पाप क्रियाओं के फलों से रक्षा के लिए करें प्रतिक्रमण
जैनियों का महत्वपूर्ण पर्व है- पर्युषण। इस समय श्रावकों में चेतना की भयंकर कमी आई हुई है, इसीलिए धर्म क्रियायाएं शुष्क और परिणाम रहित हो गई हैं। इन अशुद्ध भावों से छुटकारा पाने के लिए प्रपामण की भावना को महत्वपूर्ण माना जाता है। प्रपामण का अर्थ है- जाने-अनजाने में किए हुए या हो चुके पापों को याद करके उनका पश्चाताप करना यानी उनसे पीछे हटना। मान्यता है कि यदि ऐसे पाप याद नहीं किए जाएं तो प्रपामण पूरा नहीं होता है।
प्रतिक्रमण का मूल है
- किए हुए पाप कौन से हैं, ये याद करना।
- वो पाप होने से बच सकते थे तो पाप कम हो सकते थे। यदि हां, तो दोबारा उन कर्मों को न करने का विवेक रखना।
- कुछ पाप जानबूझकर करने पड़े या चेतना की कमी या व्यवहार कुशलता में कमी के कारण हो गए, ऐसे पापों को याद करना होगा।
- सवेरे से लेकर शाम तक परिवार में किस-किस से झिकझिक हुई?
- व्यापार या नौकरी करते समय किससे माथा लगा?
- अनजाने में किसी को चोट पहुंची?
- किसी के प्रति मन में दुर्भावना आई?
- इन्द्रियों के आकर्षण से न करने जैसे विचार किए और ऐसे कर्म किए?
- देव, गुरु और धर्म के विषय में अनावश्यक टिप्पणियां की?
- आत्म कल्याण का विचार रहा? ये है असली प्रतिक्रमण, जो बिना सामायिक लिए भी सार्थक रूप से हो सकता हैं। सभी संप्रदायों की प्रतिक्रमण विधि अलग है, परंतु ऊपर लिखे आवश्यक चिंतन का सर्वथा अभाव है! दिन और रात के प्रतिक्रमण की विधि थोड़ी अलग-अलग है, जबकि दोनों विधियों में पाप कौन से हुए, उनसे पीछे कैसे हटें, उस चिंतन का नामोनिशान तक नहीं! एक नई शुरूआत करें। तीन नवकार गिनें- पहला नवकार दर्शन की विशुद्धि के लिए, दूसरा नवकार ज्ञान की विशुद्धि के लिए और तीसरा नवकार चारित्र की विशुद्धि के लिए। दर्शन और ज्ञान की प्राप्ति से ही चारित्र ग्रहण होता है, मात्र साधु वेश धारण करने से नहीं! दर्शन के नाम पर प्रभु दर्शन को छोड़कर गुरु-दर्शन करने लगे, ये ज्ञान कहां से आया? अधिक हुआ तो अन्य धर्म-स्थलों पर जाकर अन्य देवी-देवता पूजने लगे, बेड़ा गर्क हुआ, परंतु इसकी परवाह भी नहीं, मन में पश्चाताप भी नहीं!
विशेष –
रात को सोने से पहले दिनभर में की गई क्रियायाएं याद करें। चिंतन करने के बाद चार लोगस्स का काऊसग्ग करना, फिर सो जाना। इस प्रकार करने से अशुभ स्वप्न भी नहीं आएँगे। भूलें तो सुधरेंगी ही, कार्यक्षमता भी अचानक से बढ़ जाएगी। उससे आर्थिक स्थिति ठीक होगी और नाम बदनाम भी नहीं होगा। एक महीने में कायापलट हो जाएगी। अनावश्यक खाना, अनावश्यक बोलना, अनावश्यक घूमना, अनावश्यक सोना, अनावश्यक परिग्रह करना, ये सब स्वत: ही छूटेगा। इसके बदले में प्राप्त होगा- सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र।
–दीपेश सुराणा
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