एडथुआ पेरुनल उत्सव : आस्था और परंपरा का सांस्कृतिक संगम

27 अप्रैल से 7 मई तक

यह अलप्पुझा (केरल) के एडथुआ गांव में मनाया जाता है। इसका मुख्य स्थल सेंट जॉर्ज फॉरेन चर्च है। यह हर साल 10 दिनों तक अप्रैल के अंत और मई की शुरुआत में मनाया जाता है। सेंट जॉर्ज को समर्पित इस सांस्कृतिक उत्सव की सबसे खास विशेषता है, इसका भव्य धार्मिक जुलूस। इसजे-धजे हाथियों की परेड, पारंपरिक संगीत और नृत्य की छटा के साथ आतिशबाजी भी देखने को मिलती है। इसमें हिस्सा लेने वाले लोगों का एक बड़ा तबका ऐसे आस्थावान लोगों का होता है, जो अपनी असाध्य बीमारियों से मुक्ति पाने की इच्छा से यहां आते हैं और बीमारियों से मुक्ति पाने के लिए मन्नतें मांगते हैं।

केरल की सांस्कृतिक पहचान सिर्फ इसके मंदिरों और पारंपरिक उत्सवों तक सीमित नहीं है। यहां के ईसाई समुदाय के पर्व भी उतने ही भव्य और जीवंत हैं। इन्हीं में से एक एडथुआ पेरुनल उत्सव है, जो मुख्यत सेंट जॉर्ज को समर्पित है। एडथुआ पेरुनल उत्सव हर साल अप्रैल के अंत से मई की शुरुआत तक लगभग 10 दिनों तक मनाया जाता है। इस दौरान चर्च परिसर और उसके आस-पास के क्षेत्र में विशाल मेले का आयोजन होता है। हजारों श्रद्धालु आस्था और श्रद्धा से इस उत्सव में भाग लेते हैं।

उत्सव की शुरुआत विशेष प्रार्थनाओं और ध्वजारोहण से होती है। हर दिन अलग-अलग धार्मिक अनुष्ठान, जुलूस और सांस्कृतिक कार्पाम आयोजित किए जाते हैं। अंतिम दिन का जुलूस सबसे भव्य होता है, जिसमें सेंट जॉर्ज की प्रतिमा को सुसज्जित रथ पर रखकर पूरे गांव में घुमाया जाता है। इसमें सजे-धजे हाथियों के साथ जुलूस निकाला जाता है, जो केरल के विशिष्ट उत्सवों की सबसे खास पहचान है।

सेंट जॉर्ज को चमत्कारी मानकर श्रद्धालु मांगते हैं मन्नतें

इस उत्सव के दौरान रात के समय भव्य आतिशबाजी के नजारे भी देखने को मिलते हैं। एडथुआ पेरुनल का धार्मिक महत्व है, क्योंकि सेंट जॉर्ज को चमत्कारी माना जाता है। श्रद्धालुओं के मुताबिक इस उत्सव में भाग लेने से उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इस उत्सव में हिस्सा लेने आये लोग अपनी तरह-तरह की मन्नतें मांगते हैं और उनके पूरे होने पर सेंट जॉर्ज को धन्यवाद देने के लिए पुन इस उत्सव में शामिल होने का संकल्प लेते हैं। इसलिए यह पारंपरिक आयोजन व्यक्तिगत आस्था और सामूहिक विश्वास का भी संगम बन जाता है।

एडथुआ पेरुनल उत्सव की एक अनोखी विशेषता इसकी सामाजिक समरसता है। यह उत्सव धार्मिक सीमाओं से परे लोगों को आपस में जोड़ता है। ऐसे में यह एकता में विविधता का जीवंत उदाहरण बन जाता है। यह उत्सव इस बात को भी दर्शाता है कि भारतीय संस्कृति केवल विविधभर नहीं है बल्कि इसमें गहरा साझा भाव भी है। यह परंपराओं को आधुनिक करने का भी उदाहरण है। जहां एक तरफ प्राचीन अनुष्ठान होते हैं, वहीं दूसरी ओर आधुनिक व्यवस्थाएं भी आयोजन का हिस्सा होती हैं। कुल मिलाकर एडथुआ पेरुनल उत्सव धार्मिक पर्व, आस्था, संस्कृति और सामाजिक एकता का जीवंत प्रतीक है। इस प्रकार एडथुआ पेरुनल जैसा उत्सव श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है।

-धीरज बसाक

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