मजदूरों की जान की दुश्मन बनीं पटाखा फैक्ट्रियां !

तमिलनाडु के विरुधुनगर और केरल के त्रिशूर में हाल ही में हुए पटाखा कारखाना विस्फोटों ने इन फैक्ट्रियों में बरती जा रही लापरवाही की एक बार फिर से पोल खोल दी है। विरुधुनगर में 19 अप्रैल को एक आतिशबाजी इकाई में धमाके से करीब दो दर्जन मजदूरों की जान चली गई। इसी क्रम में, केरल के त्रिशूर जिले के मुंडथिक्कोडु में त्रिशूर पूरम उत्सव के लिए पटाखों का निर्माण करने वाली यूनिट में विस्फोट से एक दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हो गई और कई घायल हो गए।
इन हादसों ने नियामकीय लापरवाही, सुरक्षा मानकों की अवहेलना और श्रमिक वर्ग की बदहाली को भी उजागर किया है। ऐसे विस्फोट पूर्वानुमानित जोखिमों की अनदेखी और नियमों के उल्लंघन का परिणाम हैं। इसलिए कारखाना मालिकों के साथ नियमों की पालना करवाने वाले अधिकारी भी अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। गौरतलब है कि त्रिशूर पूरम केरल का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक उत्सव है, जो अप्रैल-मई में त्रिशूर शहर में वड्डकुमनाथन मंदिर से सटे थेक्किनाडु मैदान में आयोजित किया जाता है। इसमें आसपास के कई मंदिरों की भागीदारी होती है।
इसमें सभी मंदिर अपने-अपने हाथियों और पारंपरिक संगीत के साथ भाग लेते हैं। त्रिशूर पूरम का उत्सव एक भव्य आतिशबाजी शो के साथ समाप्त होता है। इस आतिशबाजी के लिए ही मुंडथिक्कोडु इलाके की पटाखा इकाई में पटाखे तैयार हो रहे थे। यहां अचानक विस्फोटक सामग्री में लगी आग ने रौद्र रूप ले लिया। विस्फोट इतना भयानक था कि इकाई की इमारत ध्वस्त हो गई और आसपास के क्षेत्र में धमाके की गूंज से अफरा-तफरी मच गई।
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अधिक विस्फोटक भंडारण में लापरवाही उजागर
हादसे के बाद प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री ने शोक व्यक्त किया है और मुआवजे की घोषणा की गई है। किसी भी हादसे के बाद इसी तरह की कवायद होती है। शोक व्यक्त करने या मुआवजा बांटने से जनहानि की भरपाई नहीं हो सकती, न ही यह कहा जा सकता कि अब ऐसा कोई हादसा दोबारा नहीं होगा। प्रारंभिक जांच में अधिकृत सीमा से अधिक विस्फोटक भंडारण और हैंडलिंग में लापरवाही की बात सामने आ रही है।
आगजनी रोकथाम के उपाय अपर्याप्त साबित हुए। नियमों की अनदेखी की गई, लेकिन इस तरफ ध्यान देने का किसी के पास समय नहीं था। उत्सव की भव्यता के लिए श्रमिकों की जान दांव पर लगा दी गई। अब मुआवजा बांटकर प्रशासनिक सक्रियता दिखाई जा रही है। तमिलनाडु के विरुधुनगर जिले में कट्टनारपत्ती की वनजा फैक्ट्री में में भी नियमों की अवहेलना की गई। अवकाश दिवस रविवार को बिना अनुमति कारखाना चलाया जा रहा था।
लाइसेंस में एक साथ मात्र 12 श्रमिकों के कार्य करने की अनुमति थी, लेकिन वहां 40 से अधिक मौजूद थे और बरामदे में कच्चा माल भरा पड़ा था। धमाके के बाद दूसरा विस्फोट हुआ, जिसमें पुलिस और फायर स्टाफ भी प्रभावित हुआ। यहां भी मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने प्रत्येक मृतक के परिजन को 5 लाख और घायलों को 50 हजार मुआवजा घोषित किया। तमिलनाडु के विरुधुनगर जिले को पटाखा नगरी कहा जाता है। इस तरह के हादसों में यहां पिछले चार वर्षों में 134 मौतें हो चुकी हैं।
