सनातन ही है सत्य

सनातन धर्म के मूल में कर्मवाद है। यह आत्मविकास व मोक्ष पर महत्व देता है। इसमें मानव को स्वयं का उद्धार करने पर जोर दिया गया है। इसी धर्म में एक ऐसे समाज की नींव रखी गई है, जो समय के साथ नये नियम अपनाता हुआ मानव जीवन को उन्नत बनाता है। यह पूर्णतः वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित है। इस धर्म से संबंधित एक-एक कर्म मानव समाज, पर्यावरण (जल, वायु, मिट्टी व आकाश) की शुद्धता बनाए रखने पर जोर देता है। इसी में सबका साथ सबका विकास की बात कही गई है। इस धर्म में निहित सोलह संस्कार मानव स्वास्थ्य से जुड़े हैं।
पूजा पाठ में तन की शुद्धि तथा आत्मा की शुद्धि करने का रहस्य छिपा है। तिथि या वार को रखे जाने वाले व्रत- उपवास शरीर के भीतरी अंगों के शुद्धिकरण की पद्धति पर आधारित है। दान करने की परंपरा से समाजवाद का विस्तार होता है। धन, अन्न, धातु, वस्त्र, भूमि, पशु आदि का दान आवश्यकमंद या अभावग्रस्त लोगों को करके समाज में सबको समान स्तर पर लाने का भाव है। इस समाज में ऊँच, नीच, रंग व लिंग भेदभाव का कोई स्थान नहीं है।
तीज-त्योहार और संस्कारों में पारस्परिक सहभागिता
सनातन धर्म जातिवाद में बटा नहीं था, बल्कि वर्ण प्रधान व्यवस्था को अपनाता था, जिसमें कर्म अर्थात जीविकोपार्जन संबंधी कार्य से मानव की पहचान होती थी और तीज-त्योहार या सोलह संस्कारों में प्रत्येक वर्ग एक-दूसरे से जुड़ा होता था, जिससे सभी को अपनी-अपनी जीविका सुविधाजनक चलाने का लाभ मिलता था। समय और परिस्थितियों के चलते इस समाज में कई कुरीतियाँ जुड़ती चली गईं और आज इस धर्म का विकृत रूप हमारे सामने है। प्राचीन काल में बच्चे की नाभि नाईन काटती थी।
मतलब पिता से भी पहले बच्चे को नाईन स्पर्श करती थी। बच्चे का मुंडन नाई करता था। शादी के मंडप में नाईन और धोबन द्वारा कई रस्में निभाई जाती थीं। लड़की का पिता लड़के के पिता से इन दोनों के लिए वस्त्र और धन की मांग करता था। वाल्मीकियों के हाथों से बनाए सूप, पत्तल, दोने आदि पूजा-पाठ और रोजमर्रा के काम में लिए जाते थे। धोबी से लोग अपने कपड़े धुलवाते थे। कहार डोली को अपने कंधे पर उठाकर मीलों दूर से लाते थे। उनके जिंदा रहते किसी की मजाल नहीं होती थी कि आपके परिवार की महिलाओं को कोई छू भी दे।
प्राचीन व्यवस्था में श्रम विभाजन, न कि भेदभाव
कुम्हार के हाथों से बनी मिट्टी की सुराही से ही जेठ में लोगों की आत्मा तृप्त हो जाती थी। आपकी झोपड़ियां मिस्त्री बनाते थे। किसान फसल लाता था। आपकी चिता जलाने में डोम सहायक सिद्ध होते थे। जीवन से लेकर मरण तक सब लोग कभी न कभी एक-दूसरे के काम करते थे। हाँ, स्वास्थ्य की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए, एक-दूसरे से दूरी रखी जाती थी, जो आगे चलकर छुआछूत की प्रथा में बदल गई। प्राचीन काल में जातियाँ थीं, पर उनके मध्य एक प्रेम की धारा भी बहती थी।

अगर सनातन धर्म कट्टर जातिवादी होता तो राम कभी शबरी के झूठे बेर नहीं खाते और निषादराज, केवट, आदिवासी, वनवासी उनके सहायक न होते। इसलिए यह कहना नितांत असत्य है कि सनातन धर्म भेदभाव छुआछूत की भावना पर खड़ा था। सनातन सत्य पर आधारित धर्म था, है और भविष्य में भी रहेगा।
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