माता चंडिका ने किया दानव रक्तबीज का वध

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माँ दुर्गा ने राक्षसों के संहार के लिए कई अवतार लिए और शुंभ-निशुंभ, धूम्रविलोचन, महिषासुर जैसे विकराल दानवों का संहार किया। इन्हीं में रक्तबीज नामक एक दानव था। मार्कंडेय पुराण के दुर्गा सप्तशती पाठ के आठवें अध्याय में रक्तबीज के वध का वर्णन है। यह उस समय की बात है, जब शंकुशिरा नामक अत्यंत बलशाली दानव पुत्र अस्तिचर्वण का जन्म हुआ, जो अस्थियों को चबाता था। अस्तिचर्वण के इस कार्य से दुःखी होकर देवताओं ने उसका वध कर दिया।

इस घटना से आहत होकर रक्तबीज ने देवताओं से बदला लेने के लिए ठान ली। इसके लिए उसने ब्रह्मक्षेत्र में लगभग 5 लाख वर्षों तक तप किया। परिणामस्वरूप ब्रह्मा जी ने उसे अमर होने का वरदान दे दिया। इस वरदान के कारण देवता, दानव, गंधर्व, यक्ष, पिशाच, पशु, पक्षी, मनुष्य आदि कोई भी उसका वध नहीं कर सकते थे। इसके साथ ही यह भी वरदान दिया कि उसके शरीर से एक भी रक्त की बूंद जमीन पर गिरेगी तो उससे नया रक्तबीज जन्म लेगा।

रक्तबीज का बढ़ता अहंकार और देवताओं का भय

इस वरदान से रक्तबीज को अहंकार हो गया। धरती पर उसका दुराचार बढ़ गया और उसने देवताओं को भी पराजित कर दिया। डर के मारे सभी देवता धरती पर मनुष्यों की तरह रहने लगे। देवता मिलकर काली तीर्थ गए और मां काली की स्तुति की तो प्रसन्न होकर मां दुर्गा ने देवताओं को रक्तबीज का संहार करने का वचन दिया। देवताओं के कहने पर नारद मुनि रक्तबीज के पास गए और कहा, कैलाश पर्वत पर भगवान शिव का वास है। इस दुनिया में सिर्फ भगवान शिव ही हैं, जो आपकी आज्ञा का पालन नहीं करते हैं। उन्हें आपका कोई डर नहीं है और उन्हें कोई नहीं जीत सकता।

तीनों लोक के देवता भगवान शिव बहुत धैर्यवान हैं। वहां एक बहुत सुंदर स्त्री रहती है। रक्तबीज माता पार्वती का रूप धारण करके भोलेनाथ के पास गया। भगवान शिव तुरंत उसे पहचान गए और श्राप दिया कि जिस माता कालिका का तुमने वेश धारण किया है, वही तुम्हारा संहार करेंगी। स्वयं को अपमानित महसूस करते हुए रक्तबीज वहाँ से अपने दरबार में गया। उसने साथी राक्षसों से मंत्रणा की और उन्हें पार्वती को उसके पास लेकर आने का आदेश दिया। रक्तबीज की आज्ञा का पालन करते हुए राक्षस कैलाश पर्वत पर गए।

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रक्त से जन्मे असुरों को निगलती गईं माँ चंडिका

वहां माता पार्वती के पास जाते ही भस्म होने लगे, लेकिन कुछ राक्षस बच गए और रक्तबीज को आकर सारा वृत्तांत बताया। उसके बाद माता के साथ रक्तबीज युद्ध करने आया। दोनों में कई वर्षों तक भयंकर युद्ध हुआ। माता जैसे ही रक्तबीज पर वार करतीं तो उसके रक्त की जितनी बूंदें धरती पर गिरती थीं, उतने ही रक्तबीज उत्पन्न हो जाते थे। धीरे-धीरे संपूर्ण धरती पर राक्षस ही राक्षस हो गए। यह देखकर माता पार्वती ने चंडी का रूप धारण किया है और रक्तबीज के शरीर से रक्त की जितनी भी बूंदें निकलतीं, वह उन्हें निगलने लगीं।

यह भी पढ़े: शुंभ और निशुंभ का दलन

इस तरह माता पार्वती ने चंडिका का रूप धारण करके रक्तबीज का वध किया था। इस युद्ध में माता दुर्गा ने रक्तबीज से पहले चंड-मुंड का वध किया। रक्तबीज की मृत्यु के बाद राक्षस राज शुंभ-निशुंभ का वध किया। वर्तमान में उत्तराखंड में स्थित रुद्रप्रयाग क्षेत्र में सरस्वती नदी के निकट कालीमठ है। सरस्वती नदी में लाल रंग की एक शीला है, जो रक्तबीज शीला के नाम से प्रसिद्ध है।

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