विकसित भारत के सपने के लिए जरूरी है जल्द दूर हो एनर्जी गैप
सरकार एनर्जी गैप यानी विद्युत उत्पादन और आपूर्ति के बीच के अंतर को पाटने के लिये प्रयासरत है। उसकी कोशिशों के बेहतर परिणाम बताते हैं कि काम कठिन अवश्य है पर उसका समयबद्ध कार्यक्रम सफल होगा, तब देश का कोई कोना अंधेरे में नहीं रहेगा बल्कि राष्ट्रीय विकास यात्रा का सहयात्री बनेगा।
सरकार के विद्युत उत्पादन वृद्धि के गंभीर प्रयास सार्थक, सकारात्मक परिणाम दे रहे हैं यह बतौर आंकड़े सबके सामने हैं। लेकिन हालिया रिपोर्ट कहती है कि इसके बावजूद देश में अभी भी एनर्जी गैप मौजूद है, जो कि शोचनीय है। विभिन्न दलों ने कई बार चुनावी दावे किए कि हम सत्तासीन हुए तो देश का कोई कोना अंधेरे में नहीं रहेगा या सरकारों ने कहा, हमने गांव-गांव तक बिजली पहुंचा दी है, लेकिन भारत में एनर्जी गैप यानी ऊर्जा अंतर या कहें ऊर्जा की मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर आज भी एक महत्वपूर्ण चुनौती है।
हमारी तीव्रगामी अर्थव्यवस्था, शहरीकरण, बाज़ार तथा व्यक्तिगत उपभोग में बिजली की बढ़ती खपत के कारण देश में विद्युत ऊर्जा की मांग तेजी से बढ़ रही है। बीते दो वर्षों में इसमें तकरीबन 50 गीगावाट की बढ़त हुई है। यह कटु सत्य है कि देश के बहुत से क्षेत्रों में ऊर्जा आपूर्ति सीमित, अस्थिर या शून्य है। सामान्यत ऐसी स्थिति में समझा जाता है कि सुदूर, दुर्गम अथवा विरल जन क्षेत्रों में ऐसा है भी, तो क्या ही फर्क पड़ता है। विकास की तीव्र गति अगले पांच साल के भीतर देश के हर क्षेत्र में विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित कर देगी।
ऊर्जा अंतर का विकास और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
देश का कोई भी हिस्सा यदि ऊर्जा अंतर का शिकार है तो वह देश की एक कमजोर कड़ी है। कहावत है कि कोई ज़ंजीर उतनी ही मजबूत होती है, जितनी उसकी एक कमजोर कड़ी। ऊर्जा अंतर का शिकार इलाका छोटा हो या बड़ा, महत्वपूर्ण हो या गौण, वस्तुत वह सामाजिक, आर्थिक विषमताओं का शिकार है और देश की प्रगति में अपना आपेक्षिक योगदान नहीं दे पा रहा, यह बात बहुत महत्वपूर्ण है।
कुछ बरसों बाद देश में बिजली आपूर्ति सर्वव्यापी होगी, यह आशावादिता स्वागतयोग्य है। सरकार की कोशिशों को देखकर अनुमान सत्य हो सकता है, पर असलियत यह है कि अभी तक ऐसा हो नहीं पाया है। जब तक पर्याप्त विद्युत उत्पादन नहीं होगा, व्यापक अवसंरचना विकसित नहीं होगी, तब तक आपूर्ति के बारे में सुनिश्चित कैसे हुआ जा सकता है। यह एनर्जी गैप भविष्य में कई क्षेत्रों पर नकारात्मक प्रभाव डालेगा।
यह स्थिति ऊर्जा की कीमतों, उपलब्धता और स्थिरता पर तो असर डालेगी ही, इसके कई परोक्ष प्रभाव भी हैं, यथा औद्योगिक उत्पादन में बाधा, जो रोजगार और सकल घरेलू उत्पाद पर असर डालेगी। सिंचाई और कोल्ड स्टोरेज जैसी सुविधाएं प्रभावित होने से खाद्य सुरक्षा संकट में पड़ेगी। ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में विकास की गति और धीमी हो जाएगी। डिजिटल शिक्षा और स्मार्ट क्लासरूम जैसी योजनाएं मंथर गति से चलेंगी तो यह ऊर्जा अंतर स्मार्ट ग्रिड, इलेक्ट्रिक ट्रांसपोर्ट और स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास को धीमा कर देगा।
ऊर्जा अंतर को मिटाने की रणनीति और समाधान
बेशक हमें समझना होगा कि तमाम कोशिशों के बाद भी एनर्जी गैप क्यों है? विद्युत उत्पादन तथा आपूर्ति के इस अंतर को दूर करने के लिये सरकार अपनी ऊर्जा रणनीति को किस तरह से लागू करे, उसे इस दिशा में चल रहे कार्यक्रमों के अलावा और क्या करना होगा। निजी उपक्रम कौन कौन से टूल्स, टेक्नीक अपना सकते हैं? ऊर्जा आपूर्ति के विकेंद्रीकरण का सुझाव कितना फायदेमंद रहेगा।
आंकड़े और तकनीक मिलकर कौन सी प्रविधि विकसित करें, जो यह बताये कि किसे किस समय कितनी बिजली की अहम आवश्यकता है? वैकल्पिक ऊर्जा का क्या इंतज़ाम हो? पीएम सौर ऊर्जा अथवा ऐसी योजनाएं कैसे लागू करें कि शीघ्र असर दिखाएं? इन सब पर समेकित विचार आवश्यक है। इसके लिए यह जानना जरूरी है कि देश किस स्रोत से कितनी बिजली और बनाए कि वह अपनी बढ़ती जरूरतों के अलावा पर्यावरण का मिलेनियम गोल भी पूरा कर सके? देश के कितने इलाके या क्षेत्रफल अभी भी बिजली की नियमित आपूर्ति से छूटे हुए या वहां विद्युत आपूर्ति सीमित अथवा शून्य है? ग्रामीण इलाकों तक बिजली पहुंचाने का खर्च कैसे कम हो?
