भारत के लिए संकट नहीं बनेगा ब्रह्मपुत्र का पानी

दरअसल ब्रह्मपुत्र का पानी अधिक मात्रा में छोड़ने या रोकने से भारत पर बहुत बड़ा असर पड़ने वाला नहीं है क्योंकि नदी का जलभराव क्षेत्र का 22 से 30 फीसदी हिस्सा चीन में है, वहीं 21 फीसदी जल चीन से आता है। तिब्बती जल स्रोतों, बारिश और हिमनदों के पिघलने से यह पानी नदी में आता है। भूटान एक छोटा देश जरूर है, लेकिन ब्रह्मपुत्र नदी में उसका भी योगदान चीन के बराबर करीब 21 फीसदी है। जबकि भूटान में नदी का बहाव क्षेत्र केवल 7 फीसदी हिस्से में है। वहीं भारत में यह 34 फीसदी के करीब है। परिणामत ब्रह्मपुत्र में सबसे ज्यादा पानी भारत से ही जाता है। यह करीब 39 प्रतिशत है। भारत में प्रवेश करने से पहले ब्रह्मपुत्र में केवल 14 फीसदी पानी ही शेष बचता है। बाकी जो पानी बढ़ता है, वह भारतीय जल स्रोतों से ही बढ़ता है। चूंकि चीन का पानी पहले से ही बहुत कम है, इसलिए चीन जल प्रवाह रोकता भी है तो उसका भारत पर ज्यादा असर पड़ने वाला नहीं है।

ऑपरेशन सिंदूर और सिंधु जल संधि के निलंबन से आहत पाकिस्तान भारत को सबक सिखाने के दिन में स्वप्न देख रहा है। चीन के पिट्ठू पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ के सलाहकार राणा अहसान अफजल ने हाल ही में एक नई धमकी देते हुए कहा है कि यदि चीन ब्रह्मपुत्र का पानी रोक दे तो भारत का क्या हाल होगा? चूंकि पाकिस्तान न तो ब्रह्मपुत्र के भूगोल से परिचित है और न ही पानी के प्रवाह के तकनीकी के ज्ञान से?

इसलिए इस भूगोल और तकनीक का ज्ञान असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कराकर पाक के नैरेटिव की हवा निकाल दी। बिस्वा ने अपनी एक्स पोस्ट पर ठोस तथ्यों के साथ लिखा कि ब्रह्मपुत्र एक ऐसी नदी है, जिसका प्रवाह भारत में घटता-बढ़ता नहीं है। अतएव नदी को अपना प्रवाह बनाए रखने के लिए चीन के पानी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है। ब्रह्मपुत्र के कुल जल प्रवाह में चीन केवल 30 से 35 प्रतिशत तक का योगदान देता है।

यह भी ज्यादातर हिमनदों के पिघलने और बारिश से मिलता है। शेष 65 से 70 प्रतिशत जल भारत में बहने वाली ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियों से मिलता है। इसलिए यह नदी भारत में प्रवेश के बाद सशक्त हो जाती है। अतएव यह वर्षा जल से पोषित भारतीय नदी प्रणाली का हिस्सा है न कि किसी एक जल स्रोत पर निर्भर है। पाकिस्तान को यह सच्चाई जाननी चाहिए। फिर भी चीन ब्रह्मपुत्र के जल को कम करता भी है तो वह भारत के लिए मददगार ही साबित होगा क्योंकि इस नदी की बाढ़ से प्रतिवर्ष लाखों लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ता है।

चीन का ब्रह्मपुत्र जल पर भारत-बांग्लादेश विवाद

ब्रह्मपुत्र नदी के पानी को लेकर चीन का भारत से ही नहीं बांग्लादेश से भी विवाद है। इस नदी पर कई बांध बनाकर चीन ने ऐसे जल प्रबंध कर लिये हैं कि वह जब चाहे तब भारत और बांग्लादेश में पानी के प्रवाह को रोक दे और जब चाहे तब ज्यादा पानी छोड़कर ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे बसे इलाकों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न कर दे। चीन ने ऐसी हरकत करते हुए साल 2016 में भारत में जलापूर्ति करने वाली ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी जियाबुकू का पानी रोक भी दिया था।

