मजदूर दिवस : श्रमिकों के संघर्ष के विजय का पावन दिन

धरा के सौन्दर्य का आधार श्रम है। श्रम-श्वेद से सिंचित वसुन्धरा में स्वप्नों के विविध रंग अपनी आभा के साथ प्रकट होकर जन-जन को प्रसन्नता की पूंजी बांटते हैं। मनुष्य का श्रम ही जीवन के कर्म पथ पे कष्ट कंटकों को चुनकर उस पर सुवासित सुमन बिखेरता है। दुनिया की गतिशीलता का ईंधन श्रम है, जो श्रमिक के अनवरत जीवन संघर्ष से उपजता है। श्रमिक ही अपनी मेहनत से बंजर धरती को हरीतिमा का फलक प्रदान करता है, अथाह सिंधु जल में गोता लगा मुक्ता-मूंगों का ढेर जग की झोली में उछाल देता है।

वही वह महत्वपूर्ण व्यक्ति है जो एक-एक ईंट जोड़ कर भव्य प्रासाद का निर्माण कर देता है। श्रमिक ही है जो काल के वक्षस्थल पर पैर रखकर जन सामान्य के लिए सुख-सुविधा के तमाम संसाधन सुलभ कराता है। वही है जो संतोष के धन से समृद्ध है, आबाद है। अपनी टूटी झोपड़ी में रह कर रूखा-सूखा खाकर भी वह लोक कल्याण के लिए अहर्निश बद्धपरिकर हो श्रम-संलग्न रहता है।

श्रमिक बनाता दुनिया, पर खुद रहता वंचित

पर संसार की क्षुधा शान्त करने वाला भूखा है, अर्द्धवसन है। महल निर्मित करने वाला कुशल कामगार कुटीर वासी है, क्यों? आखिर क्यों पूरी दुनिया में 1 मई मजदूर दिवस के रूप में मनाकर उनके उत्थान की बातें की जाती हैं लेकिन मजदूर की किस्मत नहीं बदलती। वह पूंजी के पाटों के बीच फंसा छटपटा रहा है। संगठन के स्तर पर दो प्रकार के मजदूर वर्ग सामने दिखाई पड़ते हैं।

पहला संगठित और दूसरा असंगठित। सबसे बुरी स्थिति इसी दूसरे असंगठित मजदूर वर्ग की है। संगठन और सक्षम नेतृत्व के अभाव में ये अपनी बात मालिक तक पहुंचा नहीं पाते। इनका शोषण भी बहुत होता है। चाहे वह श्रम के रूप में हो या मजदूरी में मिलने वाली राशि के रूप में। महिला मजदूरों की स्थिति तो और भी दयनीय है। उनसे भरपूर और पुरुषों के बराबर काम तो लिया ही जाता है पर मजदूरी पुरुष कामगार के सापेक्ष आधी ही दी जाती है।

पर मजदूर यह सब अन्याय सहने को अभिशप्त हैं, मजबूर हैं; क्योंकि पेट की आग और चूल्हे की ठंडी पड़ी राख के बीच जूझना उसकी नियति बन चुकी है। पेट की आग उन्हें घर में बैठने नहीं देती और बाहर की निर्मम दुनिया में हर कदम में खतरा है। पर वे इस खतरे से लड़ते-जूझते हुए जीती हैं, जीतती हैं। इसी प्रकार ईंट-भट्टों के काम में दो वक्त की रोटी की तलाश में गांव में केवल बूढ़ों को छोड़कर अपने पुरखों के घर-देहरी से दूर पंजाब, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में डेरा डाले ये मजदूर बस ईंट पाथने की मशीन बन जाते हैं। इन्हें ठेकेदार दूर-दराज के गांवों से सपने दिखाकर ले जाता है।

