खिसियाए ट्रंप से सावधान, वह किसी भी हद तक जा सकते हैं

भविष्य के परिदृश्य का अनुमान लगाएं तो ट्रंप की व्यक्त/अव्यक्त रणनीतियों से निपटने के लिए हमें एच-1बी प्रोफेशनल वीजा, व्यापार और टैरिफ तथा पाकिस्तान और सऊदी अरब की पीठ पर हाथ रखकर भारत के विरूद्ध करवायी गई इनकी रक्षा डील, ऊर्जा और तेल बाजार में चाबहार पोर्ट पर डाले गये अड़ंगे और रूस और चीन के साथ रिश्तों पर डाले जा रहे दबाव से निपटने का वैकल्पिक रास्ता हर हाल में न सिर्फ तलाशना होगा बल्कि साथ ही साथ इस वैकल्पिक रास्ते पर चलना भी तुरंत शुरु कर देना होगा। तभी हम ट्रंप के आगे और पीछे से हमलों की इस रणनीति से पार पा सकते हैं। हमें अब बहुत दिन तक इस उम्मीद को लेकर खामोश नहीं रहना चाहिए कि कुछ दिन गुजरेंगे, तो ट्रंप का पारा भी उतर जायेगा। ट्रंप इतने सीधे नहीं हैं। उनसे डील करने के लिए हमें भी बिल्कुल सीधे नहीं रहना चाहिए।

जिन लोगों को लगता है ट्रंप प्रशासन द्वारा एच-1 बी वीजा एप्लीकेशन पर बढ़ायी गई एक लाख डॉलर की राशि भारत के सामने अमेरिकी प्रशासन द्वारा पेश की जा रही परेशानियों की हद है, वे लोग गलतफहमी में न रहें, ट्रंप अभी और नीचे जा सकते हैं। वह हिंदुस्तान को नीचा दिखाने के लिए अपनी खिसियाहट आने वाले दिनों में जिन कुछ और मुद्दों पर निकाल सकते हैं, वे द्विपक्षीय मंचों की बजाय यूएन, डब्ल्यूटीओ और क्लाइमेट समिट जैसे मंच हो सकते हैं क्योंकि ट्रंप प्रशासन चुन-चुनकर बदले लेने पर उतारू है और वह किसी भी हद के बाहर जाने के लिए हर तरह से तैयार बैठा है।

कोई बड़ी बात नहीं कि आने वाले दिनों में अमेरिका, भारत को दुनिया का सबसे बड़ा प्रदूषक घोषित करके हम पर दबाव डालने की कोशिश करे और डब्ल्यूटीओ के मंच में हमारी कृषि नीतियों पर आपत्ति जताकर भारत पर वैश्विक दबाव डलवाने की कोशिश करे, जिसका भारतीय किसानों और निर्यातकों पर सीधा असर हो सकता है तथा ग्रीन एनर्जी में भारत की रफ्तार थम सकती है।

दरअसल इसकी वजह यह है कि अमेरिका दुनियावी मामलों में हमारे स्पष्ट और तटस्थ रुख से परेशान हो गया है। वह हर हाल में भारत से चुनाव करवाना चाहता है कि हम या तो पूरी तरह से अमेरिका के कैंप को चुन लें या फिर अमेरिका का प्रकोप झेलें। रूस और चीन से भारत ने हाल के दिनों में अपने जिन रिश्तों का इजहार किया है, उससे आने वाले दिनों में अमेरिका हम पर तरह-तरह के दबाव डालने की कोशिश करेगा ताकि हमारी नॉन-एलाइंड और एस्ट्रेटेजिक एटोनॉमिक नीति कमजोर पड़ जाएं क्योंकि अमेरिका अपनी हरकतों से यह जतलाना चाहता है कि अगर हम संतुलन बनाये रखने की कोशिश करते हैं, तो इसका मतलब यह होगा कि अमेरिका के लिए इंडिया नॉट ट्रस्ट वर्थी माना जायेगा।

