कर्म क्षय के लिए तपस्या का होना आवश्यक : जयश्रीजी
हैदराबाद, जिस प्रकार मक्खन से घी निकालने के लिए उसे तपाना पड़ता है, ठीक उसी प्रकार जीवन रूपी मक्खन से कषाय, काम, मोह के कर्मों का मैल निकालने के लिए उपवास आदि तप की आंच शरीर, इंद्रियों और मन रूपी बर्तन को तपाकर शुद्ध किया जाता है, इसलिए कर्मों को क्षय करने के लिए जीवन में तपस्या का होना नितांत आवश्यक है। उक्त उद्गार श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ ग्रेटर हैदराबाद के तत्वावधान में काचीगुड़ा स्थित श्री पूनमचंद गांधी जैन स्थानक में चातुर्मासिक धर्म सभा को संबोधित करते हुए साध्वी जयश्रीजी म.सा. आदि ठाणा-3 ने व्यक्त किये।
संघ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष अशोकचंद तातेड़ द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, साध्वीश्री ने कहा कि जैन धर्म में तप के 12 भेद बताए गए हैं। इसमें बाह्य और अभ्यंतर तप शामिल हैं। दोनों ही प्रकार के तपों से आत्मा पर लगे कर्मों को मीटाया जा सकता है। दोनों प्रकार के तपों की आराधना कर मानव कर्मों से मुक्त हो सकता है। कर्म क्षय के लिए तीन विधान बताए गये हैं- प्रतिक्रमण, प्रायश्चित और तपस्या।
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तपस्वियों का सम्मान और गौतम प्रसादी का आयोजन
साध्वी राजश्रीजी म.सा. ने कहा कि आत्मा को आत्मा धारण कर रखता है, जोड़े रखता है, वह भव्यात्मा है और इस प्रकार के अध्यात्म भाव में सतत इंद्रियों आदि को नियंत्रित रखना ही तप कहा गया है। शरीर की आवश्यकताओं पर विजय प्राप्त करना या उन्हें रोकना बाह्य तप द्वारा होता है, जबकि मन की आवश्यकताओं या इच्छाओं का निरोध करना अभ्यंतर तप से होता है। महामंत्री पवन कटारिया ने धर्म सभा का संचालन करते हुए बताया कि रात्रीकालिन नवकार महामंत्र जाप के लाभार्थी किशनलाल धन्नी बाई चमनलाल अनिल मुथा परिवार हैं।
धर्म सभा में गत 27 अगस्त को प्रमोद खिंवसरा और उनके पुत्र गौरव खिंवसरा ने साध्वीश्री के मुखारविंद से 9 उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किए थे। दोनों तपस्वियों की अनुमोदना में आज धर्म सभा में खिंवसरा परिवार की ओर से मनाली श्वेता तनीषा महिमा करिश्मा एवं रश्मि कोठारी और स्वरूपचंद पारख द्वारा गीतिका पेश की गयी। तपस्वियों का संघ की ओर से बहुमान किया गया। महावीर कोठारी ने वर्ष भर 151 पौरसी और उनकी भाभी ने 101 पौरसी की बोली लगाकर तपस्वियों का बहुमान किया। खिंवसरा परिवार की ओर से गौतम प्रसादी का आयोजन किया गया।
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