साक्षात् श्रीकृष्ण भगवान का दर्शन है गोवर्धन परिक्रमा
भगवान श्रीकृष्ण के जन्म होने से ब्रजभूमि की रज को आज भी कृष्णमयी मानकर लोग मस्तक पर लगाते हैं। कहते हैं, यह तो रमण देती है। बड़े-बड़े लक्ष्मी के लाल और सुदामा-मंडल के निर्धन भी यहां आकर अपने को धन्य मानते हैं। उनका भक्त हृदय यहां के टुकड़ों के लिए तरसता है। जिस प्रकार देवी-देवता, ऋषि-मुनि, श्रुतियों आदि ने गोप-गोपिकाओं का जन्म ग्रहण किया, उसी प्रकार पुराणों और वेदों में इस भूमि को सृष्टि और प्रलय से मुक्त बताया है।
यह वह भूमि है, जिस पर उद्धव ने लोट-पोट होकर रमण-रेती को मस्तक पर लगाया। ब्रजभूमि को मथुरा और वृंदावन के आस-पास 84 कोस में फैली बताया है। वाराह पुराण के अनुसार भगवान ने कहा कि मथुरा मंडल 20 योजन में है। इसके 90 कोस में 12 महावन, 24 उपवन, 7 सरिताएँ, 5 सरोवर, 5 पर्वत थे, जिसमें गोवर्धन सर्वाधिक पूजनीय माना गया। भगवान कृष्ण ने जब गोवर्धन की पूजा का प्रस्ताव रखा तो समस्त देवता, अप्सराएं, नाग, कन्याएं और ब्रजवासियों के झुंड आए।
गिरिराज गोवर्धन की महिमा और पूजन का प्रारंभ
गंगाधर शिवजी भी पधारे। राजर्षि, देवर्षि, सिद्धेश्वर, हंस आदि मांगेश्वर तथा हजारों वृंद गिरिराज के दर्शन को पधारे। (गर्ग संहिता)। भगवान की बताई विधि से गिरिराज की पूजा प्रारंभ की गई। नंद, उपनंद, वृषभानु, गोपी वृंद तथा गोपगण नाचने, गाने और बाजे बजाने लगे। उन सबके साथ हर्ष से श्रीकृष्ण ने गिरिराज की परिक्रमा की। श्रीकृष्ण ब्रज स्थित शैल गोवर्धन के बीच से विशाल रूप धारण करके निकले और मैं गिरिराज गोवर्धन हूँ। यह कहते हुए, वहां का सारा अन्नकूट का भोग लगा गए और कुछ समय बाद अन्तर्ध्यान हो गये।
इसस देवराज इंद्र क्रोधित हो गए। उन्होंने सांवतर्क व मेघगणों को पानी बरसाने का आदेश दिया। घबराये गोपों ने कृष्ण भगवान से कहा- ब्रजेश्वर कृष्ण, तुम्हारे कहने से हम लोगों ने इंद्र योग छोड़कर गोवर्धन पूजा का उत्सव मनाया, जिससे इंद्र का कोप बढ़ गया। अब शीघ्र बताओ, हमें क्या करना चाहिए? भगवान कृष्ण ने विश्वास दिलाते हुए कहा, डटे रहो, समस्त परिकरों के साथ गिरिराज तट पर चलो, जिन्होंने तुम्हारी पूजा ग्रहण की है, वे तुम्हारी रक्षा करेंगे।
श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत धारण करना
भगवान ने गोवर्धन पर्वत को उखाड़कर एक हाथ की कन अंगुली पर खेल-खेल में धारण कर लिया। इससे इंद्र देव ने माफी मांगी। भगवान ने पुन: पर्वत गिरिराज को धरती पर रख दिया। इसी से गोवर्धन गिरिराज पवित्र तीर्थ हो गया। भगवान ने अपना हाथ गिरिराज पर रखा, तो वहां का स्थान उनके हस्त-चिह्न एवं चरण-चिह्न से पवित्र हो गया। आकाश गंगा ने भगवान का अभिषेक किया। इसी से यहाँ मानसी गंगा प्रकट हो गई, जो संपूर्ण पापों का नाश करने वाली है। दुग्ध से भगवान का अभिषेक हुआ, जिसमें वहां गोविंद कुंड प्रकट हो गया। यहां भी भक्तजन स्नान करते हैं।