भारत की ठोस नीति और अमेरिका के दबाव का मुकाबला

सवाल है जिस तरह से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप व्यक्तिगत रूप से और अमेरिकी प्रशासन राष्ट्रीय स्तर पर भारत के खिलाफ एक से बढ़कर एक दबावों और परेशनियों की बाढ़ लगा रहे हैं, सवाल है आखिर भारत उनसे कैसे निपटें? इसमें कोई दो राय नहीं है कि हम जिस रास्ते पर चल पड़े हैं और जिसमें काफी दूर आ गये हैं, अब उसमें पीछे लौटने का कोई फायदा नहीं है क्योंकि अगर हम थक-हारकर अमेरिका के पहलु में भी जा गिरते हैं तो भी अमेरिका हम पर प्यार नहीं लुटाने वाला बल्कि हमारी इस जरूरत का और भी ज्यादा बदला लेने वाला है कि हम अपने हितों के लिए, उसके सामने तनकर कैसे खड़े हो सकते हैं?

दरअसल अमेरिका और ट्रंप की खिसियाहट यह है कि उन्होंने भारत का बहुत हल्का और अपने लिए मुफीद आंकलन किया था। उन्हें नहीं यकीन था कि भारत अपने हितों के लिए उसके सामने पलटकर खड़ा भी हो सकता है। हालांकि अगर ट्रंप को इस बात का एहसास होता कि हिंदुस्तान में छह महीने के भीतर कहीं न कहीं चुनाव होते रहते हैं और सरकारें व राजनीतिक पार्टियां हमेशा चुनावी मोड में होती हैं। जिस कारण चाहकर भी कोई सरकार या राजनीतिक पार्टी बड़े वोट बैंक को नाखुश करने का जोखिम मोल नहीं ले सकती।

भारत की ऊर्जा रणनीति और अमेरिका का दबाव

जबकि अमेरिका जिस तरह से हमारी कृषि और डेयरी क्षेत्र को अपने किसानों के लिए खुलवाना चाहता है और रूस, यूक्रेन युद्ध रूकवाने का श्रेय ट्रंप भारत से रूस के तेल खरीद से इनकार के जिम्मे डालना चाहते हैं, वो दोनो ही बातें भारत की आंतरिक राजनीति का समीकरण बिगाड़ देंगी। अगर मौजूदा सरकार अमेरिका को खुश करने के लिए रूस से तेल खरीदने के इनकार का फैसला कर ले तो यह आत्मघाती साबित होगा।

क्योंकि भारत न केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों की तनी रस्सी पर हर समय नट संतुलन साधने को मजबूर रहता है, साथ ही रूस हमारा आज भी सबसे बड़ा हथियार सप्लायर और विश्वसनीय स्ट्रेटेजिक पार्टनर है। ऐसे में भारत, रूस से हाथ धोने का या उसे झिटक देने का जोखिम अमेरिका को खुश करने के लिए नहीं ले सकता और वह भी तब जबकि डोनल्ड ट्रंप पल में तोला, पल में माशा की अपनी हरकतों पर किसी तरह विराम लगाने की बजाय उल्टे इसे बढ़ाते ही जा रहे हों।

जाहिर है भारत न तो अपनी ऊर्जा जरूरतों से समझौता कर सकता है और न ही किसी एक देश से तेल खरीदकर अपनी समूची ऊर्जा रणनीति को कमजोर कड़ी बनाना चाहता है। भारत, रूस, अफ्रीका और सऊदी अरब से तेल खरीदने का अपना समीकरण इसलिए संतुलित किये रहता है। अमेरिका चाहता है कि भारत बड़े पैमाने पर उससे तेल खरीदे। लेकिन जो आरोप हाल-फिलहाल के दिनों में अमेरिका ने भारत पर लगाया है कि रूस से कच्चा तेल खरीदकर हम उसे रिफाइन करके दुनिया को बेचकर फायदा उठाते हैं, आखिर अमेरिका भी तो वही करना चाहता है?

