दिवाली को यूनेस्को मान्यता, पर्यटन को मिलेगा नया बढ़ावा

नई दिल्ली, दिल्ली समेत देशभर में धूमधाम से मनाई जाने वाली दीपावली के त्योहार को यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक संगठन) ने मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (Intangible Cultural Heritage) की सूची में बुधवार को शामिल किया है. इसका ऐलान दिल्ली में आयोजित यूनेस्को अंतर-सरकारी समिति के 20वें सत्र में लिया गया. यह देश के लिए एक ऐतिहासिक और गौरवपूर्ण क्षण है, क्योंकि यह भारत की ओर से 16वां दावा हैI


दरअसल, दीपावली, एक ऐसा त्योहार जो अंधकार पर प्रकाश, बुराई पर अच्छाई और अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक है, अब यह एक वैश्विक धरोहर बन गया है इस उपलब्धि के महत्व को समझने के लिए आइए जानते हैं इस सूची में शामिल होने की प्रक्रिया और इससे भारत को होने वाले व्यापक लाभ के बारे में सीएम रेखा गुप्ता ने एक्स पर वीडियो पोस्ट कर लिखा कि आज दीपावली विश्व द्वारा मान्य धरोहर हैI

 सनातन संस्कृति की प्रतिष्ठा का प्रमाण है आने वाली पीढ़ियां इस दिन को याद रखेंगी, जब दीपावली घर-आंगन, चौखट और मंदिरों से आगे बढ़कर वैश्विक मंच पर पहुंची और माननीय प्रधानमंत्री के नेतृत्व में विश्व-धरोहर का सम्मान प्राप्त कर भारत की सांस्कृतिक चेतना ने नया उत्कर्ष पाया,  हमारा अनंत, सनातन इतिहास अब विश्व पटल पर अंकित है, जिसकी जड़ें रामकथा में हैं. यह वही सांस्कृतिक जागरण है जिसकी धारा को संगठन, समाज और राष्ट्र ने पीढ़ियों तक सींचा हैI

यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल होने की क्या है प्रक्रिया?

यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में किसी विरासत को शामिल करने की प्रक्रिया कई चरणों मे जाकर पूरी होती है. जिसके मानदंड ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा के लिए कन्वेंशन (2003)’ के तहत निर्धारित किया गया है. यह प्रक्रिया तय करती है कि शामिल की जाने वाली विरासत वास्तव में मानवता के लिए महत्वपूर्ण है और इसे समुदाय द्वारा संरक्षित किया जाता हैI

इस प्रक्रिया के प्रमुख चरण क्या-क्या है ?

1. राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और सूचीकरण

सबसे पहले, संबंधित देश (इस मामले में भारत) अपनी अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में दीपावली को पहचानता है. इसके बाद सामुदायिक सहमति, यह सबसे महत्वपूर्ण कदम हैI नामांकन के लिए यह अनिवार्य है कि विरासत का अभ्यास करने वाले समुदाय, समूह या व्यक्ति इसकी पहचान, संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए पूरी तरह से सहमत हों. दीपावली के मामले में, यह पूरे भारतीय और वैश्विक हिंदू समुदाय की सहमति को दर्शाता हैI देश अपनी राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची तैयार करता है, यह काम भारत में संस्कृति मंत्रालय यह कार्य करता हैI

2. नामांकन फाइल तैयार करना
नामांकन फाइल को यूनेस्को के निर्धारित दिशानिर्देशों के अनुसार तैयार किया जाता है और इसमें पांच अनिवार्य मापदंडों को पूरा करना होता है. दीपावली के संदर्भ में बात करें तो यह ‘कन्वेंशन की परिभाषा’ को पूरा करता है या नहीं, दीपावली एक सामाजिक प्रथा, अनुष्ठान और उत्सव है, जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित किया जाता है, मसलन दीपावली के शामिल होने से सूची की दृश्यता और जागरूकता बढ़ेगी तथा ‘संवाद’ को बढ़ावा मिलेगा या नहीं? तब भारत सरकार, समुदायों के सहयोग से, इस परंपरा को सुरक्षित रखने, बढ़ावा देने और हस्तांतरित करने की योजना प्रस्तुत करती है. जैसे कि दीपावली पहले से ही नामांकन करने वाले देश की ‘राष्ट्रीय सूची’ में शामिल थी इसलिए अब दीपावली को भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की राष्ट्रीय सूची में दर्ज किया गया हैI

