उपराष्ट्रपति : उम्मीदवारी की रणनीति

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने उपराष्ट्रपति पद के लिए महाराष्ट्र के राज्यपाल सी.पी.राधाकृष्णन को उम्मीदवार घोषित कर एक बार फिर अपनी रणनीतिक सूझ-बूझ का परिचय दिया है। यह निर्णय न केवल राजनीतिक गणित और क्षेत्रीय संतुलन को दर्शाता है, बल्कि दक्षिण भारत -खासकर तमिलनाडु – में भाजपा की पैठ बढ़ाने की महत्वाकांक्षा को भी उजागर करता है।

सयाने याद दिला रहे हैं कि सी.पी.राधाकृष्णन का राजनीतिक सफर लंबा और विविधतापूर्ण रहा है। तमिलनाडु के प्रभावशाली गौंडर समुदाय (ओबीसी) से आने वाले राधाकृष्णन 16 वर्ष की आयु से आरएसएस से जुड़े रहे हैं। उन्होंने भारतीय जनसंघ की राज्य कार्यकारिणी के सदस्य के रूप में 1974 में अपनी राजनीतिक पारी शुरू की थी। कोयंबतूर से दो बार लोकसभा सांसद रह चुके राधाकृष्णन तमिलनाडु भाजपा के अध्यक्ष के रूप में भी अहम भूमिका निभा चुके हैं।

राधाकृष्णन की उम्मीदवारी: सामाजिक और क्षेत्रीय रणनीति

झारखंड और महाराष्ट्र के राज्यपाल के रूप में भी उन्होंने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया। उनकी यह पृष्ठभूमि उन्हें एक अनुभवी और सम्मानित नेता के रूप में स्थापित करती है, जो एनडीए के लिए उपराष्ट्रपति जैसे गरिमामय पद के लिए उपयुक्त है। दरअसल, राधाकृष्णन को उम्मीदवार बनाने के पीछे कई रणनीतिक कारण हैं। तमिलनाडु में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए भाजपा दक्षिण भारत में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती है।

तमिलनाडु में, जहाँ द्रविड़ दलों का वर्चस्व रहा है, भाजपा ने हाल के वर्षों में अपनी उपस्थिति बढ़ाने की कोशिश की है। तमिलनाडु के एक प्रभावशाली ओबीसी समुदाय से आने वाले राधाकृष्णन का चयन सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने का प्रयास है। यह कदम द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) जैसे क्षेत्रीय दलों के लिए चुनौती पेश करता है। राधाकृष्णन का विरोध करना उनके लिए सामाजिक और राजनीतिक रूप से जोखिम भरा हो सकता है न!

यह भी नहीं भूलना चाहिए कि राधाकृष्णन का आरएसएस से गहरा नाता रहा है। उनके चयन का सीधा संदेश है कि संघ की विचारधारा और उसके समर्पित स्वयंसेवकों को पार्टी में उच्च सम्मान देती है। साथ ही, यह विपक्ष के उस दावे को कमजोर करता है कि भाजपा सामाजिक न्याय और समावेशिता के प्रति उदासीन है। राधाकृष्णन का ओबीसी पृष्ठभूमि से होना विपक्ष के सामाजिक न्याय के एजेंडे को चुनौती देता है – खासकर तब जबकि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल ओबीसी जनगणना जैसे मुद्दों पर जोर दे रहे हैं।

यह भी पढ़ें… अलास्का की ठंड में गर्मजोशी का नाटक!

उपराष्ट्रपति चुनाव: राधाकृष्णन से NDA की रणनीति

कहना न होगा कि उपराष्ट्रपति चुनाव में एनडीए की स्थिति मजबूत है। लोकसभा और राज्यसभा में गठबंधन के पास 422 सांसदों का समर्थन है, जो 394 वोटों के वांछित बहुमत से कहीं अधिक है। इस संख्याबल के साथ राधाकृष्णन का निर्वाचन लगभग तय माना जा रहा है। भाजपा/एनडीए के इस फैसले के संभावित परिणामों की बात करें तो राधाकृष्णन का उपराष्ट्रपति बनना तमिलनाडु में भाजपा की छवि को नया आयाम दे सकता है।

यह दक्षिण भारत में पार्टी की स्वीकार्यता बढ़ाने और क्षेत्रीय दलों के एकछत्र वर्चस्व को चुनौती देने की दिशा में एक कदम होगा। साथ ही, राधाकृष्णन का संवैधानिक अनुभव भी राज्यसभा की गरिमा के सर्वथा अनुरूप है। बेशक, विपक्ष इसे आरएसएस के बढ़ते प्रभाव के रूप में प्रचारित कर सकता है, जिससे राजनीतिक ध्रुवीकरण और गहरा हो सकता है।

कुल मिलाकर, राधाकृष्णन की उम्मीदवारी का फैसला एनडीए की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है, जो सामाजिक समावेश, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और वैचारिक स्थिरता को संतुलित करता है। यह कदम न केवल तमिलनाडु बल्कि पूरे दक्षिण भारत में भाजपा की राजनीतिक ज़मीन को मजबूत करने की दिशा में एक मास्टरस्ट्रोक साबित हो सकता है।

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button