अपनों के लिए

(कहानी)

संदीप वर्षों बाद अमेरिका से लौटा था। कुछ आराम करने के बाद घर के बरामदे में आया तो उसे अपना ही घर पराया-सा लग रहा था। याद आया पुराना घर कितना प्यारा, छोटा-सा था, जिससे उसकी यादें जुड़ी थीं। अब यह घर देखने में सुंदर और विशाल है, पर वैसा नहीं है, जैसा उसका बचपन का घर था। दोस्तों की पुकार उसके कानों में गूंजने लगीं।

आंखें आकाश में पतंगें तलाशने लगीं। पापा के स्कूटर की आवाज़ कानों में गूंज उठी। भैया-भाभी के कहने पर उसने घर को नया और बड़ा करवाने हेतु अपनी सहमति के साथ आर्थिक मदद भेजी थी। उसे क्या पता था कि घर के साथ उसके बचपन की यादें ही बिल्कुल मिट जाएंगी। इस घर में अब उसके नाम पर जो कमरा था, वो छोटा-सा एक कोने में बना था। भाभी ने स्वत ही अपनी झिझक मिटाते हुए कहा था, तुम तो कभी-कभी ही आओगे, हमारे साथ ही हो न…।

भाई-भाभी सो कर नहीं उठे थे, पर उसका नींद का पा बदला हुआ था। वह कितनी देर से सुबह होने का इंतजार कर रहा था और बाहर आकर कुछ समय बिताने के लिए बरामदे में बैठ गया। उसने देखा कि घर के सामने लगा नीम का पेड़ कैसा हो गया है। उसके बचपन की यादों में वह अकेला ही बचा था।

नीम तले बिखरी यादें और संदीप का पछतावा

यह नीम का पेड़ अब उसके लिए महत्वपूर्ण हो चला था। संदीप मन ही मन बच्चा बनकर उससे बातें करने लगा, नीम दादा! क्या बूढ़े हो गए? संदीप के सवाल पर नीम दादा ने कहा जैसे, नहीं बेटा, समय के थपेड़ों ने मुझे बूढ़ा बना दिया है। ये घर क्या बना सारा रोड़ा-सीमेंट मेरे इर्द-गिर्द था, जिसे तुम्हारे आने के कारण साफ करवाया गया है। मैंने कितने महीनों के बाद अब चैन की साँस ली है।

संदीप रूआँसे मन से अंदर आ गया। माँ-पिताजी की बड़ी-बड़ी तस्वीरों पर उसका ध्यान गया। याद आया कि इलाज के लिए पैसे भिजवाने के अलावा वह उनके लिए कुछ नहीं कर पाया। उनसे अंतिम समय तक नहीं मिल पाने के अ़फसोस के साथ ही जीवन निकालना होगा। भाभी कहती रहीं कि अभी कोई इमरजेंसी नहीं है, बस डॉक्टर का इलाज चल रहा है। उनसे पैसे की जरूरत की बात ही होती थी। अम्मा के समय भी ऐसा ही रहा। बड़े भाई अगर समय रहते बता देते तो वह जरूर आ जाता। माँ की मृत्यु का समाचार मिला तब एक्सीडेंट में पाँव टूट गया था।

किसी भी तरह आने की सोच रहा था, लेकिन भाई की बात माननी भी तो जरूरी थी। उन्होंने कहा था कि तेरे आने में व्यर्थ पैसा खर्च होगा, हम हैं न यहां! इससे बेहतर है कि पिताजी के इलाज में पैसा लगाया जाए। पिताजी की मृत्यु का समाचार बहुत देर से दिया गया और उस समय वह काम के सिलसिले में दूसरे देश में था। भैया ने कहा था कि अब जल्दी आकर क्या करेगा? अपना काम संभाल। संदीप जबसे आया है, तो भैया व्यस्त नजर आ रहे हैं।

छल-कपट की परतें और अलमारी का राज़

ऐसा लग रहा है कि साथ बैठने का मौका टाल रहे हों। भाभी भी संदीप के बाहर किसी से मिलने जाने की बात आते ही कोई न कोई बहाना बना देती। बीस दिनों के बाद संदीप ने बाहर जाने का मन बना लिया। उसने छोटे भतीजे को भी साथ चलने के लिए कहा। भाभी ने उसे अकेले में बुलाकर कुछ कहा और भतीजा संदीप चाचा को मोटरसाइकिल पर लेकर निकल पड़ा। रघु काका से मिलने की बात आई तो भतीजा बोला उनसे मिलकर क्या करेंगे, वो बूढ़े हो गए हैं? श्याम बिहारी काका से मिलने की बात आई तो उनके घर के सामने होते हुए भी भतीजे ने कहा, हम फिर आएंगे।

अंत में संदीप अपने खास दोस्त से मिलकर वापस आ गया। दोस्त लंबी बीमारी से उठा था, इसलिए उसे आराम की जरूरत होगी, सोचकर संदीप जल्दी वापस आ गया। संदीप ने महसूस किया कि अब भतीजा घर जाने की जल्दी में था। घर में जैसे भाभी इंतजार कर रही थी। बाथरूम में हाथ धोने गया तो कान में आवाज़ आई, रघु काका और बिहारी जी से तो नहीं मिलवाया ना! संदीप ने सुना भतीजा बोल रहा था, नहीं, मैंने सफाई से टाल दिया।

