ड्रैगन का चींटी-चस्का !

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दुनिया में तस्करी के किस्से तो आपने बहुत सुने होंगे। कोई अंतर्वस्त्रों में सोने के बिस्किट छिपाकर लाता है, तो कोई ड्रग्स के पैकेट पेट में उतार लेता है। लेकिन हमारे पड़ोसी देश चीन के हुनरमंदों ने इस बार जो कारनामा किया है, उसे सुनकर अच्छे-अच्छे तस्करों को मोक्ष की प्राप्ति हो जाए। खबर आई है कि केन्या के नैरोबी एयरपोर्ट पर एक चीनी नागरिक, जनाब झांग केकुन साहब, अपने सूटकेस में करीब 2,200 से ज्यादा जिंदा रानी-चींटियों की बरात लेकर बीजिंग जाने की फिराक में थे।

अब आप सोच रहे होंगे कि, भला इन नन्हीं जानों की तस्करी से किसी का क्या भला होगा? तो साहब, अपनी अक्ल के घोड़े दौड़ाइए, क्योंकि इन चींटियों की कीमत सुनकर आपके पैरों तले की जमीन ही नहीं, शायद उस पर चल रही चींटियाँ भी खिसक जाएँ! अंतरराष्ट्रीय बाजार में इन हार्वेस्टर चींटियों की कीमत 100 डॉलर से 220 डॉलर प्रति नग बताई जा रही है। एक रानी चींटी पकड़िए और करीब 21,000 रुपये की कमाई पक्की! अब जरा हिसाब लगाइए, झांग साहब के सूटकेस में करोड़ों का खजाना रेंग रहा था। चीन में एक चींटी की हैसियत किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं है न!

पारंपरिक चीनी चिकित्सा में चींटियों का उपयोग

आपको पूछने का पूरा हक है, आखिर इन चींटियों में ऐसा क्या है कि ड्रैगन की लार टपकने लगी? असल में, इसके पीछे दो बड़े ज्ञान काम कर रहे हैं। पहला है- पारंपरिक चीनी चिकित्सा। वहाँ के हकीमों का मानना है कि इन चींटियों का सूप या चूर्ण जोड़ों के दर्द, ब्रोंकाइटिस और दिल की बीमारियों का काल है। यानी अगर आपको घुटने में दर्द है, तो बस एक केन्याई चींटी चबा लीजिए और फिर ओलंपिक में दौड़ लगाइए! यह अलग बात है कि चींटी बेचारी खुद अपनी जान बचाने के लिए भागती फिर रही है।

दूसरा कारण और भी मजेदार है- एग्जॉटिक पैट्स यानी विदेशी पालतू जीवों का चस्का। चीन और यूरोप के रईसों को अब कुत्ता-बिल्ली पालने में वह स्वैग नजर नहीं आता। उन्हें चाहिए एंट फार्म। कांच के आलीशान बक्से में रानी चींटी का दरबार सजेगा और ये रईस लोग घंटों बैठकर देखेंगे कि चींटियाँ कैसे अनुशासित होकर काम करती हैं। शायद वे अपनी प्रजा को भी वैसे ही अनुशासित देखना चाहते हैं, जहाँ न कोई सवाल पूछे, न हड़ताल करे!

बस गुड़ की डली के लिए दिन-रात खटता रहे। वैसे, केन्या के कस्टम अधिकारियों की दाद देनी पड़ेगी। बेचारे हाथी के दांत और गैंडे के सींग ढूंढने निकले थे, हाथ लगीं टेस्ट ट्यूब में बंद चींटियाँ! कितना रमणीय रहा होगा वह दृश्य, जब झांग साहब ने सफाई दी होगी, ये हमारी पुरानी सहेलियाँ हैं, इन्हें हम अफ्रीका की सफारी कराने लाए थे, अब घर वापस ले जा रहे हैं! मगर केन्याई अदालत भला चीन के चींटी-चस्के को क्या समझे? सुना दी एक साल की जेल और ठोक दिया 10 लाख केन्याई शिलिंग का जुर्माना।

सूक्ष्म तस्करी से बायोपायरेसी की बढ़ती आशंका

सयानों को आशंका है कि चीन की यह सूक्ष्म तस्करी किसी गहरी साजिश का इशारा भी हो सकती है! जब दुनिया भर में हाथियों और बाघों के शिकार पर सख्ती बढ़ी, तो तस्करों ने अपना बिजनेस मॉडल छोटा कर लिया। इसे बायोपायरेसी कहते हैं। यानी, चुपचाप किसी देश की जैव-विविधता को चुरा लेना! कल अगर चीनियों का दिल हमारी लाल चींटियों या मोटे काले मकोड़ों पर आ गया तो?

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क्यों न हम अपनी चींटियों के लिए अभी से आधार कार्ड और नागरिकता रजिस्टर अनिवार्य कर दें? अचरज नहीं कि चीन कभी यह दावा ठोक दे कि पूरी दुनिया की चींटियाँ असल में प्राचीनकाल में चीन के ही किसी गाँव से पलायन करके गई थीं, इसलिए उन पर उसका संप्रभु अधिकार है! अत: सावधान! अपनी चींटियों को संभालकर रखिए, क्या पता कल कोई झांग केकुन परखनली लेकर आपके आंगन में भी टहलता दिखाई दे!

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