आत्मिक शुद्धि और शांति का पर्व पुत्रदा एकादशी

तिथि मुहूर्त
सावन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि आज सुबह 11 बजकर 41 मिनट से शुरु हो रही है, जो 5 अगस्त, मंगलवार की दोपहर 1 बजकर 12 मिनट पर समाप्त होगी। उदयातिथि के आधार पर एकादशी का व्रत 5 अगस्त, मंगलवार को रखा जाएगा।
पारणा मुहूर्त
6 अगस्त, बुधवार की सुबह 5 बजकर 45 मिनट से सुबह 8 बजकर 26 मिनट तक।
द्वादशी समाप्ति 6 अगस्त, बुधवार की दोपहर 2 बजकर 8 मिनट पर।

हिंदू धर्म में पुत्रदा एकादशी का अत्यंत धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। यह एकादशी साल में दो बार आती है- पौष मास (जनवरी), सावन (जुलाई-अगस्त) के बीच पड़ती है। यह एकादशी का व्रत उन दंपतियों के लिए विशेष तौरपर फलदायी माना जाता है, जो संतानहीन हैं।

धार्मिक महत्व

इस दिन भगवान विष्णु के नारायण रूप की पूजा होती है। भक्त उपवास करते हैं। व्रत कथा सुनते हैं और रात्रि जागरण तथा भजन-कीर्तन करते हैं। शास्त्रां में उल्लेख है कि इस एकादशी को श्रद्धा से व्रत करने पर संतान की प्राप्ति होती है, विशेषकर उन दंपतियों को जिन्हें संतान नहीं हो रही होती। विष्णु पुराण और स्कंद पुराण में वर्णित है कि इस दिन व्रत रखने से पूर्व जन्मों के पापों का नाश हो जाता है।

पौराणिक

भद्रावती नगर में एक दंपत्ति रहता था, जिसका नाम सुपर्ण और शिव्या था। ये दंपत्ति संतानहीन थे, जिस कारण हर समय अत्यंत दुःखी रहते थे। संतान की प्राप्ति के लिए वह ऋषि-मुनियों से प्रार्थना किया करते थे। एक दिन ऋषियों के एक समूह ने शिव्या को श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत करने की सलाह दी।

इस दंपत्ति ने ऋषियों की इस सलाह के अनुसार विधिपूर्वक पुत्रदा एकदशी का व्रत किया। भगवान विष्णु उनकी पूजा से बहुत खुश हुए। कुछ समय बाद उन्हें एक तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई, जो आगे चलकर एक विद्वान और धर्मात्मा राजा बना।

सांस्कृतिक मान्यता

इस व्रत के पीछे की सांस्कृतिक मान्यता परिवार की समृद्धि के प्रतीक के तौरपर है। संतान का होना भारतीय संस्कृति में वंश और पंरपरा के प्रवाह का प्रतीक माना जाता है। पुत्रदा एकादशी व्रत इसी सामाजिक, सांस्कृतिक मान्यता से जुड़ी है।

सावन को भगवान शिव और विष्णु की भक्ति का महीना माना जाता है। इस माह की एकादशी में किया गया यह व्रत विशेष रूप से फलदायी होता है। वास्तव में यह व्रत भारतीय जीवनशैली की उस परंपरा को पुष्ट करता है, जहां संयम, नियम और ईश्वर भक्ति को जीवन सुधार का माध्यम माना गया है।

व्रत विधि

पुत्रदा एकादशी व्रत के एक दिन पहले से ही अपनी दिनचर्या को सात्विक कर लें। इस दिन खाने में ज्यादा नमक, मिर्च, तेल, खटाई और तामसिक चीजों का सेवन न करें। एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें।

भगवान विष्णु की पूजा करें। भगवान को तुलसी पत्र अर्पण करें। व्रत कथा सुनें। रात्रि में जागरण और भजन करें। द्वादशी को संभव हो तो जरूरतमंदों को भोजन कराएं, उसके बाद खुद भोजन करके व्रत का पारण करें।

आत्मिक शुद्धि का पर्व

पुत्रदा एकादशी को आत्मिक शुद्धि और शांति का पर्व कहा जाता है। यह व्रत हम भौतिक इच्छाओं से ऊपर उठकर शुद्ध अंतर्मन से करते हैं। इस व्रत में संयम व्रत और सेवा को ध्यान में रखा जाता है। इसमें खाने, बोलने, सोचने यहां तक कि देखने और सुनने तक में संयम रखा जाता है, जिससे मन शांत होता है और आत्मा का शुद्धिकरण होता है।

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इसमें सात्विक भोजन अनिवार्यता है, जिससे शरीर हल्का होता है और मन चंचलता से मुक्त होकर ध्यान योग्य बनता है। इस व्रत में मानसिक और आध्यात्मिक शांति का बहुत महत्व है। रात्रि में भगवान के मन का जाप करना और दान व सेवा जैसे पुण्य कर्म करने से कर्म की शुद्धता और पुण्य का संचार होता है। इसलिए पुत्रदा एकादशी सांसारिक विकारों से मन हटाकर ईश्वर के पास ले जाने का माध्यम है। इसलिए इसे आत्मिक शुद्धि और शांति का पर्व कहते हैं।

-आर.सी.शर्मा

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