नामांकन जमा करना
मांगी गई उक्त जानकारी के साथ संस्कृति मंत्रालय नामांकन फाइल को यूनेस्को सचिवालय को एक निश्चित समय सीमा के भीतर (आमतौर पर मार्च तक) आधिकारिक रूप से प्रस्तुत किया जाता है.

तकनीकी मूल्यांकन
यूनेस्को सचिवालय प्राप्त नामांकन को एक मूल्यांकन निकाय को भेजता है. यह निकाय, जिसमें मान्यता प्राप्त विशेषज्ञ और कन्वेंशन के सदस्य देश शामिल होते हैं, प्रस्तुत फाइल का गहन तकनीकी मूल्यांकन करती है. मूल्यांकन निकाय यह सुनिश्चित करती है कि सभी पाँच अनिवार्य मानदंड पूरी तरह से संतुष्ट किए गए हैं या नहीं. यह निकाय सिफारिश करती है कि तत्व को शामिल किया जाना चाहिए या नहीं.

यूनेस्को अधिकारी से सीएम रेखा प्रमाण पत्र लेते हुए

अंतर-सरकारी समिति का निर्णय

मूल्यांकन निकाय की सिफारिशों को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा के लिए अंतर सरकारी समिति के सामने रखा जाता है. यह समिति कन्वेंशन के 24 सदस्य देशों के प्रतिनिधियों से बनी होती है. समिति की वार्षिक बैठक जो अभी नई दिल्ली के लालकिला परिसर में चल रही है, यह समिति मूल्यांकन पर विचार करती है और अंतिम निर्णय लेती है कि किस तत्व को प्रतिनिधि सूची में जोड़ा जाना चाहिए. दीपावली के मामले में, समिति ने इस प्रस्ताव को अपनाया और बुधवार यानि 10 दिसंबर को इसकी औपचारिक घोषणा की.

दिल्ली के पर्यटन मंत्री कपिल मिश्रा

यूनेस्को सूची में शामिल होने से भारत को क्या लाभ होगा?

दिल्ली के पर्यटन मंत्री कपिल मिश्रा ने कहा कि दीपावली का यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल होना भारत के लिए एक बड़ा सम्मान है और इसके दूरगामी लाभ होंगे जो केवल सांस्कृतिक क्षेत्र तक ही सीमित नहीं हैं. यह टैग दीपावली के सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व को वैश्विक मंच पर स्थापित करता है. यह त्योहार के प्रकाश, सद्भाव, बुराई पर अच्छाई की जीत को सर्वोच्च वैश्विक स्वीकृति देता है, जिससे सभी भारतीयों का गौरव बढ़ता है. भारत को वैश्विक स्तर पर एक समृद्ध सांस्कृतिक और विरासत नेतृत्व वाले राष्ट्र के रूप में स्थापित करता है. यह सांस्कृतिक कूटनीति के लिए एक शक्तिशाली मंच प्रदान करता है, जिससे भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ (सांस्कृतिक प्रभाव) मजबूत होती है.

दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि यूनेस्को की मान्यता से दीपावली से जुड़ी प्रथाओं, अनुष्ठानों और कलाओं के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, क्षमता निर्माण और संसाधनों को जुटाने में मदद मिलेगी. यह मान्यता दीपावली से जुड़ी मौखिक परंपराओं, लोक कलाओं और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों के विस्तृत दस्तावेजीकरण और वैज्ञानिक अनुसंधान को प्रोत्साहित करती है, यह टैग समुदायों और अगली पीढ़ियों को उनकी विरासत को मूल्यवान मानने और उसे बनाए रखने के लिए प्रेरित करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि दीपावली एक ‘जीवंत’ विरासत बनी रहेI

दिल्ली हाट में मना दिवाली का जश्न

इस फैसले से क्या भारत को आर्थिक व पर्यटन लाभ भी मिलेगा?