वृषभानुवन में राधिका और श्रीकृष्ण का विवाह संपन्न हुआ। समीप में नंद नंदन श्रीहरि ने राधा पर मोती न्यौछावर किए, जिससे मुक्ता सरोवर प्रकट हुआ, जो भोग और मोक्ष का दाता है। इस तरह गिरिराज संपूर्ण जगत में शिखरों के मुकुट का दर्जा पा सका।
गिरिराज पर भगवान के मुकुट से स्पर्श पाई शिला मुकुट है। इसके समीप ही कन्दुक (खेल) क्षेत्र है। यहीं पर कृष्ण ने गोपों की पगड़ियाँ चुराई थीं। वह स्थान औष्णीष नाम से प्रसिद्ध हो गया। जहां गोपियों से दही लूटा था और गोवर्धन की घाटी में कदंब एवं पलाश के पेड़ों के पत्तों से दोने बनाए थे, वह द्रौण स्थान भी नमस्कार करने पर फल देने वाला हो गया।
पंचनाथ देवताओं के प्रतीक स्तंभ
कदंब खण्ड, श्रृंगार-मंडल में श्रीनाथ सदा लीला करते हैं। श्रीकेदारनाथ, श्रीरंगनाथ, श्रीद्वारिकानाथ और श्रीबद्रीनाथ प्रसिद्ध पांच नाथ देवताओं के पांच स्तंभ हैं। इनमें चार स्तंभों की परिक्रमा होती है। पर्वत बने चिह्न, कुंड और मंदिर गिरिराज के जीवित स्वरूप हैं। इस प्रकार श्रीगोवर्धन भगवान के मुख हैं। मानसी गंगा भगवान के दो नेत्र हैं। चन्द्रसरोवर नासिका है। गोविंद कुंड अधर हैं। श्रीकृष्ण कुंड भगवान का चिबुक है। राधाकुंड भगवान की जिा है। ललिता सरोवर भगवान के कपोल हैं। गोपाल कुंड भगवान के कान हैं। कुसुम सरोवर भगवान के कर्णान्त भाग हैं।
पर्वत पर चित्रशिला भगवान का मस्तक है। वादिनी शिखा उनकी गर्दन है। कुन्दक तीर्थ भगवान की पीठ है। उष्णीष तीर्थ भगवान का कटि भाग है। द्रौण तीर्थ पिछली पसलियां हैं। लौकिक तीर्थ भगवान का पेट है। कदंब खंड भगवान का हृदय है। श्रृंगार मंडप में जीवात्मा बसती है। श्रीकृष्ण चरण-चिह्न भगवान का मन है। हस्त-चिह्न तीर्थ बुद्धि है। ऐरावत चरण-चिह्न भगवान के चरण हैं। सुरभि के चरण गोवर्धन के पंख हैं। पुच्द कुंड उस पर्वत राज की पूंछ है।
यह भी पढ़े: तीर्थ और धाम में है अंतर
वत्स कुंड उसका बल है। रूद्र कुंड क्रोध है। इंद्र सरोवर काम वासना है। कुबेर तीर्थ कर्म क्षेत्र है। यम तीर्थ गोवर्धन का अहंकार है। यह गोवर्धन पर्वत श्रीहरि के वक्ष स्थल से प्रकट हुआ और पुलस्त्य मुनि के तेज से ब्रज में स्थित हो गया। यह साक्षात् श्रीकृष्ण है। इसकी परिक्रमा साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण की परामा है। इस तरह गिरिराज भगवान की परिक्रमा मात्र एक पर्वत खंड की परिक्रमा नहीं है, साक्षात् भगवान की परिक्रमा है।
-डॉ. दौलतराज थानवी
अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।