लेकिन इसका असर पूर्वोत्तर की कृषि पर देखने में नहीं आया था। ब्रह्मपुत्र एशिया की सबसे लम्बी नदी है। इस नदी की लम्बाई 3000 किमी है। इसी की सहायक नदी जियाबुकू है जिस पर चीन हाइड्रो प्रोजेक्ट बना रहा है। दुनिया की सबसे लम्बी नदियों में 29वाँ स्थान रखने वाली ब्रह्मपुत्र 1625 किमी तिब्बत क्षेत्र में बहती है। इसके बाद 918 किमी भारत और 363 किमी की लम्बाई में बांग्लादेश में बहती है।

समुद्री तट से 3300 मीटर की ऊँचाई पर तिब्बती क्षेत्र में बहने वाली इस नदी पर चीन ने 12वीं पंचवर्षीय योजना के तहत तीन पनबिजली परियोजनाएं निर्माण के प्रस्ताव पहले ही मंजूर कर चुका है और अब नए बांध निर्माण को मंजूरी दे दी है। चीन इन बांधों का निर्माण अपनी आबादी के लिये व्यापार, सिंचाई, बिजली और पेयजल समस्याओं के निदान के उद्देश्य से कर रहा है, लेकिन उसका इन बांधों और जल सुरंगों के निर्माण की पृष्ठभूमि में छिपा एजेंडा, खासतौर से भारत के खिलाफ जल हथियार के रूप में रणनीतिक इस्तेमाल के रूप में भी देखा जाता है।

चीन का ब्रह्मपुत्र जल पर स्वार्थ और भारत की परियोजनाएं

लेकिन यदि चीन ब्रह्मपुत्र के पानी को औजार बनाता है तो भारत से कहीं ज्यादा चीन की ही बिजली, सिंचाई और पेयजल योजनाएं प्रभावित होंगी। दरअसल चीन में बढ़ती आबादी के चलते इस समय 886 नगर और 110 बड़े नगर पानी के गंभीर संकट से जूझ रहे हैं। उद्योगों और कृषि सम्बन्धी जरूरतों के लिये भी चीन को बड़ी मात्रा में पानी की जरूरत है। चीन ब्रह्मपुत्र के पानी का अनूठा इस्तेमाल करते हुए अपने शिनजियांग, जांझु और मंगोलिया इलाकों में फैले व विस्तृत हो रहे रेगिस्तान को भी नियंत्रित करना चाहता है।

चीन की यह नियति रही है कि वह अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिये पड़ोसी देशों की कभी परवाह नहीं करता। चीन ब्रह्मपुत्र के पानी का मनचाहे उद्देश्यों के लिये उपयोग करता है तो तय है, अरुणाचल में जो 17 पनबिजली परियोजनाएं प्रस्तावित व निर्माणाधीन हैं, इनके अटकने के अनुमान लगा लिए जाते हैं। ये परियोजनाएँ पूरी हो जाती हैं और ब्रह्मपुत्र से इन्हें पानी मिलता रहता है तो इनसे 37827 मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा।

इस बिजली से पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में बिजली की आपूर्ति तो होगी ही, पश्चिम बंगाल और उडीसा को भी अरुणाचल बिजली बेचने लग जाएगा। चीन अरुणाचल पर जो टेढ़ी निगाह बनाए रखता है, उसका एक बड़ा कारण अरुणाचल में ब्रह्मपुत्र की जलधारा ऐसे पहाड़ व पठारों से गुजरती है, जहां भारत को मध्यम व लघु बांध बनाना आसान है। ये सभी बांध भविष्य में अस्तित्व में आ जाते हैं और पानी का प्रवाह बना रहता है तो पूर्वोत्तर के सातों राज्यों की बिजली, सिंचाई और पेयजल जैसे बुनियादी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। पिछले 11 साल में इन बांधों के निर्माण में तेजी आई है।

