इस्तीफा न देने की ज़िद !

हमारे देश की राजनीति में इस्तीफा या त्यागपत्र एक ऐसा शब्द है, जिसे राजनेता बहुत पहले ही अपनी डिक्शनरी से फाड़कर रद्दी वाले को बेच चुके हैं। वैसे भी, भारत जैसे आध्यात्मिक देश में जहाँ आत्मा और परमात्मा के मिलन की बातें होती हैं, वहाँ नेता और कुर्सी के बीच के भौतिक वियोग की बात करना ही पाप है। हाल ही में पश्चिम बंगाल के जो चुनाव नतीजे आए, उन्होंने लोकतंत्र के इस कुर्सी-योग का एक अद्भुत और नया दर्शन दुनिया के सामने पेश किया है।

सबको पता है, बंगाल में चुनाव हुए और जनता ने अपना फैसला (विवादास्पद ही सही) सुना दिया। लोकतंत्र में एक जीर्ण-शीर्ण परंपरा है कि जब जनता आपको नकार दे, तो आपको गरिमा दिखाते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ देनी चाहिए। इसे पुराने जमाने के लोग नैतिकता कहते थे। लेकिन ममता दीदी ठहरीं युग-प्रवर्तक! उन्होंने तय किया है कि हारना एक अलग बात है और कुर्सी छोड़ना बिलकुल अलग। चुनाव तो आते-जाते रहते हैं, लेकिन जो कुर्सी से चिपक जाए, वही असली सिकंदर!

जनता की समझ पर सवाल उठाते हुए राजनीतिक तर्क

दीदी का तर्क बड़ा सीधा और दार्शनिक है। वे मानती हैं कि जनता तो नादान है, उसे क्या पता कि उसके लिए क्या सही है! जनता ने भले ही विपक्ष को वोट दे दिया हो, लेकिन यह तो केंद्र की साजिश है, ईवीएम की गड़बड़ी है, हवा के रुख का षड्यंत्र है और शायद बंगाल की खाड़ी में उठने वाले पावातों का भी इसमें हाथ है। जब हार आपकी वजह से हुई ही नहीं, तो आप इस्तीफा क्यों दें? इस्तीफा तो वह दे जो खुद को हारा हुआ माने। दीदी तो फाइटर हैं। और सच्चा फाइटर कभी हार मानता है क्या?

सयानों की मानें तो, जब कोई नेता सालों तक एक ही कुर्सी पर बैठता है, तो नेता का शरीर और कुर्सी की लकड़ी एक-दूसरे में इस तरह घुल-मिल जाते हैं कि उन्हें अलग करने के लिए इस्तीफे की नहीं, बल्कि एक कुशल सर्जन की जरूरत पड़ती है। कुर्सी लाख छटपटाए-गिड़गिडाए कि बहुत हुआ, अब मुझे मुक्त करो, मेरे पाए घिस चुके हैं! दीदी को क्या? वे शायद अपनी सूती सफेद साड़ी के पल्लू से उसे पोंछते हुए दुलारती हों- चुप रह, तेरा और मेरा मां, माटी और मानुष का रिश्ता है; मैं तुझे अनाथ कैसे छोड़ सकती हूँ?

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पश्चिमी नेताओं में हार पर तुरंत इस्तीफे की परंपरा

पश्चिम के कुछ देशों के नेता जरा-सी हार पर तुरंत इस्तीफा दे देते हैं। उनमें सहनशक्ति ही नहीं होती। हमारे यहाँ के नेता वीर होते हैं। वे तो जेल जाकर भी कुर्सी के पायों से ऐसे लिपटे रहते हैं, जैसे प्रलय काल में कोई तिनके को पकड़ लेता है। फिर पराजय तो चीज ही क्या है! दीदी ने इस कुर्सी-पकड़ कला को चरम पर पहुँचा दिया है। जनमत जीतकर मुख्यमंत्री बनना तो बहुत साधारण बात है। जनमत हारकर भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहना असली खेला है!

अरे दादा, कुर्सी कोई धर्मशाला का कमरा थोड़े ही है कि समय पूरा हुआ और बिस्तर बांधकर चल दिए। यह तो सत्ता की वह संजीवनी है, जिसे छोड़ते ही राजनेता के प्राण सूखने लगते हैं। यह तो वे भी जानते ही होंगे जो जाने कितने दंद-फंद करके जनादेश जीतकर लाए हैं। लाख टके का सवाल यह भी है कि क्यों नहीं दीदी द्वारा आविष्कृत इस नई राजनीतिक विधा का स्वागत किया जाना चाहिए।

आपने जीती हुई सरकार देखी है, गठबंधन की सरकार देखी है, तो अब पराजित-सत्तारूढ़ सरकार देखने से परहेज क्यों? जब तक देश में जनादेश की जगह ज़िद को नेतृत्व का गुण माना जाता रहेगा, तब तक हर चुनाव के बाद कोई न कोई नेता अपनी हार का ठीकरा किसी और के सिर फोड़कर उसी कुर्सी पर विराजमान रहेगा। दीदी को उनके इस अभूतपूर्व कुर्सी-प्रेम और त्यागपत्र-त्याग के लिए हार्दिक बधाइयाँ! लोकतंत्र ऐसे ही तो मजबूत होगा, जब उसे जनता नहीं, सिर्फ ज़िद चलाएगी! (काश, इस टिप्पणी के लिखे जाते वक़्त दीदी भी इस्तीफा लिख रही होतीं!)

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