मृत्यु को धोखा नहीं दे सकते

मृत्यु अवश्यंभावी है। इससे आज तक कोई नहीं बच सका। जिन्हें हम भगवान मानते हैं यानी भगवान राम, भगवान श्रीकृष्ण आदि भी इस असार संसार में हमेशा के लिए नहीं रहे अपितु निश्चित अवधि के पश्चात यहाँ से विदा हो गए। मरणधर्मा कहे जाने वाले इस संसार में मृत्यु निश्चित है। इसे हम धोखा नहीं दे सकते। हम मनुष्यों की तरह यह किसी के झाँसे में नहीं आती। न ही यह किसी धनवान के द्वारा खरीदी जा सकती है। यह अपना कार्य बहुत दक्षता से करती है।

प्रत्येक जीवधारी को इस धरा पर अपने कर्मानुसार निश्चित समय के लिए ही जीवन मिलता है। किसी को कुछ पल के लिए जीवन मिलता है तो किसी को सैंकड़ों बरस के लिए। चौरासी लाख योनियों में जीव को किस योनि में जन्म मिलता है, यह उसके पूर्वकृत कर्मों के अनुसार निर्धारित होता है। केवल मनुष्य योनि को ही कर्मयोनि कहा जाता है, शेष सभी भोगयोनि कहलाती हैं। इन सभी योनियों में अपने कुकृत्यों या दुष्कर्मों का फल भोगने के पश्चात ही मानव के रूप में जीव का जन्म होता है।

मानव योनि जीव की बपौती नहीं है कि वह सदा ही मनुष्य योनि ही प्राप्त करता रहेगा। यदि मानव तन पाकर भी वह सत्कर्म नहीं करेगा तो फिर उसे मानवेतर योनियों में जन्म मिलेगा। जीव इन योनियों में भटकता रहता है। एक जन्म के बाद मृत्यु और मृत्यु के बाद पुन: जन्म- यही ाढम निरंतर चलता रहता है जब तक जीव मोक्ष के अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेता।

मृत्यु को चकमा देने की असफल कोशिश

बचपन में एक कहानी पढ़ी थी कि एक महान मूर्तिकार मरना नहीं चाहता था। उसने मृत्यु को चकमा देने के लिए एक उपाय सोचा। एक समय ऐसा आया कि जब उसे प्रतीत हुआ कि मृत्यु का समय अब समीप आने लगा है तो उसने अपने जैसी कई मूर्तियाँ बनाकर कमरे में रख दीं और स्वयं भी उनके बीच में जाकर खड़ा हो गया। उसे लगा कि उसे अब मृत्यु का देवता पहचान नहीं सकेगा और वह बच जाएगा।

कहते हैं, जब यमराज उसे लेने के लिए आए तो इतनी सारी सजीव मूर्तियों के बीच छिपे मूर्तिकार को खोज नहीं पाए। तब उन्होंने उसे ढूँढने के लिए जुगत भिड़ाई और कहा, जिस भी मूर्तिकार ने ये सुन्दर और सजीव मूर्तियाँ बनाई हैं, उसने वाकई चमत्कार किया है। ये मूर्तियाँ सचमुच ही बहुत खूबसूरत हैं, पर इनमें एक कमी रह गई है।

यह सुनकर उस मूर्तिकार को धक्का लगा। फौरन बाहर आकर उसने पूछा, क्या कमी रह गई है इन मूर्तियों में? तब हंसते हुए यमराज ने कहा, इनमें कोई कमी नहीं है, पर तुममें कमी रह गई, जो तुम इन मूर्तियों से बाहर निकलकर बोल पड़े। कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य कितने ही मजबूत किले बनाकर स्वयं को सुरक्षित कर लेने का दंभ भरे या मूर्तिकार की तरह मौत को चकमा देने की कोशिश करे, उसे सफलता नहीं मिल सकती।

जो सत्य में जिया, वह हँसकर मृत्यु को गले लगाता है

मृत्यु के पंजे में फंसा वह उससे किसी भी तरह छूट नहीं सकता। सार रूप में हम यही समझ सकते हैं कि जन्म से लेकर अन्तिम दिन तक मौत की तलवार हमारे सिर पर लटकती रहती है। जैसे कबूतर आँख बंद कर ले और सोचे कि बिल्ली चली गई है और अब मैं सुरक्षित हो गया हूँ। वास्तव में इस प्रकार सोचना उसकी भूल होती है। वह बिल्ली तो अपना शिकार सरलता से पकड़ लेती है और वह बेचारा कबूतर सोचता ही रह जाता है।

इसी प्रकार यदि हम अपने सिर पर लटकती तलवार को देखकर भी अनजान बने रहना चाहते हैं तो मृत्यु को कोई अंतर नहीं पड़ने वाला। पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार मिला हुआ हमारा समय जब पूरा हो जाएगा तब वह मृत्यु हमारे शरीर में विद्यमान इस आत्मा को बिना आगे-पीछे देखे लेकर चल पड़ेगी। जीव को विवशता से मृत्यु का दामन थामना पड़ता है। जो महात्मा जन होते हैं, वे हंसते-हंसते मृत्यु को गले लगा लेते हैं। इसके विपरीत अधर्म करने वाले लोग रोते-रोते मृत्यु के साथ जाते हैं।

मृत्यु तो एक-न-एक दिन हमारे पास आनी ही है, इसलिए उससे क्या डरना? मृत्यु अटल सत्य है। उसका स्वागत प्रसन्न होकर करना चाहिए। इसका डर उन लोगों को होता है, जो सच्चाई व ईमानदारी के रास्ते को छोड़कर गलत रास्ते पर चलकर जीवन बर्बाद कर लेते हैं। जो सत्य के मार्ग पर चलते हैं, वे हंसते हुए उसे गले लगाने के लिए उसकी प्रतीक्षा में तैयार बैठे रहते हैं।

चन्द्र प्रभा सूद

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