न गरीब रहेंगे और न गरीबी
देश के कुछ राज्यों में विधानसभाओं के चुनाव हो रहे हैं। हैदराबाद में एक निर्वाचन क्षेत्र में चुनावी माहौल है। जल्द ही प्रचार अभियान शुरू होंगे और बहुत से चुनावी मुद्दों में गरीबों की बात भी होगी। ग़रीबी के मुद्दे पर वर्षों से चर्चा हो रही है। यह मुद्दा तब भी उठा था, जब देश आज़ादी की 41वीं वर्षगांठ मना रहा था।
तत्कालीन आंध्र प्रदेश की एनटीआर सरकार ने जब गरीबों को सस्ते चावल देने की घोषणा की थी, तो मिलाप के संस्थापक और स्वतंत्रता सेनानी युद्धवीर जी ने यह मुद्दा उठाया था कि क्या केवल सस्ते चावल देने से गरीबी दूर होगी? न गरीब रहेंगे और न गरीबी रहेगी शीर्षक से 18 नवंबर 1988 को अपने संपादकीय लेख में उन्होंने प्रश्न उठाया था कि क्या केवल सस्ते चावल देने से गरीबी दूर होगी। लोगों को दाल, नमक, इमली, मिर्च, ईंधन और यहाँ तक कि पानी भी खरीदना पड़ता है।
इन चीज़ों की कीमतों में इतनी अधिक वृद्धि हुई है कि चावल सस्ते मिलने पर भी वे भरपेट खाना नहीं खा सकते।उन्होंने चेताया था कि सस्ती प्रसिद्धि पाने के लिए सरकारी ख़ज़ाने पर अरबों रुपये का बोझ डालकर हुकूमत कुछ देर के लिए गरीबों के वोट तो अवश्यक ख़रीद सकती है, किंतु इससे गरीबी तो हटेगी नहीं, गरीबी हटाने के लिए सरकार को ऐसा कोई रचनात्मक कार्य करना होगा, जिससे लोगों की आय में वृद्धि हो और उनके लिए आवश्यक वस्तुओं को महंगी होने से रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।
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युद्धवीर जी ने स्पष्ट किया था कि लोग गरीबी से तंग आकर जब आत्महत्या करने लगेंगे, तो इससे गरीबी खत्म नहीं होगी, हाँ गरीब आवश्यक खत्म हो जाएंगे।
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