दीपावली को वैश्विक पहचान मिलने से सांस्कृतिक पर्यटन में वृद्धि होगी, अंतरराष्ट्रीय पर्यटक भारत में इस त्योहार के दौरान होने वाले अनूठे अनुभव के लिए आकर्षित होंगे. पर्यटन में वृद्धि से स्थानीय कारीगरों, शिल्पकारों (विशेष रूप से दीया बनाने वाले, रंगोली कला से जुड़े), क्षेत्रीय कलाकारों और हस्तकला अर्थव्यवस्था को सीधा लाभ मिलेगा. त्योहार से जुड़े पारंपरिक कौशल और शिल्प को व्यावसायिक अवसर मिलेंगे, जिससे गरीबी उन्मूलन और स्थानीय आजीविका को बढ़ावा मिलेगा. साथ ही दीपावली अब वैश्विक सांस्कृतिक विविधता और मानव एकता के प्रतीक के रूप में यूनेस्को के शैक्षिक कार्यक्रमों और सामग्रियों का हिस्सा बन सकती है. यह उपलब्धि समुदायों में अपनी परंपराओं के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाती है और उन्हें अपने सांस्कृतिक अधिकारों का प्रयोग करने के लिए सशक्त बनाती हैI

संदीप दुबे (सीनियर एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट)

क्या कहते हैं विशेषक

सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट संदीप दुबे जोकि गत कुछ वर्षों से पूर्वांचल के प्रमुख पर्व छठ पूजा को यूनेस्को की इस सूची में शामिल करने की मुहिम से जुड़ें हैं, उन्होंने कहा कि “अब आने वाले वर्षों में इसमें भी सफलता जरूर मिलेगी. उन्होंने दीपावली को लेकर कहा कि यह केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं है, बल्कि सामाजिक सद्भाव, सामुदायिक सहभागिता और साझा मानवता का प्रतीक है. यूनेस्को की सूची में शामिल होने से दुनिया भर में सांस्कृतिक आदान-प्रदान और विभिन्न संस्कृतियों के बीच सम्मान को बढ़ावा मिलेगा.

दीपावली का यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल होना सिर्फ एक औपचारिक घोषणा नहीं है, बल्कि भारतीय सभ्यता की आत्मा को मिली एक वैश्विक स्वीकृति है. यह भारत की समृद्ध और सतत विकसित होती सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति वैश्विक समुदाय के सम्मान को दर्शाता है. यह उपलब्धि भारत पर एक जिम्मेदारी भी डालती है कि वह न केवल दीपावली, बल्कि अपनी सभी अमूर्त विरासतों के सक्रिय संरक्षण और प्रचार-प्रसार को सुनिश्चित करे, ताकि यह पीढ़ी दर पीढ़ी प्रकाशमान होती रहेI

भारत की अन्य अमूर्त सांस्कृतिक विरासतें जो यूनेस्को की सूची में शामिल हैं.

1. वैदिक जप की परंपरा ( 2008) : इसमें पवित्र ग्रंथों और भजनों का उच्चारण, जप और पाठ करने की मौखिक परंपरा शामिल है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती है. इसे प्राचीन भारतीय ज्ञान का आधार माना गया हैI

2 रामलीला: रामायण का पारंपरिक प्रदर्शन (2008) : उत्तर भारत में आयोजित होने वाला यह नाट्य प्रदर्शन, दशहरे के दौरान किया जाता है, जिसमें राम की कहानी को संगीत, नृत्य और संवाद के माध्यम से दर्शाया जाता हैI

