमजोर होगा, जो पहले से ही 40 प्रतिशत भारतीयों में कम है। सयाने यह भी याद दिला रहे हैं कि मुख्य न्यायाधीश दलित समुदाय से हैं और उन पर यह हमला जातिगत पूर्वग्रहों को भी उजागर करता है। दलित मुख्य न्यायाधीश पर हमला सामाजिक न्याय और आरक्षण व्यवस्था पर भी सवाल उठाता है।
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लोकतंत्र के लिए चेतावनी: संयम और संवाद ही समाधान
कहना न होगा कि यह घटना धार्मिक ध्रुवीकरण को भी बढ़ावा देगी। भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष है, लेकिन हाल के वर्षों में धार्मिक टिप्पणियाँ राजनीतिक हथियार बनती रही हैं। मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी को कुछ ने हिंदू-विरोधी करार दिया, तो कइयों ने इसे उपहास बताया। सोशल मीडिया पर #सनातनअपमान जैसे ट्रैंड इसकी गवाही देते हैं। इसका प्रभाव धार्मिक तनाव को बढ़ाएगा, जो चुनावी राजनीति को प्रभावित करेगा।
विपक्ष इसे सरकार की नाकामी कहेगा, तो सत्ताधारी दल न्यायपालिका पर हमले का आरोप लगाएगा। इससे न्यायिक नियुक्तियों और धार्मिक संवेदनशीलता की ट्रेनिंग पर बहस को भी बल मिलेगा। यहाँ संस्थागत कमज़ोरी की तरफ भी इशारा ज़रूरी है। कोर्ट की सुरक्षा व्यवस्था क्यों विफल रही? वकीलों की ट्रेनिंग में नैतिकता का अभाव क्यों? क्या न्यायाधीशों के लिए भी संवेदनशीलता का प्रशिक्षण जरूरी नहीं?
निष्कर्षत, यह घटना लोकतंत्र के लिए ख़तरे का संकेत है। विनम्रतापूर्वक यह कहना ज़रूरी है कि न्यायाधीश गण भी अपनी टिप्पणियों में संयम बरतें, नागरिक शालीन विरोध करें और लोकतांत्रिक संस्थाएँ मजबूत हों। संवाद का मार्ग ही समाधान है। अन्यथा, न्याय के मंदिर के बार-बार कलंकित होने का खतरा है। भारत को एक परिपक्व लोकतंत्र चाहिए, जहाँ असहमति हिंसा न बने।
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