भगवान शिव के सावन में घटित प्रसंग
श्रावण मास व इसके सोमवारों में शिव के व्रत, पूजा, जल, दुग्धाभिषेक, चालीसा तथा आरती का विशेष महत्त्व है। अंक ज्योतिष में सोमवार का अंक 2 माना गया है, जो चंद्रमा का प्रतिनिधित्व करता है। वह भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान है। ‘चंद्रमा मनसो जात’: अर्थात चंद्रमा मन का मालिक है। भगवान शंकर मस्तक पर चंद्रमा को नियंत्रित करके अपने भक्त के मन को एकाग्रचित कर उसे अविद्या रूपी माया के मोहपाश से मुक्त करते हैं।
भगवान शंकर की कृपा से भक्त त्रिगुणातीत भाव को प्राप्त करता है। यही उसके जन्म-मरण से मुक्ति का मुख्य आधार होता है। इसलिए सावन सोमवार को भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करके शिव पंचाक्षर मंत्र का जप करना चाहिए। सावन के सोमवार में स्त्रियाँ तथा विशेषतौर से कुंवारी युवतियाँ भगवान शिव के निमित्त व्रत आदि रखती हैं।
शिव का धरती पर भ्रमण
भारतीय पंचांग, परंपरा, संस्कृति, धार्मिक आस्था व विश्वास में शिव के प्रिय श्रावण मास का अत्यंत महत्व है। श्रावण मास में प्रकृति हरी-भरी हो जाती है, पेड़-पौधे खिल उठते हैं और खेतों में हरियाली छा जाती है। यह समय कृषि कार्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है। गर्मी की तपन से त्रस्त धरती पर वर्षा की बूंदों के टपकने से चतुर्दिक प्रसन्नता छा जाती है। प्रकृति के साथ ही मानव मन भी अह्लादित हो उठता है। मान्यता है कि इस मास में भगवान शिव धरती पर भ्रमण करते हैं। यह उनका प्रिय मास है। उनके स्वागत में सावन माह में उपवास, भजन, कीर्तन, रुद्राभिषेक आदि धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है। यह आत्मशुद्धि और संयम का भी प्रतीक है। इस महीने में शिव पुराण, रुद्राष्टक, शिव चालीसा आदि का पाठ करने से मानसिक कष्ट दूर होते हैं।
पार्वती की तपस्या
सनत कुमारों ने भगवान शिव से श्रावण मास उन्हें प्रिय होने का कारण पूछा तो शिव ने बताया कि देवी सती के अपने पिता दक्ष के घर में योगशक्ति से शरीर त्यागने से पूर्व उन्होंने महादेव को हर जन्म में पति के रूप में पाने का प्रण लिया था। अपने दूसरे जन्म में देवी सती ने पार्वती के रूप में हिमाचल और रानी मैना की पुत्री के रूप में जन्म लिया। पार्वती ने अपनी युवावस्था में सावन महीने में निराहार रहकर कठोर व्रत किया, जिससे शिव प्रसन्न हो गए और उनसे विवाह किया। इस प्रसंग से महादेव के लिए यह मास विशेष हो गया। इसलिए कुंवारी कन्याएं अच्छे वर की प्राप्ति के लिए इस महीने में व्रत रखती हैं।
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शिव का ससुराल में स्वागत
मान्यता है कि भगवान शिव सावन में पृथ्वी पर अवतरित होकर अपनी ससुराल गए। वहां उनका स्वागत जल से अभिषेक करके किया गया। मान्यता है कि प्रत्येक वर्ष सावन में भगवान शिव अपनी ससुराल आते हैं। भूलोक वासियों के लिए शिव-कृपा पाने का यह उत्तम समय होता है।
बालक मारकण्डेय को वरदान
मरकंडू ऋषि के पुत्र मारकण्डेय ने लंबी आयु के लिए सावन में घोर तप करके शिव को प्रसन्न किया था, जिससे मिली मंत्र शक्तियों के सामने मृत्यु के देवता यमराज भी नतमस्तक हो गए थे।
हलाहल पान
अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, सावन मास में समुद्र-मंथन किया गया थ। जिससे निकले हलाहल को भगवान शंकर ने अपने कंठ में समाहित करके सृष्टि की रक्षा की। मान्यतानुसा, विष के प्रभाव को कम करने के लिए देवताओं ने भगवान शिव को जल अर्पित करके उनकी आराधना की थी, जिससे भोलेनाथ को आराम मिले।
इसलिए श्रावण मास में शिवलिंग पर जल चढ़ाने का विशेष महत्व है। शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव स्वयं ही जल हैं। इसलिए जल से अभिषेक करते हुए उनकी अराधना उत्तमोत्तम फल देने वाली है। श्रावण मास में सबसे अधिक बारिश होती है, जो शिव के गर्म शरीर को ठंडक प्रदान करती है।
गंगाजलाभिषेक
भगवान शंकर ने स्वयं सनत कुमारों को सावन माह की महिमा बताते हुए कहा है कि मेरी दाहिने नेत्र में सूर्य, बायें नेत्र में चन्द्रमा तथा मध्य नेत्र में अग्नि वास करती हैं। जब सूर्यदेव कर्क राशि में गोचर करते हैं, तो सावन की शुरुआत होती है। सूर्य गर्म है, जो ऊष्मा देता है, जबकि चंद्रमा शीतलता प्रदान करता है।
इसलिए सूर्य के कर्क राशि में आने से झमाझम बारिश होती है, जिससे भोलेनाथ को ठंडक मिलती है। इसलिए शिव का सावन से बहुत लगाव है। इस माह में शिव भक्त गंगाजल या स्थानीय जल लेकर पैदल यात्रा करते हैं और अपने क्षेत्र के शिव मंदिरों में जलाभिषेक करते हैं। इसे कांवड़ यात्रा कहा जाता है।
सावन में भगवान शंकर की पूजा शिव-परिवार के साथ करने का विधान है। भगवान शिव के रुद्राभिषेक का विशेष महत्त्व है। इसलिए इस मास में प्रत्येक दिन रुद्राभिषेक किया जा सकता है। इसके लिए कोई शुभ मुहूर्त नहीं देखा जाता है, जबकि अन्य मासों में शिववास का मुहूर्त देखा जाता है। शिव के रुद्राभिषेक में जल, दूध, दही, शुद्ध घी, शहद, शक्कर, गंगाजल तथा गन्ने का रस आदि से का उपयोग किया जाता है। अभिषेक के बाद बेलपत्र, शमीपत्र, दूब, भांग, धतूरा तथा श्रीफल आदि अर्पित किया जाता है।
श्रावण में भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। तत्पश्चात सृष्टि के संचालन का उत्तरदायित्व भगवान शिव ग्रहण करते हैं। इसलिए सावन के प्रधान देवता भगवान शिव बन जाते हैं। यह समय भक्तों, साधु-संतों सभी के लिए भी अमूल्य होता है। विष्णु के योगनिद्रा में चले जाने की अवधि (श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक) को चौमासा भी कहा जाता है।

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