सावन में शिवमय होती सृष्टि

सावन

सावन के महीने में विश्वभर के शिवालय भक्तों की भीड़ तथा हर-हर महादेव एवं बोल बम के घोष से गूंजित शिवमय हो जाते हैं। संसार अपने जीवन के विभिन्न पापों, तापों और संतापों को मिटाने की उत्कट अभिलाषा लिए शिवालयों की ओर दौड़ पड़ता है। यह भगवान शिव के प्रति भक्तों की सोद्देश्य आस्था एवं भक्ति का द्योतक है। पुराणों में वर्णित है कि सावन में होने वाली रिमझिम वर्षा से प्रकृति भगवान शिव के रुद्र रूप का अभिषेक करती है।

जो सभी का कल्याण करने और सबको शुभता प्रदान करने वाले भगवान हैं, जिन्हें देवाधिदेव महादेव कहा जाता है, उनकी आराधना में जब संपूर्ण चराचर सफष्टि तल्लीन हो जाती है, तब इस विशेष अवधि में निश्चित रूप से हमें भी उन भगवान शिव के रुद्र रूप की पूजा, आराधना, उपासना अवश्य करनी चाहिए, जो सबका मंगल करने वाले हैं। सर्वे भवंतु सुखिन.. की शाश्वत चेतना को साकार करते हुए, जागतिक कल्याण की भावना एवं सर्वमंगल की कामना से ओत-प्रोत होकर सफष्टि के आरंभ से हमारे पूर्वज सावन में भगवान शिव के रुद्र रूप की पूजा या उपासना आदि करते आए हैं।

जागतिक कल्याण की वह पौरणिक भावना एवं सर्वमंगल की शाश्वत कामना भले ही आज उस रूप में विद्यमान न रही हो, परंतु सनातन धर्मावलंबियों के लिए सावन के महीने में रुद्र पूजा आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसीलिए आज भी हिंदू सावन महीने में रुद्र पूजा करते हैं। धार्मिक दृष्टि से देखा जाए तो सनातन धर्म में आस्था रखने वाले भक्त वर्षभर भगवान भोलेनाथ की भक्ति, पूजा, आराधना करते हैं, किन्तु देवशयनी एकादशी से चातुर्मास व्रत आरंभ होने के कारण इस दिन से साधु-संत और तपस्वीगण पारंपरिक रूप से एक ही स्थान पर रहते हुए स्वाध्याय, तप, साधना, प्रवचन इत्यादि करते हैं।

सावन में शिव आराधना का पौराणिक महत्व

इस अवधि में सफष्टि के संचालन का कार्यभार महादेव अपने हाथों में ले लेते हैं, ताकि सफष्टि के समस्त कार्य-व्यवहार यथावत चलते रहें। इसी समय सावन में भगवान शिव की भक्ति, सेवा पूजा, आराधना और महिमा के लिए प्राचीन काल से विख्यात है। भगवान शिव के संबंधों में निहित आध्यात्मिक दृष्टिकोण देवी सती की उस कथा में स्पष्ट परिलक्षित होती है, जिसके अनुसार उन्होंने अपने पिता दक्ष के द्वारा पति भोलेनाथ का अपमान किए जाने से दुःखी होकर योग-शक्ति से अपने शरीर का वहीं तत्काल त्याग कर दिया था।

मान्यता है कि भगवान शिव प्रत्येक वर्ष सावन के महीने में भूलोक पर अवतरित होकर अपने ससुराल आते हैं, जो भूलोक वासियों के लिए भक्ति, पूजा, सेवा, आराधना और उपासना के द्वारा शिव-कृपा प्राप्त करने का सर्वोत्तम समय होता है।
शिव और सावन के बीच के विशेष संबंधों का दूसरा प्रमुख आधार पौराणिक कथाओं में वर्णित कल्याणकारी एवं समुद्र-मंथन का प्रसंग भी है। मान्यता है कि हिन्दू संस्कृति में विशेष रूप से महत्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय समुद्र-मंथन का कार्य सावन के महीने में ही संपन्न हुआ था।

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इससे निकले विष की भयावहता को देखते हुए, महाकल्याणी महादेव ने संपूर्ण विश्व को किसी भी प्रकार के अनिष्ट से बचाने हेतु उसे अपने कंठ में धारण कर लिया था, जिससे महादेव का कंठ नीलवर्णी हो गया और वे नीलकंठ कहलाए। विषपान से उत्पन्न ताप को दूर करने तथा भगवान भोलेनाथ शिव शंकर ( को शीतलता प्रदान करने के लिए मेघराज इंद्र ने घनघोर वर्षा की। सभी देवी-देवताओं ने भी उन्हें जल अर्पित किया था। इससे भगवान शिव का ताप कम हुआ और उन्हें शांति मिली। मान्यता है कि तब से महादेव का अभिषेक करने की परंपरा प्रारंभ हुई।

चेतनादित्य आलोक

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