अमेरिकी तेल दबाव और भारत की स्वाभिमानी नीति

जब अमेरिका खुद मध्य पूर्व से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदता है, तो वह हमें क्यों बेचना चाहता है और अगर हमें वह उसी दर पर दे दे, जिस दर पर हम रूस से खरीद रहे हैं, तो भला भारत को क्या दिक्कत हो सकती है? ऐसी स्थिति में हम भले रूस से पूरी तरह से तेल खरीदना बंद न करें, पर बड़ी तादाद में अमेरिका से भी खरीदना शुरु कर सकते हैं। लेकिन अमेरिका यहां पर किसी किस्म का समझौता करने को तैयार नहीं है।

वह हमें रूस से काफी ज्यादा महंगी दर पर तेल बेचना चाहता है ताकि ऐसा करके वह हमसे अच्छी खासी कमाई कर सके। खुल्लम-खुल्ला अपने फायदे की बात इस तरह सोचने वाला अमेरिका हम पर किस मुंह से आरोप लगा सकता है कि हम रूस के बजाय उससे तेल क्यों नहीं खरीद रहे? यही नहीं अमेरिका से भारत तक तेल पहुंचाने का परिवहन खर्च भी काफी ज्यादा हो जायेगा। कुल मिलाकर भारत, अमेरिका की धौंस पर उसके लिए तेल खरीदकर सोने की मुर्गी नहीं साबित होना चाहता और ऐसा करना हमारा हक है।

बहरहाल हमारे हित बिल्कुल वाजिब हैं और सबको स्पष्ट रूप से दिखते भी हैं। लेकिन आज की दुनिया में सिर्फ तर्क से बात नहीं बनती, उन तर्कों को हमें अपने पक्ष में इस्तेमाल करने के आधार भी ढूंढ़ने होंगे। इसलिए अमेरिका से किसी तरह की राहत की उम्मीद किये बिना और अभी तक उसने अपने जिन और खूंखार चेहरों को नहीं दिखाया, उनके देखने का इंतजार किये बिना हमें हर हाल में अमेरिका द्वारा खड़ी की गई बाधाओं का विकल्प तलाशना होगा।

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भारत की रणनीति: ट्रंप दबाव से निकलने का रास्ता

जहां तक निर्यात बाजार के लिए विकल्प तलाशने की बात है, तो यूरोप और एशिया पैसिफिक पर हमें दांव लगाना ही होगा। भले हम इस दौरान अमेरिका के साथ भी अपनी विनम्रता बनाये रखें, लेकिन हमें मजबूत विकल्प तलाशने के लिए यूरोप और एशिया पैसिफिक की ओर बहुत तेजी और बहुत मजबूती से कदम बढ़ाना ही होगा। हमें डिजिटल और ग्रीन सेक्टर में अपनी आत्मनिर्भरता हर हाल में बढ़ानी होगी और अमेरिकी बाधाओं को तात्कालिक चुनौतियां मानते हुए हमें अगले कुछ सालों तक हर समय इसमें जुटे रहना होगा।

-लोकमित्र गौतम
-लोकमित्र गौतम

कुल मिलाकर भविष्य के परिदृश्य का अनुमान लगाएं तो ट्रंप की व्यक्त/अव्यक्त रणनीतियों से निपटने के लिए हमें एच-1बी प्रोफेशनल वीजा, व्यापार और टैरिफ तथा पाकिस्तान और सऊदी अरब की पीठ पर हाथ रखकर भारत के विरूद्ध करवायी गई इनकी रक्षा डील, ऊर्जा और तेल बाजार में चाबहार पोर्ट पर डाले गये अड़ंगे और रूस और चीन के साथ रिश्तों पर डाले जा रहे दबाव से निपटने का वैकल्पिक रास्ता हर हाल में न सिर्फ तलाशना होगा बल्कि साथ ही साथ इस वैकल्पिक रास्ते पर चलना भी तुरंत शुरु कर देना होगा। तभी हम ट्रंप के आगे और पीछे से हमलों की इस रणनीति से पार पा सकते हैं। हमें अब बहुत दिन तक इस उम्मीद को लेकर खामोश नहीं रहना चाहिए कि कुछ दिन गुजरेंगे, तो ट्रंप का पारा भी उतर जायेगा। ट्रंप इतने सीधे नहीं हैं। उनसे डील करने के लिए हमें भी बिल्कुल सीधे नहीं रहना चाहिए।

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