कुछ रेलगाड़ियां क्यों कहीं नहीं पहुंचतीं

यह 1960 के दशक में पश्चिम बंगाल के पुरुलिया शहर से करीब 40 किलोमीटर दूर बेगुनकोदर रेलवे स्टेशन की बात है। रात के करीब साढ़े बारह बजे थे। प्लेटफॉर्म पर सन्नाटा पसरा था। स्टेशन मास्टर की कुर्सी खाली थी। दूर से कुत्तों के भौंकने की आवाज़ गूंज रही थी। तभी पटरियों पर हल्की-सी कंपन हुई, जैसे कोई ट्रेन आने वाली हो। अजीब बात यह थी कि उस समय उस रूट पर कोई ट्रेन शेड्यूल भी नहीं था। कुछ ही सेकंड में धुंध के बीच एक ट्रेन का धुंधला-सा आकार उभरा, खिड़कियों में हल्की रोशनी थी, लेकिन भीतर कोई स़ाफ दिखाई नहीं दे रहा था। ट्रेन कुछ क्षण के लिए रुकी और फिर बिना किसी घोषणा के आगे बढ़ गई, जैसे कभी आई ही न हो।

घोस्ट ट्रेन- तथ्य बनाम कल्पना क्या कहते हैं दावे

  • रात के समय बिना शेड्यूल की ट्रेन दिखना।
  • ट्रेन का बिना आवाज़ या सिग्नल के गुजरना।
  • खिड़कियों में धुंधली आकृतियां दिखना।
  • आज भारतीय रेल में हर ट्रेन का डिजिटल रिकॉर्ड होता है। इसलिए अनधिकृत गतिविधि लगभग असंभव है।
    -कई घटनाएं मिसइंटरप्रिटेशन या ऑप्टिकल इल्यूजन हो सकती हैं।)

अगली सुबह स्टेशन की लॉगबुक चेक हुई, तो उसमें भी उस समय किसी ट्रेन के आने का कोई प़ा नहीं था, लेकिन यह कोई सपना नहीं था, सच में उस रात ट्रेन आयी थी, कुछ मिनटों के लिए रुकी थी और ऐसे अदृश्य हुई, जैसे कभी आई ही न हो। यकीन मानिए, यह सिर्फ एक कहानीभर नहीं है। बीच जंगल में स्थित इस रेलवे स्टेशन को लेकर ऐसी एक नहीं दर्जनों कहानियां मशहूर हैं। दक्षिण-पूर्व रेलवे में इस स्टेशन को लेकर इतने भूतिया किस्से सुने-सुनाए जाते हैं कि भारत सरकार ने 1967 में इसे बंद कर दिया था। लगभग 42 सालों तक यह स्टेशन बंद रहा। साल 2009 में जब ममता बनर्जी रेल मिनिस्टर बनीं तब जाकर इसे फिर से खोला गया।

इटली की 1911 ट्रेन गायब होने का अनसुलझा रहस्य

वैसे अकेले भारत में ही नहीं दुनिया भर में ऐसी कई अदृश्य रेलगाड़ियों की कहानियाँ या घटनाएं हैं, जहां लोगों ने ऐसी ट्रेनें देखने का दावा किया है, जो आधिकारिक रिकॉर्ड में कहीं मौजूद ही नहीं हैं। क्या यह महज़ भ्रम है या किसी अनजानी दुनिया की झलक? एक रहस्यमयी ट्रेन कथा इटली की भी मशहूर है। प्रसिद्ध ज़नेत्ति ट्रेन डिसअपेरंस का किस्सा आज भी रहस्य बना है। कहते हैं, साल 1911 में एक टूरिस्ट ट्रेन सुरंग में दाखिल हुई और फिर कभी बाहर नहीं निकली। माना जाता है कि उसमें सवार सौ से अधिक लोग अचानक गायब हो गए।

भारत में भी कई ऐसी ट्रेनों और स्टेशनों का क्रम मिलता है, जहां रात के समय अनजान ट्रेनें दिखने का दावा किया जाता है, खासकर पुराने और कम इस्तेमाल होने वाले रूट्स पर। रेलवे अधिकारियों के अनुसार, इनमें से ज़्यादातर घटनाएं अनवेरिफाइड हैं, लेकिन सवाल यह है कि इतने लोगों के अनुभव एक जैसे क्यों हैं? इस तरह की रहस्यकथाओं का बड़ा हिस्सा इंसानी अनुभव और दिमाग की व्याख्या में छिपा होता है। विज्ञान कहता है कि ऐसी कहानियों के पीछे कई वैज्ञानिक कारण होते हैं, न कि भूतिया कहानियां।

इन कारणों में एक होता है-

  • लो विजिबिलिटी (धुंध/अंधेरा), जिसके कारण अक्सर चीज़ें असली से अलग दिखती हैं। कई बार इन रहस्यकथाओं का कारण साउंड डिस्टॉर्शन (दूर की ट्रेन की आवाज़ पास की) लग सकती है। इसके बाद पैरिडोलिया सिंड्रोम के कारण दिमाग अपनी ही कहानियों की आकृतियां गढ़ लेता है।
  • कई बार हमारा दिमाग अधूरी जानकारी को पूरी कहानी में बदल देता है और यही कहानी डर बन जाती है। भारत जैसे देश में इस तरह की रहस्यकथाओं की बहुत ज्यादा गुंजाइश इसलिए भी होती है, क्योंकि हमारा रेलवे नेटवर्क और रिकॉर्ड सिस्टम बहुत विस्तृत है। हमारा कुल रेलवे नेटवर्क 70,000 किलोमीटर है और हर दिन लगभग 14,000 रेलगाड़ियां पटरियों पर दौड़ती हैं तथा लगभग 2.5 करोड़ के आस-पास यात्री स़फर करते हैं। इतने बड़े नेटवर्क में कोई अनरिकॉर्डेड ट्रेन का होना असंभव नहीं है।
  • रेलवे ऑपरेशंस विशेषज्ञ अधिकारी भी कहते हैं- आज के समय में हर ट्रेन की मूवमेंट डिजिटल सिस्टम में दर्ज होती है। इसलिए बिना रिकॉर्ड कोई ट्रेन चलना संभव नहीं है। आज अगर कोई यह बात कहता है तो कोरा भ्रम के अलावा कुछ भी नहीं है, लेकिन जब सब रिकॉर्ड मेंटेन रखना मैनुअल था, तब कुछ गफलत होने की गुंजाइश भले हो सकती थी। मनोवैज्ञानिकों के मुताब़िक- रात, सन्नाटा और अनिश्चितता ये तीन चीज़ें मिलकर दिमाग को कहानियां गढ़ने पर मजबूर करती हैं। जब हम डरते हैं, तो हमारा दिमाग सामान्य चीज़ों को भी असामान्य बना देता है।
  • जहां तक सवाल है कि ऐसी कहानियां क्यों ज़िंदा हैं तो मनोविज्ञानिक कहते हैं कि इनमें अनजाना डर है, क्योंकि ये अनुभव व्यक्तिगत और भावनात्मक होते हैं। हम सब कहीं न कहीं यह मानना चाहते हैं कि दुनिया में कुछ ऐसा है, जिसे हम पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं। इसलिए यदि कभी आप किसी सुनसान स्टेशन पर खड़े हों और दूर से आती पटरियों की हल्की-सी आवाज़ सुनें, तो एक पल के लिए रुकिएगा, क्योंकि हो सकता है कि वह एक सामान्य ट्रेन हो।

-एन.के.अरोड़ा

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