क्या नेपाल में बालेन की नीतियों के चलते फूटने लगा जेन जी क्रांति का बुलबुला ?
अगर युवाओं का मोहभंग हुआ, तो ये और भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है। नेपाल वासियों ने आंदोलन के दौरान हुई हिंसक वारदातों और बड़े पैमाने पर खून-खराबा झेला है। अगर फिर युवा सड़कों पर उतरे तो लोकतंत्र के लिए काला दिन साबित होगा क्योंकि अब लोकतंत्र ही उनके चपेट में आएगा। बालेन शाह का नेपाल की सत्ता में आना बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात है शासन तंत्र को जनता की आंकाक्षा के अनुरूप चलाना। बालेन शाह के लिए यही असली परीक्षा है।
बालेन शाह ने जिस जेन जी की आँधी पर सवार होकर नेपाल की सत्ता तक की चढ़ाई पूरी की, उसका एक महीना भी पूरा नहीं हुआ है और नेपाल में हर तरफ असंतोष देखा जा रहा है। चाहे भंसार नीति हो या स्वास्थ्य नीति, जनता हर नीति का विरोध करती दिख रही है। यहाँ तक कि छात्र राजनीति पर रोक लगाने के खिलाफ छात्र एकजुट हो रहे हैं। रहा सहा कसर गृहमंत्री पर लगे मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप ने पूरा कर दिया क्योंकि जेन जी के आंदोलन की शुरुआत ही भ्रष्टाचार के खिलाफ हुई थी।
जानकारों के अनुसार बालेन शाह का उदय भले ही एक एंटी-एस्टैब्लिशमेंट और युवा नेतृत्व की जीत के रूप में देखा गया हो लेकिन नेपाल की वास्तविक राजनीतिक व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिख रहा है। एक तरह से कहा जा सकता है कि एक महीने में ही बालेन शाह पर भरोसा रूपी गुब्बारा फूट गया है। बालेन शाह को लेकर जिस जेनरेशनल शिफ्ट की बात की जा रही थी, वह अभी अधूरी नजर आ रही है।
यह सही है कि उन्होंने पारंपरिक दलों से हटकर अपनी अलग पहचान बनाई और युवाओं के बीच खासा समर्थन हासिल किया, लेकिन उनकी राजनीतिक टीम और निर्णय प्रक्रिया में युवाओं और महिलाओं की भागीदारी काफी कम है यानी प्रतिनिधित्व के स्तर पर वही पुरानी व्यवस्था कायम है। जेन जी आंदोलन के बाद 2025 में नेपाल में तख्ता पलट गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को पीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा था।
जेन-जी के समर्थन से बनी अंतरिम सरकार
उस वक्त भी जेन जी बालेन शाह को ही अपना नेता मान रहे थे। बालेन शाह के समर्थन से ही सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। चुनाव हुए और बालेन शाह की पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने प्रचंड बहुमत पाया। 27 मार्च 2026 को बालेन शाह नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने। भारत-नेपाल के बीच रोटी-बेटी का संबंध रहा है। भारत-नेपाल सीमा से हर दिन हजारों लोग आवाजाही करते हैं और दिनचर्या की वस्तुएँ खरीदते हैं।
बालेन सरकार ने इसे हतोत्साहित करने के लिए 100 रुपए से ज्यादा कीमत के सामानों पर कस्टम ड्यूटी लगा दी है। इससे वहां के लोगों वे सामान खरीदकर नेपाल ले जाना काफी महँगा पड़ रहा है। पहले सीमा पर कड़ा पहरा नहीं रहा करता था और बॉर्डर क्राँस करने के लिए पहले से अनुमति लेने की किसी तरह की कोई जरूरत ही नहीं पड़ती थी। पर अब ऐसा नहीं है और बॉर्डर पर पहरा बढ़ने से लोगों को काफी दिक्कत हो रही है।
इसके विरोध में सीमावर्ती क्षेत्रों की जनता सड़कों पर उतर आई है। कई राजनीतिक संगठनों ने भी बालेन शाह की नीति का विरोध किया है। इनका कहना है कि पारंपरिक रिश्तों को कमजोर करने की कोशिश बालेन सरकार ने की है, जो सरासर गलत है। यह नीतिगत फैसला बालेन सरकार को भारी भी पड़ सकता है। जानकारी के अनुसार जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ जेन जी ने विद्रोह कर केपी ओली की सरकार को उखाड़ फेंका था।