श्रमिक आंदोलन का प्रारंभिक केंद्र इंग्लैंड

सिर पर कर्ज का बोझ उसकी विद्रोह की शक्ति खींच लेता है। कल-कारखानों में दो-दो पालियों में काम करना और छोटी झुग्गी में आठ-दस मजदूरों के साथ रहना, जहां न स्वच्छ पेयजल है, न संतुलित भोजन और न ही समुचित स्वास्थ्य सुविधाएं। यदि हम मजदूरों के सांगठनिक विकास पर एक दृष्टि डालें तो हमारी नजर सर्वप्रथम इंग्लैंड की ओर जाती है। सबसे पहले इंग्लैंड में ही मजदूर संगठन बना।

धीरे-धीरे अमेरिका और यूरोप में औद्योगिकीकरण के कारण मजदूर आन्दोलन प्रारम्भ हुए। इनकी शुरुआती मांग थी कि काम के 12-16 घंटों को घटाया और निश्चित किए जाये। साथ ही सप्ताह में एक दिन की छुट्टी भी मिलनी चाहिए। इन्हीं आन्दोलनों और मजदूर वर्ग में आयी जागरूकता का ही प्रभाव था कि 1835 तक कई देशों के मजदूरों ने 10 घंटे प्रतिदिन काम का अपना हक प्राप्त कर लिया था।

1860 तक अमेरिका में भी 10 घंटे का कार्य दिवस निश्चित कर दिया गया। पहली मजदूर राजनीतिक पार्टी 1828 में फिलाडेल्फिया में बनी जिसके घोषणा पत्र में 10 घंटे का कार्यदिवस करने, सेना में अनिवार्य सेवा की समाप्ति, मजदूरी मुद्रा में देने, बच्चों की शिक्षा, कर्जदार मजदूरों के लिए दी जाने वाली सजा को समाप्त करने जैसे बुनियादी मांगें शामिल थीं; जो धीरे-धीरे मानी भी गईं। कुछ मजदूर यूनियनों ने अपना अखबार भी निकाला और हड़ताल करने के लिए स्थायी कोष की भी व्यवस्था की। 7 सितम्बर, 1883 सितम्बर के पहले सोमवार को पहली बार मजदूर छुट्टी दिवस मनाया गया।

1886 शिकागो हड़ताल से बदले श्रम कानून

शिकागो (अमेरिका) में 1 मई, 1886 को बहुत बड़ी मजदूर हडताल हुई, जिसमें 8 घंटे का कार्य दिवस करने और सप्ताह में एक दिन की अनिवार्य छुट्टी देने की मांग की गई। उसी का परिणाम है कि विश्व में प्रत्येक दुकान-संस्थान में आज एक दिवसीय साप्ताहिक अवकाश की वैधानिक व्यवस्था है। भारत में पहली बार मजदूर दिवस 1 मई, 1923 को मद्रास (अब चैन्नई) में मनाया गया। बुनकर, बुक बाईण्डर, दर्जी, जूते बनाने वाले, प्रिन्टर्स, कल-कारखानों और कार्यालयों में काम करने वाले मजदूरों ने अपने संगठन बनाये। शुरुआत में ये संगठन पुरूषों के लिए थे लेकिन कालान्तर में महिलाओं ने भी अपने संगठन बनाये क्योंकि इनकी मांगें समान वेतन के साथ ही कुछ भिन्न प्रकार की थीं।

प्रमोद दीक्षित मलय
प्रमोद दीक्षित मलय

आज दुनिया में सभी मजदूरों से केवल आठ घंटे ही काम लिया जाता है। एक दिन की साप्ताहिक छुट्टी के साथ अन्य तमाम सुविधाएं भी प्रदान की जाती हैं। मजदूर दिवस को समर्पित डाक टिकटों को जारी करना तथा मूर्तियों की स्थापना भारत सहित कई देशों द्वारा की गई है। वस्तुत: मजदूर दिवस की सार्थकता सही मायनों में तब सिद्ध होगी जब हम उनके समस्त अधिकारों की रक्षा करते हुए उनके सुख-दुःख में साझीदार बनेंगे, उनके साथ कदम दर कदम चलते हुए उनके सपनों को साकार करने में अपनी सम्यक् भूमिका निर्वहन कर सकेंगे। उनकी कुटी में आत्मविश्वास का उजाला बिखेर सकेंगे।

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