आर्टेमिस-2 की सफलता से गगनयान मिशन को मिला आत्मविश्वास: वैज्ञानिक

नयी दिल्ली, अशोका विश्वविद्यालय के कुलपति और भौतिकी के प्रोफेसर सोमक रायचौधरी ने कहा कि ‘आर्टेमिस-2’ मिशन की सफलता से भारत को बहुत आत्मविश्वास मिला है, क्योंकि देश अपने ‘गगनयान’ अभियान के तहत उन्हीं क्षमताओं के प्रदर्शन की योजना बना रहा है, जो नासा की ओर से हाल में प्रक्षेपित इस अंतरिक्ष यान ने प्रदर्शित की थीं।
‘आर्टेमिस-2’ के चालक दल ने चंद्रमा के चारों ओर 10 दिन की ऐतिहासिक परिक्रमा पूरी करने के बाद 11 अप्रैल को कैलिफोर्निया के तट से दूर प्रशांत महासागर में सफल लैंडिंग की। यह 50 से अधिक वर्षों में पहली बार था, जब कोई मानवयुक्त मिशन पृथ्वी की कक्षा से बाहर निकलकर चंद्रमा के पास से गुजरा।
मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रमों को मिला प्रोत्साहन
भारत के शीर्ष खगोल भौतिकविदों में शामिल रायचौधरी ने कहा, “आर्टेमिस-2 की सफल उड़ान भारतीयों के लिए शानदार खबर है, क्योंकि ‘गगनयान’ मिशन जल्द शुरू होने वाला है। यह वही काम करेगा, जो ‘आर्टेमिस-2’ ने किया।” उन्होंने कहा, “भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ‘आर्टेमिस’ परियोजना पर लंबे समय से अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के साथ काम कर रहा है और हमारे अंतरिक्ष यात्री समान प्रशिक्षण कार्यक्रमों से गुजर रहे हैं।”
‘गगनयान’ मिशन भारत का पहला मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन होगा। इसे 2027 में प्रक्षेपित किए जाने की उम्मीद है। आर्टेमिस’ परियोजना के पहले मिशन के तहत 2022 में एक मानवरहित अंतरिक्ष यान ने चंद्रमा का चक्कर लगाने के बाद धरती पर सफल वापसी की थी। ‘आर्टेमिस-2’ साल 2028 में चंद्रमा की सतह पर भेजे जाने वाले मानवयुक्त अभियान का पूर्वाभ्यास था।
यह परियोजना चंद्रमा पर मानवयुक्त अंतरिक्ष उड़ान के एक नये युग की शुरुआत की प्रतीक है, जिसका मकसद वहां एक स्थायी बस्ती स्थापित करना और मनुष्यों को चंद्रमा की यात्रा का अवसर प्रदान करना है। रायचौधरी ने कहा, “1960 और 1970 के दशक के ‘अपोलो’ मिशन के विपरीत, जो मुख्य रूप से अंतरिक्ष में आगे निकलने की दौड़ और चंद्रमा पर कदम रखने के बारे में थे, नये मिशन चांद की सतह पर लंबे समय तक रहने के बारे में हैं।”
भारतीय वैज्ञानिकों में बढ़ा उत्साह
चंद्रमा पर मानव का दीर्घकालिक प्रवास मंगल ग्रह और क्षुद्रग्रहों पर उतरने जैसे कहीं अधिक लंबे अंतरिक्ष अभियानों को संचालित करने में मददगार होगा। रायचौधरी ने कहा, “इसके लिए चंद्रमा पर एक ठोस ठिकाने की जरूरत होगी और वहां ऑक्सीजन तथा पानी की उपलब्धता भी सुनिश्चित करनी पड़ेगी। इसके अलावा, कंप्यूटर और अन्य उपकरणों के संचालन और खनन जैसी बड़ी गतिविधियों के लिए ऊर्जा पैदा करने की भी आवश्यकता होगी।”
वैज्ञानिक चंद्रमा की सतह पर जमी हुई बर्फ और हीलियम-3 की खोज कर रहे हैं। जमी हुई बर्फ का इस्तेमाल ऊर्जा उत्पादन सहित दीर्घकालिक उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है, जबकि हीलियम-3 परमाणु ऊर्जा प्रदान करने में सक्षम है और इससे कम मात्रा में परमाणु कचरा भी उत्पन्न होता है, जिससे इसका निपटारा आसान रहेगा।
वैश्विक सहयोग और तकनीकी प्रगति पर जोर
हालांकि, विशेषज्ञों की मानें तो चंद्रमा की सतह पर एक स्थायी ठिकाना बनाना आसान नहीं होगा और इसके लिए कई मिशन की जरूरत पड़ेगी, जिनके तहत मानव, रोबोट, उपकरण और ईंधन चंद्रमा की सतह पर ले जाना होगा। विशेषज्ञों के अनुसार, चंद्रमा पर शौचालय की उचित व्यवस्था सुनिश्चित करना भी एक चुनौती होगा, क्योंकि चार अंतरिक्ष यात्रियों को ले जाने वाले ‘आर्टेमिस-2’ के ‘ओरियन’ अंतरिक्ष यान के शौचालय को मिशन के दौरान कम से कम दो बड़ी विफलताओं का सामना करना पड़ा था।
रायचौधरी ने कहा, “अंतरिक्ष में बनाए गए शौचालय में न सिर्फ उसमें बहाई जाने वाली हर चीज को खींचने के लिए एक जटिल वैक्यूम प्रणाली होती है, बल्कि यह एक ‘रीसाइक्लिंग’ संयंत्र से भी लैस होता है, जो मूत्र का शोधन करता है, जिसका इस्तेमाल पीने के पानी के रूप में किया जाता है। ऐसे शौचालयों में कई ऐसे घटक होते हैं, जो खराब हो सकते हैं।” उन्होंने कहा कि ‘आर्टेमिस-2’ की सफलता चंद्रमा पर स्थायी ठिकाना बनाने की दिशा में सिर्फ पहला कदम है। (भाषा )
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