सरकारी अस्पताल में उपचार के लिए रोगी का आधार कार्ड होना अनिवार्य है ?

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हैदराबाद, तेलंगाना उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को यह स्पष्ट करने का आदेश दिया कि क्या सरकारी अस्पतालों में उपचार कराने के लिए रोगी का आधार कार्ड होना अनिवार्य है। क्या आधार कार्ड न होने पर भी रोगी को इलाज उपलब्ध कराया जाएगा। इसी प्रकार अदालत ने यह भी स्पष्ट करने का आदेश दिया कि क्या नियमों के अनुसार रोगी के साथ सहायक न होने पर भी उपचार की अनुमति है।

गुरुवार को अदालत ने एक बार फिर सरकार को आदेश दिया कि वह चिकित्सा सेवाओं से संबंधित सरकारी नीति का पूर्ण विवरण देते हुए अपना जवाब दाखिल करे, भले ही रोगी के साथ सहायक न हो या उसके पास आधार कार्ड न हो। पिछले आदेश के बाद सरकार ने आधार कार्ड से संबधित मुद्दे पर स्पष्टीकरण न देकर गलती की, जबकि उसे प्रक्रिया का विवरण भी देना चाहिए था। सरकार के इस रवैया पर अदालत ने कड़ी नाराजगी जताई।

महबूबाबाद ज़िले के चिन्नागुडूरु मंडल के जयराम ग्राम निवासी रवि नामक व्यक्ति को गुर्दे व अन्य रोगों के इलाज के लिए सरकारी अस्पताल ले जाया गया, लेकिन वहाँ यह कहकर उपचार करने से इनकार कर दिया गया कि उनके साथ कोई सहायक नहीं था और उसके पास आधार कार्ड नहीं था। इस कारण रवि तीन दिन तक अस्पताल के कैंटीन में ही पड़ा रहा और वह बेहोश हो गया। उसे मृत मानकर मुर्दाघर भेज दिया गया।

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अगले दिन सफाईकर्मियों द्वारा उसे जीवित देखकर जानकारी दिए जाने पर पुलिस ने उसे अस्पताल पहुँचाया, जहाँ उसका इलाज किया गया। गत 30 अक्तूबर को समाचार पत्रों में प्रकाशित इस घटना के आधार पर अधिवक्ता कोमरय्या ने उच्च न्यायालय को पत्र लिखा। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के एक समूह ने इसकी जाँच करने के बाद इसे स्वतः संज्ञान के तहत जनहित याचिका माना।

उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अपरेश कुमार सिंह और जस्टिस जी.एम. मोहियुद्दीन की खण्डपीठ ने गुरुवार को इस मामले की फिर से सुनवाई की। खण्डपीठ ने कहा कि सरकार को पिछले आदेश के अनुसार सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा उपचार प्रदान करने के दिशा-निर्देशों पर पूर्ण विवरण के साथ प्रतियाचिका दायर करना था, लेकिन प्रतियाचिका को केवल आधार कार्ड और रोगी के सहायक के मामले तक ही सीमित रखा गया, जो अनुचित है। खण्डपीठ ने एक बार फिर पूर्ण विवरण के साथ प्रतियाचिका दायर करने का आदेश देते हुए मामले की सुनवाई चार सप्ताह तक स्थगित कर दी।

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