‘सीएसडीएस’ की विश्वसनीयता पर संदेह !

चुनाव आयोग की साख बचाने और फर्जी डेटा से नुकसान को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए जा सकते हैं। अगर सीएसडीएस दोषी पाया जाता है, तो न सिर्फ उसकी फंडिंग पर असर पड़ेगा, बल्कि उसके शोध कार्यों पर भी सवाल उठेंगे। दूसरी तरफ विदेशी फंडिंग की जाँच शुरू होने से सीएसडीएस को और दबाव का सामना करना पड़ सकता है। जनता के लिए भी यह सब एक सबक है कि सोशल मीडिया पर आने वाली हर खबर पर भरोसा करने से पहले उसकी सच्चाई जाँच लेनी चाहिए।

देश में वोट चोरी के नाम पर राजनीतिक बवंडर खड़ा करने वाले सीएसडीएस (सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज) के संजय कुमार और काँग्रेस के राहुल गाँधी समेत कई लोगों के खिलाफ दिल्ली में शिकायत की गई है। फर्जी आँकड़ों के आधार पर ये खेल शुरू करने वाले संजय कुमार अब निशाने पर आ चुके हैं। इस बीच, सीएसडीएस को सबसे ज्यादा फंडिंग देने वाली सरकारी संस्थान- भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) ने सीएसडीएस पर सवाल उठाए हैं और शो कॉज नोटिस जारी किया है।

संजय कुमार की गलती और फर्जी डेटा विवाद

आईसीएसएसआर ने सीएसडीएस पर फर्जी डेटा पेश करने और चुनाव आयोग की गरिमा को ठेस पहुँचाने का भी आरोप लगाया है। वहीं, सीएसडीएस की विदेशी फंडिंग खासकर जर्मनी की कोनराड एडेनॉयर फाउंडेशन से मिलने वाले करोड़ों रुपए अब जाँच के घेरे में हैं। जानकारी के अनुसार यह विवाद 17 अगस्त 2025 को तब शुरू हुआ जब सीएसडीएस के संजय कुमार ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाली।

उन्होंने दावा किया कि महाराष्ट्र के कुछ विधानसभा क्षेत्रों में वोटर लिस्ट में भारी गड़बड़ी हुई है। उदाहरण के लिए, उन्होंने कहा कि नासिक वेस्ट का वोटर संख्या लोकसभा चुनाव से विधानसभा चुनाव तक 47.38 प्रतिशत बढ़ गई जबकि हिंगणा में 42.08 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। साथ ही, रामटेक और देवलाली में वोटर संख्या में 40 प्रतिशत की कमी आई लेकिन 19 अगस्त को संजय कुमार को कथित तौर पर अपनी गलती का अहसास हुआ।

उन्होंने अपनी पोस्ट को डिलीट कर दिया और माफी माँगी। उनका कहना था कि उनकी टीम ने डेटा की पंक्तियों को गलत पढ़ लिया था लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था और फर्जी आँकड़े सोशल मीडिया और व्हाट्सएप पर फैल चुके थे। असली डेटा देखें तो नासिक वेस्ट में वोटर संख्या में सिर्फ 6 प्रतिशत और हिंगणा में 5.9 प्रतिशत की मामूली बढ़ोतरी हुई, जबकि रामटेक और देवलाली में 3-4 प्रतिशत की मामूली वृद्धि हुई।

फर्जी डेटा विवाद पर आईसीएसएसआर और एफआईआर

इस घटना से नाराज होकर 19 अगस्त को भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद ने एक बयान जारी किया। शिक्षा मंत्रालय के तहत काम करने वाली आईसीएसएसआर सीएसडीएस को फंडिंग देने वाली मुख्य संस्था है। आईसीएसएसआर के बयान में कहा गया कि सीएसडीएस के एक वरिष्ठ अधिकारी (संजय कुमार) ने गलत डेटा पेश किया जो बाद में वापस लेना पड़ा। इसके अलावा, सीएसडीएस ने चुनाव आयोग के एसआईआर (सार्वजनिक जानकारी अभ्यास) को गलत तरीके से पेश करके मीडिया स्टोरीज छापीं।

आईसीएसएसआर ने कहा कि चुनाव आयोग भारत की सबसे बड़ी लोकतंत्र की रीढ़ है और इसके सम्मान को ठेस पहुँचाना गंभीर अपराध है। उन्होंने सीएसडीएस पर डेटा से छेड़छाड़ और गलत नैरेटिव बनाने का आरोप लगाया जो उनके अनुदान नियमों का उल्लंघन है। उनका कहना है कि यह घटना संस्थान और चुनाव प्रक्रिया दोनों की गरिमा को ठेस पहुँचाती है। इसी बीच वकील विनीत जिंदल ने 19 अगस्त 2025 को दिल्ली पुलिस कमिश्नर को एक शिकायत दी।

