फिर चुनावों का मौसम, फिर मिलेगा रोजगार!

चुनाव का मौसम आते ही देश में एक अजीबोगरीब हलचल मच जाती है। नेताओं की रैलियों का शोर, वादों की बौछार, और जनता को लुभाने के नए-नए तरीके। लेकिन इस बार बिहार के अलावा चुनाव आयोग ने जम्मू-कश्मीर, राजस्थान, झारखंड, तेलंगाना, पंजाब, मिजोरम और ओडिशा की आठ विधानसभा सीटों पर उपचुनाव की घोषणा की है। चुनावी समर में रैलियों में भीड़ जुटाने के लिए दिहाड़ी मजदूरों की माँग बढ़ जाती है, कि मंडियों में मजदूरों का टोटा पड़ जाता है। आम दिनों में 500-800 रुपये कमाने वाले मजदूरों को रैलियों में तीनों वक़्त का खाना और दोगुनी दिहाड़ी मिल जाती है।
अब सोचिए, जो मजदूर कल तक ईंट-गारे के ढेर में अपना पसीना बहा रहे थे, वे आज नेताजी के भाषणों में तालियाँ बजा रहे हैं। नेताओं के लिए यह स्थिति सुविधाजनक है। आखिरकार, भीड़ का होना जरूरी है, चाहे वह किराये की ही क्यों न हो!
मजदूरों के लिए यह सुनहरा अवसर है। जहाँ पहले उन्हें दिन भर की मेहनत के बाद भी पेट भर खाना नहीं मिलता था, वहीं अब नेताजी की रैली में शामिल होकर पेट-पूजा भी हो रही है और जेब भी भारी हो रही है। कौन कहता है कि राजनीति में रोजगार के अवसर नहीं होते?लेकिन इस रैली रोजगार योजना का एक साइड इफेक्ट भी है। मंडियों में मजदूरों की कमी हो गई है। जो ठेकेदार कल तक मजदूरों से कम दिहाड़ी में काम करवाते थे, वे आज उन्हें मनाने के लिए दौड़ लगा रहे हैं। मजदूरों की इस माँग ने बाजार के नियमों को भी चुनौती दे दी है।
नेताओं के लिए यह स्थिति विन-विन की है। भीड़ भी मिल रही है और गरीबों के प्रति संवेदनशीलता का प्रदर्शन भी हो रहा है। चुनावी रैलियों में जुटी भीड़ से ही तो मीडिया वाले उनकी लोकप्रियता को नापते हैं न! मजदूरों के लिए यह समय स्वर्णिम है। जहाँ एक ओर उन्हें सम्मान मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर उनकी आर्थिक स्थिति में भी सुधार हो रहा है। कौन जानता था कि राजनीति के इस खेल में मजदूर भी किंगमेकर बन सकते हैं? तो, अगली बार जब आप किसी रैली में उमड़ी भीड़ को देखें, तो समझ जाइएगा कि यह जन समर्थन नहीं, बल्कि दिहाड़ी समर्थन है। और मजदूरों की मुस्कान देखकर यह भी समझ जाइएगा कि चुनावी मौसम में उनकी चाँदी हो रही है।
कहना न होगा कि लोकतंत्र में सबको अपनी-अपनी भूमिका निभानी होती है। नेता भाषण देंगे, जनता सुनेगी, और मजदूर तालियाँ बजाएँगे। इससे अधिक संतोष की बात और क्या हो सकती है कि इस पूरे खेल में, अगर किसी का भला हो रहा है, तो वह है हमारा मजदूर वर्ग! प्रसाद भी, दक्षिणा भी; और चरणामृत भी! इसलिए, चुनावी मौसम में जब भी आप रैलियों की भीड़ देखें, तो इस दुविधा में मत पड़िएगा कि यह लोकतंत्र का उत्सव है या दिहाड़ी का महोत्सव। बस यह सोचकर आनंद मनाइए कि इस महोत्सव में हमारे मजदूर भाई-बहन अपनी मेहनत का फल चख रहे हैं।
ग़ौरतलब है कि मुद्दों के अकाल के इस काल में चुनावी रैलियों में जुटी भीड़ ही लोकतंत्र की असली ताकत है। और जब यह भीड़ दिहाड़ी पर जुटी हो, तो समझ जाइएगा कि हमारा लोकतंत्र मजबूत है। तो, इस चुनावी मौसम में, उन तमाम नेताओं को धन्यवाद दीजिए, जिन्होंने हमारे मजदूरों को रोजगार दिया है। और मजदूरों को सलाम कीजिए, जो इस रैली रोजगार योजना का पूरा फायदा उठा रहे हैं।
आखिरकार, लोकतंत्र में सबका भला होना चाहिए। और इस बार, हमारे मजदूर भाई-बहन इस चुनावी भले का पूरा आनंद ले रहे हैं। इसलिए, इस चुनावी समर में, जब आप रैलियों की भीड़ देखें, तो महीने-दर-महीने और साल-दर-साल दिहाड़ी-महोत्सव होते रहने की दुआ कीजिएगा। पचहत्तरवर्षीय चुनावी लोकतंत्र की दो ही तो सर्वाधिक महनीय उपलब्धियाँ हैं न – रेवड़ी और दिहाड़ी!
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