किसी को सुनना भी सेवा है

जन्म से लेकर मृत्यु तक की अपनी यात्रा के दौरान हम सभी सुरक्षित महसूस करने के लिए लगातार किसी न किसी व्यक्ति से सहयोग इसमें कोई दो राय नहीं है कि ईश्वर में के कारण ही यह दुनिया चल रही है, किंतु उस एक ईश्वर की तरह दूसरों की मदद की पुकार प्रयत्न करें तो शायद दुनिया में कोई कभी दुःखी तो आइए, अपनी व्यक्तिगत क्षमता के अनुसार संकल्प लें कि- ‘मुझे हर रोज़ किसी एक व्यक्ति सुनकर उसे तनाव मुक्त महसूस करवाना है।’
व समर्थन लेते रहते हैं, क्योंकि जीवनभर हमें रोने के लिए किसी के कंधे की आवश्यकता पड़ती है। शायद ही कोई इन सब बातों के विषय में अटूट श्रद्धा हम सभी सुनने का नहीं रहेगा, हम यह का दुःख सोचता होगा, क्योंकि हम सभी एक ऐसी सामाजिक समर्थन प्रणाली का हिस्सा हैं, जहाँ हर कोई एक-दूसरे के समर्थन से जीवित रहने के प्रयास में लगा हुआ है। इसलिए एक स्वतंत्र जीवन-शैली की कल्पना करना लोगों को जैसे असंभव-सी बात लगती है। वर्तमान हम सभी एक ऐसी तेज गति वाली जीवन जी रहे हैं, जहाँ हर चीज़ इतनी तेजी से बदलती है कि हम मुश्किल से किसी एक भावना के अंतर्गत रहकर जी पाते हैं।
तिस्पर्धा, तनाव और मनोदैहिक विकार
मसलन, आज किसी को यदि अच्छी नौकरी लग जाती है, तो ख़ुशी के साथ उसके भीतर असुरक्षा की भावना निर्माण हो जाती है, क्योंकि ऑफिस में मजबूत प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण की वजह से पहले दिन से उसे अपनी नौकरी बचाने में लग जाना पड़ता है। ऐसी विभिन्न मिश्रित भावनाओं के कारण हमारा मन इतना चंचल और असंतुलित हो जाता है कि एक घड़ी हम हंसते हैं तो दूसरी घड़ी रोने लगते हैं। आधुनिक विज्ञान के अनुसार इसे मनोदैहिक विकार कहा जाता है, जो आधुनिक जीवन शैली का एक तोहफा है।
आधुनिकीकरण की आड़ में यह मानसिक बीमारी इस कदर समाज में फैल गई है कि इसे नियंत्रित करने के लिए एक मजबूत समर्थन प्रणाली की आवश्यकता है। दुनिया भर के मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि एक व्यथित व्यक्ति को धैर्यतापूर्वक सुनने से हम उन्हें मानसिक आघात की पीड़ा से मुक्त कर सकते हैं। आज समाज में यदि सबसे ज्यादा किसी चीज़ की आवश्यकता है तो वह है ‘शांतिपूर्वक किसी के दिल का हाल सुनना। हम सभी को इसका अनुभव है। हम अपना मन किसी के सामने हल्का करते हैं तो उसके बाद तनाव मुक्त महसूस करते हैं।
संवेदना, सहानुभूति और मानवता का सच्चा स्वरूप
इसलिए किसी की व्यथा को सुनने से हम उन्हें योग्य मार्ग दिखाकर आगे बढ़ने की मदद कर सकते हैं ताकि अपनी समस्याओं के लिए स्वयं ही समाधान खोज सकें। हिन्दी में एक लोकप्रिय मुहावरा है- जिसका कोई नहीं उसका तो खुदा हैं यारो अर्थात कोई मनुष्य आपकी बात सुने या न सुने, परंतु वह परमात्मा अवश्य ही आपकी बात सुनेगा। यही कारण है कि समस्त विश्व की आत्माएं। उस परमात्मा से प्रार्थना करती हैं, क्योंकि उन्हें यकीन होता है कि उनकी पुकार ऊपर बैठे सर्व शक्तिमान तक पहुँच रही है, जिसका उत्तर उन्हें अवश्य मिलेगा।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि ईश्वर में अटूट श्रद्धा के कारण ही यह दुनिया चल रही है, किंतु हम सभी उस एक ईश्वर की तरह। दूसरों की मदद की पुकार सुनने का प्रयत्न करें तो? शायद दुनिया में कोई कभी दुःखी नहीं रहेगा, तो आइए, अपनी व्यक्तिगत क्षमता के अनुसार हम. यह संकल्प लें कि ‘मुझे हर रोज़ किसी एक व्यक्ति का दुःख सुनकर उसे तनाव मुक्त महसूस करवाना है।’
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