भाभी की आवाज़ थी, बस इनके जाने में दो दिन बचे हैं, वो भी निकल जाएं, इनको कुछ पता नहीं चलेगा। संदीप को समझ आ गया था कि दाल में कुछ काला है। भाई को फुर्सत नहीं मिलना, भाभी का दूसरी बातें करते रहना, उसे अपने कमरे में भी अकेले न रहने देना। अगले दिन रोज की तरह संदीप सुबह जल्दी उठा, उसने निर्णय लिया और अपने कपड़े तलाशते समय उसने एक बड़ी अलमारी खोली। वो कपड़ों व अन्य सामान से भरी हुई थी। संदीप ने अलमारी बंद कर दी। उसे अचरज भी हुआ कि अलमारी के एक कोने में कुछ खाने का सामान, साबुन, जूते-चप्पल आदि भी ठूंसकर रखे थे।

रघु काका से खुली सच्चाई, संदीप का बढ़ा पश्चाताप

संदीप कपड़े बदलकर रघु काका और बिहारी जी से मिलने अकेला निकल पड़ा। घर का दरवाज़ा उसने इस बात का ध्यान रखते हुए खोला था कि कोई आवाज़ न हो। घर से निकलते ही सामने वाले माथुर अंकल का पोता मिल गया, जिसे संदीप ने सालों के बाद देखा था, पर वह उसे पहचान गया और नमस्ते करके रुक गया। उसी ने पूछा, आपको कहीं छेड़ दूं क्या? संदीप ने कहा, मुझे रघु काका के घर जाना है, मैं चला जाऊंगा। वो बोला, चाचा, मैं उधर से ही निकलूंगा, आप बैठिए, मैं आपको छोड़ देता हूं।

संदीप पांच-सात मिनट में रघु काका के घर पहुंच गया। सुबह का समय था, रघु काका मंदिर जाने के लिए बाहर निकल ही रहे थे। वो संदीप को देखकर बाग-बाग हो गए और पूछा, कब आए? संदीप ने बताया, बीस दिन हो गए। उन्होंने अचरज से कहा, मुझे तुम्हारा बड़ा भाई रोज ही मंदिर में मिलता है, उसने बताया नहीं कि तुम आए हो। परसों तुम्हारे बारे में पूछा भी था, तो भी नहीं बताया कि तुम आए हो। रघु काका बैठकर पिताजी की बातें बताने लगे।

बातों-बातों में उन्होंने बताया कि आज दो साल हो गए, तुम्हारे पिताजी को गए, पर ऐसा लगता है कि अभी भी हमारे साथ हैं। पिछले वर्ष से रमेश मकान का काम करवा रहा है। उसके दो साल पहले तक उसके नए मकान का काम चल रहा था। तुम्हारे पिताजी जिस वर्ष गुजरे, उसी के चार महीने बाद तो रमेश ने प्लॉट खरीदा। वो बेचारे तो सर्दी-गर्मी अपना समय घर के सामने वाले नीम के नीचे ही बिताते थे। पूरे अधिकार से रघु काका ने संदीप से कहा था, तुमने भी बेटा उनकी कोई खबर नहीं ली।

नीम के साए तले जागा सच, संदीप की खामोश विदाई

संदीप अचरज से उनकी बातें सुनता रहा, पर उसके हाव-भाव से बुजुर्ग रघु काका सब समझ गए। उन्होंने संदीप को अंदर बुलाया, बिहारी जी को भी वहीं आने के लिए फोन किया और संदीप को पूरी बात बताई कि कैसे तुम्हारे माता-पिता तो सदा स्वस्थ ही रहे। बेटे-बहू का सारा काम करते रहे थे। मलेरिया हुआ और तुम्हारे पिताजी इलाज की कमी से चल बसे और माँ हार्ट अटैक से चल बसी। संदीप का मन रोने-रोने को हो रहा था, अब उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। उसी समय एक युवक ने प्रवेश किया। रघु काका ने उसका परिचय कराया और संदीप को बताया कि यह तुम्हारे घर के ऊपर वाले कमरे में किराये से रहता है।

आजकल किसी कारण से मेरे घर पर रह रहा है, कह रहा था, परसों चला जाएगा। संदीप की आँखों के सामने अभी कुछ समय पहले खुली अलमारी का दृश्य घूम गया। आज उसे नीम के पेड़ की भावना समझ आई कि जब जड़ों में ज़ख्म लगते हैं तो टहनियाँ भी सूख जाती हैं। समझदार संदीप बिना कुछ बोले घर आ गया। भाभी ने नाश्ता दिया, तो बिना कुछ कहे नाश्ता करके अपना सामान समेटने लगा। भाभी ने ऐसा करते देखा तो घबराकर पूछा, तुम तो कल जाने वाले थे, आज ही क्यों सामान समेट रहे हो? संदीप ने भारी मन से कहा, मुझे फोन आया है।

आज ही जरूरी काम से दिल्ली के लिए निकलना होगा। भाभी ने भैया का इंतजार करने के लिए कह, तो संदीप ने कहा, वे व्यस्त हैं, उन्हें काम करने दें। संदीप भारी मन से कभी वापस न आने के लिए बाहर निकला और दो बूंद आँसू नीम दादा को चढ़ाकर रिक्शे में बैठ गया। मन में माता-पिता के साथ अनजाने में किए अपराध-बोध के साथ उसने भाई-भाभी को अपने हाल पर छोड़कर एक नई सुबह की आशा से आगे कदम बढ़ाया। जानता था कि समाज में कुछ रिश्ते हैं, जो चुप हैं, इसलिए रिश्ते हैं।

प्रभा पारीक

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