ऊर्जा अंतर के खात्मे हेतु हमारे पास दृढ इच्छाशक्ति, सटीक शुद्ध आंकड़े, सुस्पष्ट लक्ष्य निर्धारित कार्य नीति तथा सक्षम टूल्स और टेक्नीक के साथ सक्रिय क्रियान्वयन आवश्यक है। इन सबकी उपस्थिति में मिलेनियम गोल से पहले यह लक्ष्य पाया जा सकता है। इन सबके लिये व्यवस्था को यह स्वीकारना होगा कि हम देश के सभी इलाकों में बिजली नहीं पहुंच पाये हैं। इसके संबंध में किए जाने वाले सरकारी दावे सियासी जुमले हैं।
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ऊर्जा आंकड़ों की विसंगति और विश्वसनीयता का संकट
देश वास्तव में एनर्जी गैप से मुक्त नहीं है। बात आती है वास्तविक आंकड़ों की, जिनके आधार पर संबंधित कार्यक्रमों का क्रियान्वयन होगा तथा सफलता और प्रगति आंकी जाएगी। ऊर्जा कुशलता का मूल्यांकन बहुत हद तक इन आंकड़ों की गुणवत्ता पर ही निर्भर करता है। भारत में इससे संबंधित आंकड़े हासिल करने के लिए कई स्रोत हैं। केंद्रीय बिजली प्राधिकरण, केंद्रीय बिजली नियामक आयोग, ग्रिड इंडिया, ऊर्जा, कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के मंत्रालय से भी विद्युत उत्पादन के आंकड़े मिलते हैं।
रिन्यूएबल एनर्जी और संबंधित विभाग के इंटरएक्टिव डैशबोर्ड, भारत सरकार का सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय की एनर्जी स्टैटिस्टिक्स इंडिया वार्षिकी, ऊर्जा से जुड़े मंत्रालयों और संस्थानों, नीति आयोग जैसे इसके तमाम स्रोत मौजूद हैं। अलग-अलग स्रोत एक ही विषय में भिन्न आंकड़े देते हैं। प्राथमिक ऊर्जा की खपत और उत्पादन के इन आंकड़ों के बीच विशाल अंतर की अनदेखी नहीं की जा सकती है।
घरेलू आंकड़ों और अंतरराष्ट्रीय स्रोतों से मिलने वाले आंकड़ों में इतना फर्क है कि वे देश में ऊर्जा से जुड़े बदलाव की बात को तर्कातीत बना देते हैं। हालांकि ऊर्जा की मांग और आपूर्ति से जुड़ें आंकड़ों के स्रोतों का विस्तार सकारात्मक है फिर भी इनको इकट्ठा और इनका मिलान करके, सुबोध तरीके से प्रस्तुत करने के लिए किसी केंद्रीय एजेंसी का न होना, दुर्दमनीय चुनौती बना हुआ है। इसका समाधान निकाला जाना चाहिये। सुनिश्चित आंकड़े यह काम आसान करेंगे।
ऊर्जा संकट से निपटने की नीतिगत तैयारी
फिलहाल आंकड़े कहते हैं कि हमने विद्युत उत्पादन और आपूर्ति अथवा खपत के अंतर को काफी हद तक पाटा है। लेकिन आंकलन है कि 2027 तक भारत को शाम के समय 40 गीगावाट तक बिजली की कमी का सामना करना पड़ेगा। बिजली की मांग 2047 तक चार गुणा बढ़ सकती है। असल में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, कूलिंग और ट्रांसपोर्ट में बिजली की खपत बढ़ रही है।
रिन्यूएबल्स 2025 की ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट बताती है जिस गति से हम अक्षय ऊर्जा बनाने की ओर बढ़ रहे हैं, उस चाल से 2030 तक अक्षय ऊर्जा के निर्माण लक्ष्य में हम 6 टेरावाट से अधिक पीछे रहेंगे, यह कमी उतनी है ,जितनी कि हमने आज तक कुल अक्षय ऊर्जा उत्पादित की है। ऐसे में मांग और पूर्ति के बीच बढ़ती खाई को भरने के लिए तत्काल नीतिगत कार्रवाई की आवश्यकता है। सौर ऊर्जा के साथ स्टोरेज क्षमता को बढ़ाने पर ध्यान देना सबसे अच्छा विकल्प है। सौर ऊर्जा संयंत्रों को नए थर्मल और हाइड्रो प्लांट्स की तुलना में कहीं तेजी से स्थापित किया जा सकता है।

ऊर्जा दक्षता में सुधार भी इसमें सहायक होगा। राष्ट्रीय विद्युत योजना 2022 से 32 के तहत ऊर्जा मांगों को पूरा करने के लिए 2032 तक कुल 33 लाख करोड़ रुपये के निवेश को मंजूरी देने पर यह अंतर भरने में मददगार होगी। पीएम कुसुम, सूर्यघर, पैट उजाला जैसी योजनाएं भी इस लक्ष्य को पाने में सहायक साबित होंगी। एक करोड़ मकानों पर सोलर रूफटॉप स्थापित करने, उत्पन्न अतिरिक्त बिजली को ग्रिड में ले जाने की योजना बेहतर है। भारत में ऊर्जा अंतर एक जटिल चुनौती है, लेकिन इससे निबटने के लिए सरकार के कार्यक्रम सही दिशा में हैं।
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