मेरी चुप्पी अब हथियार बनेगी!

हाँ, मैं टूटी हूँ, हारी हूँ,
पर अब और नहीं बिकूँगी।
इन सौदागरों की मंडी से
अपनी आत्मा को खींच लूँगी।

मेरी चुप्पी अब हथियार बनेगी,
मेरी पीड़ा अब पुकार बनेगी।
जिस देह को तुमने नीलाम किया,
वो ही कल तुम्हारा न्याय बनेगी।

मैं बेटी भी हूँ, माँ भी हूँ,
बहन भी हूँ, दुल्हन भी हूँ।
मेरे आँचल में आँसू ही सही,
पर हौसलों का समंदर भी हूँ।

ये समाज मुझे जो चाहे कहे,
मैं गुनाह नहीं, एक सज़ा हूँ।
पर अब मैं अपनी सज़ा को
तेरे चेहरे पर आईना बना दूँगी।

मेरे होंठों की ख़ामोशी अब
आवाज़ बन कर गूंजेगी,
मेरे पाँव की बेड़ियाँ
कल चीर कर आज़ादी चुनेंगी।

-सुभाष बुड़ावनवाला

मैं स़िर्फ जिस्म नहीं,
मैं आत्मा हूँ, मैं औरत हूँ।
मैं गुलाम नहीं, मैं सवाल हूँ,
मैं इंसान हूँ- इंसान हूँ!

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