शब्दों में सद्भाव का ताना-बाना
पत्रकारिता को लोकतंत्र के रक्षक की भूमिका में देखा गया है। चौथे स्तंभ का प्रतीक यह इसी उत्तरदायित्व को अपने भीतर समोता है। आजकल पत्रकारिता में भाषा पर किसी प्रकार का संतुलन नहीं बचा है। कई बार बोल कब अपवित्र हो जाते हैं, इसका पता भी नहीं चलता। ऐसे में हिन्दी मिलाप और उसके संस्थापक संपादक व स्वतंत्रता सेनानी युद्धवीर जी के सिद्धांत प्रासंगिक हो जाते हैं।
जहाँ शब्दों के चयन में भी इस बात का ध्यान रखा जाता था कि इससे किसी प्रकार का विघटन या अलगाव न पैदा हो। बात उन दिनों की है, जब सांप्रदायिक दंगों के कारण पुराने शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था। उन दिनों रवि श्रीवास्तव हिन्दी मिलाप में उप संपादक हुआ करते थे। युद्धवीर जी उन दिनों हैदराबाद से बाहर थे। हैदराबाद लौटने के बाद दंगों के दौरान प्रकाशित मिलाप की प्रतियों के पन्ने पलटने के दौरान एक फोटो कैप्शन पर उनकी नज़र पड़ी।
लिखा था, यह कैसा कर्फ्यू है, जिसके रहते एक जनाज़े में इतनी भीड़ जुट गयी। ख़बर थी कि अर्थी के जुलूस में पाँच हज़ार लोग शामिल हुए। उन्होंने रवि श्रीवास्तव से पूछा कि यह क्या किया? जनाज़ा लिखने के बजाय शवयात्रा लिख देते। बाद में उन्होंने कहा कि नौजवान ऐसा एक शब्द भी नहीं लिखना चाहिए, जो धार्मिक सांप्रदायिकता को भड़काता हो।
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रवि श्रीवास्तव ने अपने संस्मरण में लिखा है कि देखने में यह घटना बड़ी मामूली सी लगती है, लेकिन हमें यह मानने को बाध्य करती है कि युद्धवीर जी शब्द शक्ति के प्रति कितने जागरूक और सतर्क थे। वे मेल मिलाप के मिशन को लेकर संघर्षशील मिलाप में विघटन या टूटन का सृजन करने वाला एक शब्द भी छपा हुआ नहीं देखना चाहते थे।
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