3. कुटियाट्टम, संस्कृत थिएटर (2008) : केरल का यह सबसे पुराना जीवित संस्कृत रंगमंच रूप है यह अनुष्ठान, थिएटर और नृत्य का एक अनूठा संयोजन है, जो करीब 2000 वर्षों से अधिक पुराना हैI

4. रममन: गढ़वाल हिमालय का धार्मिक त्योहार और अनुष्ठान थिएटर (2009) : उत्तराखंड के चमोली जिले में मनाया जाने वाला एक वार्षिक धार्मिक त्योहार है, जिसमें अनुष्ठान, संगीत और नृत्य के प्रदर्शन शामिल हैंI

5. मुडियेट्टु, केरल का अनुष्ठान थिएटर और नृत्य-नाटिका (2010) : देवी काली और दानव दारिका के बीच युद्ध पर आधारित एक अनुष्ठानिक नृत्य नाटक, जो भद्रकाली मंदिरों में किया जाता हैI

6. कालबेलिया लोक गीत और नृत्य (2010) : राजस्थान की कालबेलिया जनजाति द्वारा किया जाने वाला यह नृत्य और संगीत उनकी साँप पकड़ने वाली विरासत से प्रेरित है. यह उनकी पहचान और अभिव्यक्ति का माध्यम हैI

7. छऊ नृत्य (2010): पूर्वी भारत ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल में प्रचलित एक अर्ध-शास्त्रीय भारतीय नृत्य जिसमें मार्शल आर्ट, लोक परंपराएं और अनुष्ठान शामिल हैंI

8. लद्दाख का पवित्र बौद्ध जप (2012) : यह जम्मू और कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र के बौद्ध मठों और गुफाओं में भिक्षुओं द्वारा किए जाने वाले मंत्रोच्चार की एक अनुष्ठानिक परंपरा हैI

9. मणिपुर का संकीर्तन: गायन, ड्रमिंग और नृत्य अनुष्ठान (2013) : यह एक भक्तिपूर्ण कला रूप है जो मणिपुर के वैष्णव समुदायों के लिए महत्वपूर्ण है. इसमें संगीत और नृत्य के माध्यम से कृष्ण का गुणगान किया जाता हैI

10. पंजाब का ठठेरों द्वारा पारंपरिक पीतल और तांबे के बर्तन बनाने का शिल्प (2014) : पंजाब के जंडियाला गुरु में ठठेरा समुदाय द्वारा धातुओं को पीटकर बर्तन बनाने की एक अनूठी कारीगरीI

11. योग (2016) : प्राचीन भारतीय शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक अभ्यास का समग्र दृष्टिकोण, जिसका लक्ष्य शरीर और मन का सामंजस्य स्थापित करना हैI

12. नवरोज़ (2016) : यह त्योहार भारत सहित कई देशों में पारसी समुदाय द्वारा मनाया जाता है, जो वसंत और नए साल के आगमन का प्रतीक हैI

13. कुंभ मेला (2017) : दुनिया का सबसे बड़ा शांतिपूर्ण जमावड़ा, यह एक तीर्थयात्रा है जो भारत के चार अलग-अलग स्थानों पर चक्रवाती रूप से आयोजित होती है और जिसे धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के लिए जाना जाता हैI

14. कोलकाता की दुर्गा पूजा (2021): देवी दुर्गा की पूजा का यह त्योहार पश्चिम बंगाल में कला, प्रदर्शन, सामुदायिक समावेशन और भक्ति का एक उदाहरण है, जो शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों को जोड़ता हैI

15. गुजरात का गरबा (2023) : यह गुजरात का एक अनुष्ठानिक और भक्तिपूर्ण लोक नृत्य है, जो देवी शक्ति की पूजा के दौरान नवरात्रि के नौ रातों में किया जाता हैI

16. दीपावली (2025) : रोशनी का त्योहार, जो अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है, और जिसे भारत और दुनिया भर में मनाया जाता हैI

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