मृत्यु भोज

उसके तीन बेटे थे- सुरेश, महेश और विजय। सुरेश सबसे बड़ा, महेश बीच का और विजय सबसे छोटा। इनमें सिर्फ सुरेश की ही शादी हुई थी। सुरेश ने पंडित जी के कहने पर रीति-रिवाज़ों के अनुसार मृत्यु-भोज का आयोजन किया था।

परिवार में सबसे बड़ा होने के कारण उसकी यह जिम्मेदारी भी थी। घर के आंगन के बाहर उसके स्वयं के खेत में एक ओर बड़ी-बड़ी डेगें चढ़ चुकी थीं, सफेद टेंट लग चुका था और तेरहवीं की व्यवस्था में गाँव के कई लोग लगे थे।

इस भीड़ में एक चेहरा ऐसा था, जो कहीं नहीं दिख रहा था- रामनाथ की बहू कादंबनी। वह अभी तक गांव में बने छप्परनुमा कमरे से बाहर नहीं निकली थी। उसकी आँखों के आँसू जैसे सूख चुके थे। उसके मन में टीस अभी भी जैसे कहीं न कहीं धधक रही थी। रामनाथ के जीते जी उसकी हैसियत घर में बस एक काम करने वाली बाई से अधिक नहीं थी।

मौन और चक्की की आवाज़ में दबी कादंबनी की पीड़ा

किसी छोटी-सी ग़लती पर भी वह ताने पर ताने सुनती थी। उसे बात-बात पर अपमान व पीड़ा सहने की जैसे आदत हो चली थी।पति सुरेश थोड़ा-बहुत पढ़ा-लिखा था। उसे सब बातों का अच्छी तरह से पता भी था, लेकिन वह कादंबनी को कभी खुलकर सम्मान नहीं दे पाया था। कादंबनी की सास तो जैसे उसके अस्तित्व को ही भूल गई थी। अब रामनाथ के स्वर्ग सिधारने के बाद कुछ बदलने की आशा थी।

शायद अब कोई उसकी बात सुनेगा, शायद अब उसकी आँखों के आँसू किसी को दिखेंगे। परंतु मृत्यु-भोज की तैयारियों ने यह बिल्कुल स़ाफ कर दिया कि अब भी उसकी भूमिका सिर्फ और सिर्फ रसोई तक ही सीमित है। कादंबनी, जल्दी से आटा पीस दे। पंडित जी पहुंच चुके हैं। बाहर से सास की आवाज़ उसके कानों में गूंजी।

कादंबनी चुपचाप चक्की पर आटा पीस रही थी, वह न जाने कब से आटा पीसने में लगी थी, लेकिन उसे बहुत-सा गेहूं पीसना था। उसके हाथ चक्की पर चल रहे थे, लेकिन मन कहीं और भटक रहा था। शाम ढलने लगी थी। कादंबनी ने जब तक सारा गेहूं पीसा और घर के अन्य छोटे-मोटे काम निपटाये तब तक सारे आगंतुक खाना खाकर जा चुके थे और पंडित जी घर के एक जगह पर बैठे प्रसन्न मुद्रा में मंत्र पर मंत्र बुदबुदा रहे थे।

कादंबनी की चुप्पी का अंतिम विदा

तभी कादंबनी अचानक चुपचाप उठी और घर के पिछवाड़े में खेतों की ओर चली गई। वहाँ एक खेजड़ी के पेड़ के नीचे रामनाथ की चिता की राख़ अब भी हल्के-हल्के सुलग रही थी। वह दस-पंद्रह मिनट तक चिता के पास कुछ सोचते हुए खड़ी रही। न जाने उसके मन में उस समय क्या चल रहा था।

फिर उसने धीरे-से रामनाथ की चिता में से एक मुट्ठी राख़ उठाई और मन ही मन फुसफुसाई आपके लिए इतना सब कुछ किया गया, लेकिन क्या आपने कभी मेरे लिए कुछ किया, मेरे मौन, मेरी चुप्पी, मेरी टीस, मेरे दुःख, मेरी पीड़ा को क्या आपने कभी समझा बाबूजी? फुसफुसाते हुए राख़ को हाथ से हवा में उड़ाकर घर लौट आई।

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अगले दिन अलसुबह गाँव में हलचल थी। गांव के लोग आपस में बतिया रहे थे कि कादंबनी ने मृत्यु-भोज के बाद अपना घर-बार छोड़ दिया। बिना किसी को कुछ कहे, बिना कुछ लिए। आखिर ऐसा क्या हुआ? गांव में किसी को भी यह नहीं पता था कि आखिर वो गई तो कहाँ गई? गाँव की कुछ बुज़ुर्ग महिलाएं चुपचाप आपस में एक-दूसरे से कह रही थीं- कादंबनी ने असली मृत्यु-भोज रामनाथ के गुजर जाने के बाद मनाया। अपनी चुप्पी, अपने मौन, अपनी टीस को चिता में जलाकर।

-सुनील कुमार महला

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