ब्रह्मपुत्र जल पर चीन की नीति और वैश्विक संधियां

चीन के साथ सुविधा यह है कि वह अपनी नदियों के जल को अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानकर चलता है। पानी को एक उपभोक्ता वस्तु मानकर वह उसका अपने हितों के लिये अधिकतम दोहन में लगा है। बौद्ध धर्मावलम्बी चीन परम्परा और आधुनिकता के बीच मध्यमार्गी सामंजस्य बनाकर चल रहा है। जो नीतियां एक बार मंजूर हो जाती हैं, उनके अमल में चीन कड़ा रुख और भौतिकवादी दृष्टिकोण अपनाता है।

इसलिये वहां परियोजना के निर्माण में धर्म और पर्यावरण सम्बन्धी समस्याएं रोड़ा नहीं बनती। नतीजतन एक बार कोई परियोजना कागज पर आकार ले लेती है तो वह आरंभ होने के बाद निर्धारित समयावधि में लगभग पूरी हो जाती है। चीन और भारत के बीच ब्रह्मपुत्र के जल-बंटवारे को लेकर विवाद और टकराव बढ़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पानी के उपयोग को लेकर कई संधियां हुई हैं।

इनमें संयुक्त राष्ट्र की पानी के उपभोग को लेकर 1997 में हुई संधि के प्रस्ताव पर अमल किया जाता है। इस संधि के प्रारूप में प्रावधान है कि जब कोई नदी दो या इससे ज्यादा देशों में बहती है तो जिन देशों में इसका प्रवाह है, वहां उसके पानी पर उस देश का समान अधिकार होगा। इस लिहाज से चीन को सोची-समझी रणनीति के तहत पानी रोकने या उसकी धारा बदलने का अधिकार है ही नहीं।

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भारत पर ब्रह्मपुत्र जल प्रवाह का वास्तविक प्रभाव

इस संधि में जल प्रवाह के आंकड़े साझा करने की शर्त भी शामिल है। लेकिन चीन संयुक्त राष्ट्र की इस संधि की शर्तों को मानने के लिये इसलिये बाध्यकारी नहीं है, क्योंकि इस संधि पर अब तक चीन और भारत ने हस्ताक्षर ही नहीं किए हैं। दरअसल ब्रह्मपुत्र का पानी अधिक मात्रा में छोड़ने या रोकने से भारत पर बहुत बड़ा असर पड़ने वाला नहीं है क्योंकि नदी का जलभराव क्षेत्र का 22 से 30 फीसदी हिस्सा चीन में है, वहीं 21 फीसदी जल चीन से आता है।

तिब्बती जल स्रोतों, बारिश और हिमनदों के पिघलने से यह पानी नदी में आता है। भूटान एक छोटा देश जरूर है, लेकिन ब्रह्मपुत्र नदी में उसका भी योगदान चीन के बराबर करीब 21 फीसदी है। जबकि भूटान में नदी का बहाव क्षेत्र केवल 7 फीसदी हिस्से में है। वहीं भारत में यह 34 फीसदी के करीब है। परिणामत ब्रह्मपुत्र में सबसे ज्यादा पानी भारत से ही जाता है। यह करीब 39 प्रतिशत है। भारत में प्रवेश करने से पहले ब्रह्मपुत्र में केवल 14 फीसदी पानी ही शेष बचता है।

-प्रमोद भार्गव
-प्रमोद भार्गव

बाकी जो पानी बढ़ता है, वह भारतीय जल स्रोतों से ही बढ़ता है। चूंकि चीन का पानी पहले से ही बहुत कम है, इसलिए चीन जल प्रवाह रोकता भी है तो उसका भारत पर ज्यादा असर पड़ने वाला नहीं है। मानसून के समय चीन सीमा पर पानी भारत की तुलना में सात गुना तक कम रहता है। अतएव हिमंत बिस्वा ने कड़ा जबाव देकर पाकिस्तान की बोलती बंद कर दी है।

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