हैदराबाद से पत्रकारिता की मशाल रोशन रखने का उद्देश्य
आज़ादी के तत्काल बाद जब स्वतंत्रता सेनानी युद्धवीर जी ने हैदराबाद से मिलाप के प्रकाशन का फैसला लाहौर से दिल्ली आये अपने परिवार को सुनाया, तो यह घटना सबके लिए आश्चर्यचकित करने वाली थी। इसलिए भी कि यह काम बिल्कुल आसान नहीं था, लेकिन युद्धवीर जी फैसला कर चुके थे।
कुछ साल बाद जब उर्दू और हिंदी मिलाप की लोकप्रियता बढ़ने लगी और अनेक संकटों के बावजूद अख़बार का प्रकाशन निरंतर जारी रहा, तो इस पर भी चर्चा होने की लगी कि युद्धवीर जी ने हैदराबाद को क्यों चुना। युद्धवीर जी ने अपने संपादकियों, भाषणों और चर्चा गोष्ठियों में भाग लेने के दौरान इस बात को खुलकर स्पष्ट किया कि हैदराबाद ही एक ऐसी जगह है, जो पूरे देश के केंद्र में है। दक्षिण-उत्तर के बीच का संपर्क है और देश को यदि विभिन्न पहलुओं से जोड़ने की बात आती है तो इससे बेहतर शहर कोई और नहीं हो सकता।
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युद्धवीर जी ने हैदराबाद को केवल प्रकाशन का केंद्र नहीं बनाया, बल्कि इस शहर को इस तरह अपनाया, जैसे इससे सदियों से उनका संबंध रहा हो। यहाँ रहने वाले, उर्दू, हिंदी और तेलुगु भाषियों के साथ रिश्ते जोड़े, पंजाबी, गुजराती और हिंदी बोलने वाले समुदाय को एक करने के लिए पत्रकारिता के साथ-साथ सांस्कृतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठनों स्थापित किये।
चाहे वह छोटी-छोटी महफिलें हों या बड़े समारोह, आयोजनों की एक श्रृंखला तैयार की। मिलाप के नाम की तरह ही सब में मेल जोल का ऐसा माहौल बनाया कि आज तीसरी पीढ़ी तक उसमें किसी प्रकार की अव्यवस्था पैदा नहीं हो पायी। समुदायों को जोड़े रखने के लिए मिलाप निरंतर विरासत में मिली उस परंपरा को सींच रहा है।
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