प्रसाद रूप होती हैं पुरी के रथों की लकड़ियाँ (धर्म-ज्ञान)

ओडिशा के पुरी में आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर भगवान जगन्नाथ की रथ-यात्रा धूमधाम से निकल चुकी है। इस यात्रा में विशाल संख्या में भक्तों ने भगवान जगन्नाथ का रथ खींचा। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ का रथ खींचने से भक्त संकट, रोग और विकारों से मुक्त हो जाते हैं। भगवान जगन्नाथ का रथ हर साल सजाया जाता है। अक्सर मन में सवाल आता है कि रथ-यात्रा के बाद इन रथों में प्रयुक्त लकड़ी का क्या किया जाता है।

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प्रत्येक साल भगवान जगन्नाथ, बलराम जी और देवी सुभद्रा के लिए अलग-अलग रथ बनाए जाते हैं। जगन्नाथ जी के रथ को गरुड़ध्वज, बलराम जी के रथ को तालध्वज और माता सुभद्रा जी के रथ को दर्पदलन पद्म रथ कहा जाता है। इन रथों की ऊंचाई और पहियों की संख्या भिन्न-भिन्न होती है। भगवान जगन्नाथ के रथ में 16 पहिए, बलभद्र के रथ में 14 पहिए और सुभद्रा के रथ में 12 पहिए होते हैं। कुल मिलाकर 42 पहिए होते हैं, जिन्हें बहुत मजबूती के साथ बनाया जाता है।

प्रसाद और महाप्रसाद में उपयोग होती है रथ की पवित्र लकड़ी

रथ के कुछ हिस्सों की नीलामी यात्रा के बाद की जाती है। यह उन भक्तों के लिए सुनहरा मौका है, जो भगवान के रथ से जुड़ी कोई चीज पाना चाहते हैं। भगवान जगन्नाथ की ऑफिशियल वेबसाइट पर रथ के पहिए की नीलामी और बाकी चीजों से जुड़ी पूरी जानकारी दी गई है। रथ का पहिया सबसे खास होता है। इसकी शुरुआती कीमत 50,000 रुपये होती है। रथ के पवित्र हिस्सों को खरीदने के लिए भक्तों को आवेदन करना होता है।

मंदिर यह सुनिश्चित करता है कि इनका गलत इस्तेमाल न हो। रथ के पहिए निलाम किए जाते है और इसकी बची हुई लकड़ियाँ मंदिर में ही उपयोग में आई जाती हैं। कुछ लकड़ियाँ भक्तों में प्रसाद के रूप में वितरित की जाती हैं। शेष बची हुई लकड़ियाँ मंदिर में देवताओं के लिए बनने वाले महाप्रसाद के लिए उपयोग में लाई जाती हैं। रथ में लगी लकड़ी से ही भगवान का भोग बनता है। यह लकड़ियाँ नीम के पेड़ की होती हैं, जिन्हें शुभ-मुहूर्त और पवित्र स्थान से विधि-विधान पूर्वक लाया जाता है।

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