हस्तलिखित सचित्र कल्पसूत्र है बहुमूल्य : भक्तिरत्नसूरीजी म.सा.
हैदराबाद, जैन धर्म की श्वेतांबर मूर्तिपूजक परंपरा के सभी पंथों में कल्पसूत्र ही पर्युषण महापर्व का मूल आधार है। जितना आज आदिनाथ चरित्र, नेमिनाथ चरित्र आदि साहित्यिक कार्य कल्पसूत्र पर हुआ, शायद उतना किसी भी जैन ग्रंथ पर नहीं हुआ।
उक्त उद्गार गोशामहल स्थित शंखेश्वर भवन में शंखेश्वर पार्श्वनाथ जैन संघ के तत्वावधान में आचार्य भक्तिरत्नसूरीश्वरजी म.सा. ने व्यक्त किए। म.सा. ने कहा कि बारसा सूत्र कल्प सूत्र का विस्तार है। इसका श्रवण हर जैनी को करना चाहिये।
कल्पसूत्र में चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी का विस्तार से जीवन चरित्र है। इसके अलावा पहले तीर्थंकर आदिनाथ, बाइसवें तीर्थंकर नेमिनाथ और तेइसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का संक्षिप्त जीवन चरित्र है। जैन श्रमण परंपरा का संक्षिप्त इतिहास और साधु-साध्वियों के आचार-विचार की जानकारी कल्पसूत्र का रोचक विषय है। म.सा. ने कहा कि पर्युषण महापर्व से संबंधित होने के कारण कल्पसूत्र नामक धर्मशास्त्र जैन परंपरा का सबसे लोकप्रिय और महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
जैनधर्म के प्राचीनतम शास्त्रां को आगम कहा जाता है। प्राचीन काल में 84 से अधिक आगम शास्त्र थे। आज उनमें से मात्र 45 मौजूद हैं। जैन धर्म की श्वेतांबर मूर्तिपूजक परंपरा के सभी पंथों में कल्पसूत्र ही पर्युषण महापर्व का मूल आधार है। आज भी कल्पसूत्र की सैकड़ों की संख्या में प्राचीन हस्तलिखित प्रतियाँ विविध ज्ञान भंडारों में सुरक्षित हैं। इनमें सोने और चाँदी की स्याही से लिखे सचित्र कल्पसूत्र पुरातत्व की दृष्टि से बहुमूल्य हैं।
कल्पसूत्र की ऐतिहासिक महत्ता और वैश्विक प्रसार
गुजरात के पाटण, खंभात, कोबा, अहमदाबाद, सूरत, बड़ौदा और डभोई के ज्ञान भंडार के अलावा जैसलमेर, दिल्ली, श्रीलंका, पाकिस्तान, तिब्बत, नेपाल, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, पुर्तगाल, फ्रांस और जर्मनी की सेंट्रल लाइब्रेरियों में जैनधर्म के कल्पसूत्र की प्राचीन हस्तलिखित प्रतियाँ पायी जाती हैं। पुरातत्व विभाग के अनुसार इनमें से कुछ का मूल्य करोड़ों में आंका गया है। इनकी कुल श्लोक संख्या एक लाख पच्चीस हजार है। प्राकृत की अर्धमागधी भाषा में रचित जैन परंपरा की इस विपुल आगमिक साहित्य संपदा में कल्पसूत्र आगम शास्त्र है।
भाग्यचंद्रविजयजी म.सा. ने बताया कि भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण के 980 वर्ष बाद गुजरात स्थित पालीताणा महातीर्थ की तलहटी वलभीपुर नगर में कल्पसूत्र को पहली बार लिपिबद्ध किया गया। उस समय निरंतर तेरह वर्षों तक चले अद्भुत ज्ञानयज्ञ में एक करोड़ जैन धर्म ग्रंथों को तैयार किया गया। यह ऐतिसाहिक कार्य आचार्य देवर्धि गणि क्षमाश्रमण के नेतृत्व में तत्कालीन 500 जैनाचार्यों ने संपन्न किया। इससे पहले जैन परंपरा का कोई भी आगम शास्त्र लिपिबद्ध नहीं था।
उन्हें सिर्फ कंठस्थ रखने की ही विरल परंपरा थी। आज से पंद्रह सौ वर्ष पूर्व लिपिबद्ध होने के तेरह वर्षों बाद जैनाचार्य कालका सूरीश्वरजी ने गुजरात के वडनगर में राजा ध्रुव सेन की राजसभा में पहली बार कल्पसूत्र का पठन किया गया। इसके बाद जैन समाज में प्रतिवर्ष कल्पसूत्र धर्मग्रंथ का पर्युषण महापर्व के दौरान पूजन, पठन और श्रवण किया जाता है। वर्तमान में देश-विदेश में 45,000 से अधिक स्थानों पर कल्पसूत्र के आधार पर पर्युषण महापर्व मनाया जा रहा है।
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प्रवचन में लाभार्थियों और पूजा समारोह की जानकारी
प्रचार संयोजक जसराज देवड़ा धोका ने बताया कि प्रवचन में प्रभावना का लाभ पुष्पा देवी जयंतीलाल दुग्गड़ परिवार ने, प्रभु अंग रचना का लाभ भक्तिराज चाँदमल भंडारी परिवार ने, बारसा सूत्र को घर ले जाकर भक्ति कराने का लाभ खम्मा देवी अमीचंद ढेलड़िया परिवार, पादरू वालों ने, पाँच ज्ञान पूजा का लाभ दिनेश कुमार शंकरलाल अग्नि गोता चौहान परिवार ने, सोना रूपा के फूलडो से बनाने का लाभ कमला देवी सुमेरमल कवाड़ परिवार ने लिया।
प्रचार संयोजक जसराज देवड़ा धोका ने बताया कि प्रवचन में ज्ञान की आरती का लाभ आंती देवी तेजराज भादानी परिवार ने, भद्रबाहु के गुरु पूजन का लाभ जितेन्द्र कुमार विजय शांति इंस्ट्रूमेंट वालों ने, बारसा सूत्र के चित्रों को सभा में दर्शन कराने का लाभ पुखराज भीमराज कामदार परिवार ने, बारसा सूत्र की अष्टप्रकारी पूजा का लाभ गोटी देवी तेजराज परिवार ने, ज्ञान की आरती का लाभ शांतिलाल देवीचंद भंडारी परिवार ने, चैत्य परिपाटी के संघपति बनने का लाभ जितेंद्र कुमार ओटमल मरड़िया परिवार ने लिया। संघ अध्यक्ष चंपालाल भंडारी ने कहा कि बुधवार, 27 अगस्त को संवत्सरी का बड़ा पर्व है। सभी प्रवचन प्रतिक्रमण का लाभ लें।
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