उनकी शिकायत में राहुल गाँधी (विपक्ष के नेता), संजय कुमार (सीएसडीएस) और कई अन्य लोगों पर आरोप लगाए गए। जिंदल का कहना है कि इन लोगों ने फर्जी डेटा फैलाकर जनता में अशांति फैलाई और सरकार के खिलाफ साजिश रची। उन्होंने कहा कि यह डेटा लोकसभा चुनावों को लेकर गलत था और चुनाव आयोग की साख को नुकसान पहुंचाने की कोशिश थी। जिंदल ने अपनी शिकायत में लिखा कि ये लोग सोशल मीडिया और प्रेस के जरिए झूठी खबरें फैला रहे हैं, जिससे जनता का भरोसा लोकतंत्र पर कमजोर हो रहा है। उन्होंने माँग की कि इस मामले में सख्त कार्रवाई हो और जाँच शुरू की जाए।

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सीएसडीएस विदेशी फंडिंग और विवादों के सवाल

अब सवाल उठता है कि सीएसडीएस को फंडिंग कहाँ से मिलती है? आईसीएसएसआर सीएसडीएस का मुख्य फंडर है, जो सरकार के जरिए चलता है। लेकिन इसके अलावा सीएसडीएस को विदेशी फंडिंग भी मिलती है, जिस पर कई सवाल उठ रहे हैं। सीएसडीएस की वेबसाइट और विदेशी योगदान की रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई देशों और संगठनों से पैसा आता है। इनमें फोर्ड फाउंडेशन, गेट्स फाउंडेशन (अमेरिका), आईडीआरसी -कनाडा, डीएफआईडी (यूके), नॉराड (नॉर्वे), ह्यूलेट फाउंडेशन और जर्मनी की केएएस जैसी एजेंसियाँ शामिल बताई जा रही हैं।

इसके अलावा स्वीडन, फिनलैंड, डेनमार्क, ऑस्ट्रेलिया और ताइवान की कुछ एनजीओ से भी डोनेशन मिलते हैं। इसके अलावा अतीत में जाकर देखें तो साल 2016 से अगले कई सालों तक कनाडा की संस्था की तरफ से हर साल करोड़ों की धनराशि लगातार मिलती रही। भारत सरकार ने एनजीओ की आड़ में विदेशी धन के प्रवाह को रोकने के लिए जब कदम उठाए, तो इसका असर सीएसडीएस की फंडिंग पर भी पड़ा। साल 2016 और 2025 के आँकड़ों में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है।

सीएसडीएस को जो विदेशी फंडिंग होती है उसको लेकर आरोप है कि यह पैसा हिंदू समाज को जाति के आधार पर बाँटने और गलत नैरेटिव बनाने में इस्तेमाल हो रहा है। उदाहरण के लिए सीएसडीएस के लोकनीति प्रोग्राम में हिंदुओं को ओबीसी, ईबीसी, दलित और सवर्ण में बांटकर वोटिंग पैटर्न की रिपोर्ट छापी जाती है जो अखबारों में सुर्खियाँ बनती हैं लेकिन मुसलमानों की अंदरूनी जातीय दरारों पर चुप्पी साध ली जाती है। कई लोग इसे साजिश मानते हैं और कहते हैं कि सीएसडीएस का मकसद हिंदू समाज को तोड़कर काँग्रेस जैसे दलों को फायदा पहुँचाना है।

सीएसडीएस विवाद : फंडिंग व शोध पर खतरा

जानकारों के अनुसार आईसीएसएसआर ने साफ कर दिया है कि सीएसडीएस का यह व्यवहार उनके नियमों का उल्लंघन है।शो कॉज नोटिस के बाद अगर सीएसडीएस संतोषजनक जवाब नहीं दे पाता, तो फंडिंग रोकने की नौबत आ सकती है। यह कदम न सिर्फ सीएसडीएस के लिए बड़ा झटका होगा बल्कि इस बात की भी जाँच शुरू हो सकती है कि विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल कहाँ हो रहा है। अगर साबित हो जाता है कि विदेशी पैसा किसी खास राजनीतिक एजेंडे के लिए इस्तेमाल हुआ तो कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।

जानकारों की माने तो सीएसडीएस को आईसीएसएसआर के शो कॉज नोटिस और विनीत जिंदल की एफआईआर से साफ है कि यह मामला यहीं खत्म नहीं होगा। चुनाव आयोग की साख बचाने और फर्जी डेटा से नुकसान को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए जा सकते हैं। अगर सीएसडीएस दोषी पाया जाता है, तो न सिर्फ उसकी फंडिंग पर असर पड़ेगा, बल्कि उसके शोध कार्यों पर भी सवाल उठेंगे। दूसरी तरफ विदेशी फंडिंग की जाँच शुरू होने से सीएसडीएस को और दबाव का सामना करना पड़ सकता है। जनता के लिए भी यह सब एक सबक है कि सोशल मीडिया पर आने वाली हर खबर पर भरोसा करने से पहले उसकी सच्चाई जाँच लेनी चाहिए।

-रामस्वरूप रावतसरे
रामस्वरूप रावतसरे

यह पूरा मामला सीएसडीएस, आईसीएसएसआर और भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती है। फंडिंग को लेकर उठे सवाल, फर्जी डेटा का विवाद और एफआईआर सब कुछ मिलाकर यह दिखाता है कि शोध संस्थानों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। आईसीएसएसआर का कड़ा रुख और जिंदल की शिकायत से उम्मीद है कि सच सामने आएगा और दोषियों पर कार्रवाई होगी जिससे भविष्य में कोई भी संस्थान भ्रामक डाटा या सूचना सार्वजनिक करने से पहले सोचे।

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