सांस्कृतिक उल्लास का महीना है सावन

(संस्कृति)

सावन का महीना साल के सभी महीनों में खास होता है। यह जितना भक्ति और आध्यात्मिकता के वातावरण से परिपूर्ण होता है, इसका उतना ही अपना सांस्कृतिक प्रभाव भी है। सावन का महीना वर्षा गीतों का भी महीना है। कजरी, झूला, मेला, कैरवा तथा सावनी..ये सब लोकराग और वनहटिया गीत केवल रिमझिम बूंदों की झड़ी वाले सावन के महीने में ही सुनायी पड़ते हैं। इस माह में शास्त्रीय संगीत की भी एक गहन विरासत है।

इसी माह में मेघ और मियां मल्हार राग की गूंज पूरे वातावरण को मोहित कर देती है। सावन की घटाएं अपने आपमें कविता हैं। ये कविताएं शास्त्रीय संगीत की तान पर सवार होती हैं, तो सावन का महीना अपने आपमें एक अनुगूंज बन जाता है। प्राचीन काल से ही भारत में सावन माह का मतलब हरियाली तीज, कजरी तीज, नाग पंचमी जैसे वर्षा ऋतु से जुड़े त्योहारों का वातावरण रहा है।

सावन: झूले, तीज और लोकगीतों का उत्सव

सावन के हर सप्ताह में कोई न कोई ऐसा त्योहार आता है, जिसके साथ तीज शब्द जुड़ा होता है, जो महिलाओं के उत्सव का पर्याय होता है। इसी महीने में सबसे ज्यादा रंग-बिरंगी चूड़ियां खरीदी और पहनी जाती हैं। पेड़ों पर झूले पड़ते हैं और बारिश की बूंदों के साथ वर्षा गीतों की तान मिलायी जाती है। जब झूले पर झूलती हुई महिलाएं कजरी गीतों का समवेत गान करती हैं तो प्रकृति के उल्लास का अनुपम नजारा होता है। इसलिए सावन के महीने को स्त्री उत्सव का अनूठा महीना भी कहा जाता है।

मुगलकाल में कट्टर धार्मिक विचारों के कारण मुस्लिम सत्ता, कला और संगीत से खुद को दूर किए थी, किंतु झूलों और लोकगीतों की परंपरा न अवध में कम हुई और न संस्कृति के गढ़ बुंदेलखंड में। मुगलकाल से लेकर अंग्रेजों तक के राज में झूलों की परंपरा बदस्तूर जारी रही । दिल्ली में जब मुगलों का शासन था, तो लालकिले में सावन के उल्लास को एक समारोही रूप देने के लिए सावन-बाधौं महल बनवाया गया था, जिनमें मुगलों की रानियां-पटरानियां सावन की घटाओं के बीच झूला झूलते हुए कजरी और सावनी गीत गाती थीं, जो मुगल सत्ता की संस्कृति के खिलाफ था। किंतु सावन का प्रभाव इतना ज्यादा होता था कि इस पर कभी विराम नहीं लगाया गया।

सावन: हरियाली और प्रकृति के उल्लास का अद्भुत संगम

झूला और सावन का चोली-दामन का रिश्ता है। दरअसल यह प्रकृति के उल्लास का महीना है। सावन के महीने में धरती वर्षा से सराबोर हो जाती है। खेत, वन और सारी सूखी जमीन पानी से लबालब हो जाती है। किसान खरीफ की फसल रोप चुके होते हैं। घर और प्रकृति में हर तरफ सिर्फ हरे रंग की प्रधानता होती है। जहां तक देखो सिर्फ हरा रंग ही दिखता है।

इस महीने में चारों तरफ मानो हरी चादर तान दी गई होती है। इस महीने में जितना संगीत इंसान में वातावरण के उल्लास से फूटता है, उससे कहीं ज्यादा संगीत प्रकृति से स्वयं भी फूटता है। इस महीने में मोर कहे झूम-झूमकर नाचते हैं और मेढ़क व झींगुर रात-दिन एक-दूसरे के साथ ताल पर ताल मिलाते हुए, नई से नई जुगलबंदियां पेश करते हैं।

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यह ऋतु सभी जीव-जंतुओं के प्रजनन का मौसम भी होती है, इसलिए ज्यादातर जीव-जंतु इस मौसम में अपनी खुशी और उल्लास से तरह-तरह की मधुर ध्वनियां निकालते हैं। यह महीना सचमुच में अद्वितीयता का पर्याय है। इसलिए कहा जाता है कि सावन के हरे-भरे वातावरण में मन भी हरा-भरा रहता है। यह महीना धर्म और प्रकृति की लोक संस्कृति का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है, जिसे केवल कैलेंडरों की तारीखों से ही नहीं जाना जाता, बल्कि दिल की गहराईयों से महसूस किया जाता है।

धीरज बसाक

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