तंत्र-साधना की सिद्ध रात है भाद्रपद अमावस्या

आज भाद्रपद अमावस्या है। इसे कुशेत्पाटिनी अमावस्या भी कहते हैं। इस अमावस्या का विशेष रूप से तंत्र साधना, पितृ तर्पण और श्राद्ध करने के लिए महत्व है। इस दिन ही धार्मिक काम-काज के लिए कुशा एकत्र की जाती है। यह दिन पितरों को समर्पित होता है, इसलिए इस दिन पिंड-दान एवं तर्पण और श्राद्ध जैसे अनुष्ठान किए जाते हैं।

यह तिथि विशेष रूप से दो और बातों के लिए भी प्रसिद्ध है। एक, काल सर्प दोष से मुक्ति पाने के लिए इस दिन विशेष उपाय किये जाते हैं और दूसरी, तंत्र साधना के लिए। भाद्रपद अमावस्या को विशेष रूप से गुप्त साधनाओं हेतु उपयुक्त माना जाता है। इसलिए तंत्र विद्या में इस अमावस्या की रात को सिद्ध रात कहा जाता है। इस रात विभिन्न शक्तिपीठों में गुप्त रूप से साधना की जाती है, जिसके इच्छित फल मिलते हैं।

हिंदू पंचांग के मुताबिक भाद्रपद अमावस्या भादो माह के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि होती है। इस तिथि को आकाश में चंद्रमा दृष्टिगोचर नहीं होता। भाद्रपद अमावस्या से पितृ पक्ष की शुरुआत मानी जाती है। इस दिन से पूर्वजों के तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म किये जाते हैं। माना जाता है कि इस दिन पितृ लोक के द्वार खुलते हैं और पूर्वज अपने परिजनों से तर्पण ग्रहण करने हेतु पृथ्वी पर आते हैं।

भाद्रपद अमावस्या : पितृ तर्पण, दान और आध्यात्मिक महत्व

इस दिन किया गया जल दान, अन्न दान और श्राद्ध कर्म विशेष रूप से फलदायी माने जाते हैं। इस दिन गंगा, यमुना, नर्मदा जैसी पवित्र नदियों में स्नान करने का विशेष पुण्य फल बताया गया है। लोग इस दिन अपने पूर्वजों के नाम से तिल, जल, वस्त्र और अन्न का दान करते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

भाद्रपद अमावस्या को काल भैरव और शनि देव की पूजा भी विशेष रूप से की जाती है। माना जाता है कि ऐसा करने से जीवन के संकट, रोग, शत्रु बाधाएं और मानसिक परेशानियां कम होती हैं। भाद्रपद अमावस्या हमें यह सिखाती है कि जीवन के अंधकारमय पक्षों को भी स्वीकार करना जरूरी है, तभी हमारा समग्र रूप से आत्मिक विकास होता है। इस तिथि को आत्मिक शुद्धि और मानसिक उन्नति के लिए भी उत्तम माना जाता है।

याद रखिए, अब पूरी दुनिया हिंदू धर्म में की जाने वाली पितृ-पूजा को बहुत आदर व सम्मान के साथ देखती है। यह महज कर्मकांड नहीं है, बल्कि अपने पूर्वजों के साथ आत्मिक जुड़ाव का एक जरिया भी है। वास्तव में यह दिन और यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि हम अकेले नहीं हैं। हमारे साथ हमारे पितरों का आशीष, अनुभव और संस्कार भी हैं। भाद्रपद अमावस्या को परिजन मिलकर पितरों की पूजा करते हैं।

भाद्रपद अमावस्या : संस्कृति, आस्था और पूर्वजों का संगम

इसमें एक आत्मीय सामूहिक भाव होता है, जिससे आपसी संबंधों की डोर मजबूत होती है। भारत के विभिन्न हिस्सों में खासकर पूर्वी उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल और मध्यप्रदेश में विभिन्न नदियों के किनारे भाद्रपद अमावस्या को मेले लगते हैं और धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। कहीं कहीं पूरा गांव मिलकर पितरों की पूजा करते हैं। इस दिन पीपल के वृक्ष की भी पूजा करने का विधान है।

माना जाता है कि बरमदेव की इस दिन पूजा करने से पितरों की हमें विशेष कृपा प्राप्त होती है। कुछ क्षेत्रों में इस तिथि पर नई फसल के पहले फल या बीज पितरों को समर्पित किए जाते हैं। भाद्रपद अमावस्या के समय वर्षा ऋतु लगभग समाप्त हो रही होती है, सो इस दिन किसान अन्नपूर्णा (धरती) की पूजा करते हैं।

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सांस्कृतिक विस्तार और आध्यात्मिक गहनता के परिप्रेक्ष में देखें तो भाद्रपद अमावस्या केवल एक तिथि नहीं बल्कि हमारी संस्कृति, आस्था और आत्मीय संबंधों का संगम है। यह अमावस्या हमें अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर देती है। हमें आत्मीक रूप से मजबूत बनाती है। भाद्रपद अमावस्या सीख देती है कि चाहे जीवन में कितना भी अंधकार हो, लेकिन आस्था, ध्यान और परंपरा के दीयों से इस अंधकार को दूर किया जा सकता है।

आर.सी.शर्मा

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