लापरवाही और अधिक भंडारण से बढ़ते हादसे
हादसे रोकने की कोई नीति बनाने के बजाय सरकार सिर्फ मुआवजा बांटकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाती है। पटाखा कारखानों में हादसों को रोकना चुनौतीपूर्ण कार्य जरूर है, लेकिन असंभव नहीं है। ज्यादातर हादसे लापरवाही, अधिक विस्फोटक भंडारण, अपर्याप्त दूरी और श्रमिक प्रशिक्षण की कमी से होते हैं। व्यवस्थित उपायों से इनकी रोकथाम की जा सकती है।
पटाखा निर्माण में विस्फोटक पदार्थ जैसे पोटैशियम नाइट्रेट, सल्फर और एल्यूमिनियम पाउडर का उपयोग होता है, जो थोड़ी सी चिंगारी से चेन रिएक्शन पैदा कर सकता है। विस्फोटक नियम 2008 के तहत प्रत्येक इकाई में एक समय में केवल 5 किलो पाउडर और 2.5 किलो अन्य सामग्री रखने की अनुमति है। साथ ही इकाइयों के बीच न्यूनतम 30-50 मीटर की दूरी अनिवार्य है। हादसों का प्रमुख कारण इन नियमों का उल्लंघन माना जा रहा है।
हादसों की रोकथाम के लिए कारखानों में स्वचालन बढ़ाना भी जरूरी है। मैनुअल तरीके से विस्फोटक सामग्री को मिलाने का कार्य करने की जगह इस काम के लिए मशीनों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, जिससे त्रुटि की गुंजाइश कम से कम हो। स्पार्क-प्रूफ उपकरण, विस्फोट-रोधी वेंटिलेशन सिस्टम और ऑटोमेटिक आग बुझाने वाले यंत्र लगाने पर ध्यान जरूरी है। भंडारण कक्ष अलग होने चाहिए, जो धातु के दरवाजों वाले हों और जहां तापमान नियंत्रित हो।
विस्फोट रोकने के लिए नियमित ऑडिट जरूरी
नियमित रूप से सामग्री की मात्रा का ऑडिट किया जाए ताकि ओवरलोडिंग न हो। उदाहरणस्वरूप, त्रिशूर विस्फोट में अधिक विस्फोटक संग्रह से हालात बिगड़े। निगरानी और निरीक्षण प्रणाली को मजबूत बनाने की जरूरत है। अवकाश दिवसों पर बिना अनुमति संचालन आम समस्या है। मजदूर आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं। वे पेट भरने के लिए हर तरह की स्थिति में काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं। साथ ही वे ज्यादा कुशल भी नहीं होते।
हर तरह के खतरे से परिचित मजदूर तो हालात के मारे होते हैं। इसलिए वे काम करने से इंकार नहीं कर सकते लेकिन पटाखों के कारखानों का संचालन करने वालों के लिए तो ऐसी मजबूरी नहीं होती। वे मजदूरों की सुरक्षा सुनिश्चित करके अपने कारखानों को भी सुरक्षित कर सकते हैं। इसके लिए तय सुरक्षा मानदंडों का पालन किया जाना चाहिए। साथ ही कर्मचारियों के प्रशिक्षण पर ध्यान देने के साथ उनको हेलमेट, दस्ताने, चश्मे, जूते जैसी आवश्यक सामग्री उपलब्ध करवाई जानी चाहिए।

इसमें कोई शक नहीं है कि यह उद्योग लाखों लोगों को रोजगार देता है, लेकिन उसे मजदूरों की जान से खिलवाड़ का अधिकार नहीं दिया जा सकता। दो वक्त की रोटी के लिए मजदूर कब तक यूं ही अपनी जान देते रहेंगे। निगरानी, प्रशिक्षण और तकनीकी उपायों के जरिए पटाखा कारखानों को सुरक्षित बनाने के लिए काम करना होगा। सरकार और उद्योगपतियों को इस मामले में पहल करनी होगी। ऐसा करके वे मजदूरों पर कोई अहसान नहीं करेंगे। यह उनकी कानूनी और संवैधानिक जिम्मेदारी है जिससे वे बच नहीं सकते।
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