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गृहमंत्री सुदन गुरुंग पर मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप
उस भ्रष्टाचार का दीमक एक महीने में ही बालेन सरकार को लग गया है, अब इसे क्या कहा जाए। प्रधानमंत्री बालेन शाह के कैबिनेट के अहम सदस्य गृहमंत्री सुदन गुरुंग मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में फँस गए हैं। उन पर इस्तीफा देने का राजनीतिक दबाव बन रहा है। नेपाली काँग्रेस समेत कई राजनीतिक दलों ने गृहमंत्री के खिलाफ स्वतंत्र जाँच की माँग की है। सिविल सोसायटी भी चाहती है कि जब तक जाँच हो, तब तक गृहमंत्री को पद से हट जाना चाहिए क्योंकि इससे जाँच प्रभावित हो सकती है।
जेन जी रेड फोर्स ने नैतिक आधार पर इस्तीफे की माँग करते हुए कहा है कि अगर गृहमंत्री गुरुंग अपने पद पर बने रहते हैं तो इससे जनता का विश्वास नई सरकार पर पूरी तरह से कमजोर हो जाएगा। ऐसे में सबकी नजर बालेन शाह पर टिकी हुई है। आखिर भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाने की बात करने वाले प्रधानमंत्री अब क्या कदम उठाते हैं। जिस जेन-जी के दम पर सत्ता तक पहुँचे बालेन शाह ने अपने 100 दिनों के ऐक्शन प्लान में सबसे पहले छात्र राजनीति पर प्रतिबंध लगा दिया।
बालेन शाह ने साफ कहा कि शिक्षण संस्थान अब राजनीति के लिए नहीं बल्कि ज्ञान का केन्द्र होंगे ,यानी अब तक राजनीति हो रही थी, वह गलत था। नेपाल में बालेन शाह का चुनाव दक्षिण एशियाई राजनीति में एक बदलाव को दर्शाता है। जेन-जी की जबरदस्त भागीदारी से बनी सरकार से लोगों को स्वच्छ शासन, प्रशासनिक दक्षता और पारंपरिक राजनीतिक ढाँचों से पूरी तरह अलग व्यवस्था बनाने की उम्मीद थी लेकिन एक महीने में ही जनता का विश्वास हिलने लगा है।
नेपाल की नौकरशाही में अब भी पुरानी कार्यप्रणाली
जेन-जी आंदोलन की दीर्घकालिक सफलता केवल नेतृत्व पर ही नहीं, बल्कि नागरिकों की निरंतर भागीदारी पर भी निर्भर करती है। देश के नागरिक लोकतंत्र में केवल वोट ही नहीं देते बल्कि सरकार के कामकाज पर अपना फैसला भी वोट के माध्यम से बताते हैं। जानकारों के अनुसार नेपाल का सिस्टम अभी भी नहीं बदला है। नौकरशाही पुरानी है और कामकाज का तरीका भी उनका पुराना ही है। इसमें बदलाव जरूरी है।
शासन केवल लोकप्रियता या अच्छे इरादों से ही नहीं चलता, यह उन संस्थागत ढाँचों को बदलने की क्षमता पर निर्भर करता है, जो समाज में गहराई तक अपनी जड़ें जमा चुकी हैं। अगर प्रचंड जनादेश के बाद भी नेपाल की स्थिति नहीं बदलती है तो इसका परिणाम लोकतंत्र के लिए भी घातक हो सकता है। अभी तक लोकतांत्रिक बदलाव को जनता आशाभरी नजरों से देख रही है।

अगर युवाओं का मोहभंग हुआ, तो ये और भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है। नेपाल वासियों ने आंदोलन के दौरान हुई हिंसक वारदातों और बड़े पैमाने पर खून-खराबा झेला है। अगर फिर युवा सड़कों पर उतरे तो लोकतंत्र के लिए काला दिन साबित होगा क्योंकि अब लोकतंत्र ही उनके चपेट में आएगा। बालेन शाह का नेपाल की सत्ता में आना बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात है शासन तंत्र को जनता की आंकाक्षा के अनुरूप चलाना। बालेन शाह के लिए यही असली परीक्षा है।
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