वेल्डिंग या वेडिंग
माली रामदयाल कार्ड देते हुये बोला- मेरे भाई की वेल्डिंग है। मैंने हैरानी से पूछा- वेल्डिंग? ये क्या है भाई? उसने कहा कि भाई की शादी है। मैंने उसे बताया शादी को वेडिंग कहते हैं। उसका जवाब था कि -वेडिंग-वेल्डिंग एक्के बात सै, दोनुआं का जोड़ण का काम सै। बस, यहीं मुझे समझ आ गया कि यह आदमी केवल पौधे नहीं उगाता, समाज की असली नब्ज भी इसी के पास है।
हम लोग तो अब शादी को डेस्टिनेशन साइट, फाइव-स्टार होटल, डीजे, कैटरिंग, प्री-वेडिंग शूट और इंस्टा-रील्स में खोजते हैं और यह माली एक ही वाक्य में पूरी वैवाहिक दुनिया का सार बता गया कि वेल्डिंग-वेडिंग, एक्के बात सै। सच भी है। आजकल की शादियों में प्रेम से ज्यादा वेल्डिंग का काम होता है।
जोड़ ढीला पड़ा तो रिश्ते टूटने में देर नहीं
लड़की की उम्मीदों को लड़के की सैलरी और कार, कोठी-बंगले से वेल्ड करना पड़ता है, ससुराल की शान को दहेज के वजन से जोड़ना पड़ता है, मेहमानों की प्लेट को कैटरर के बिल से फिट करना पड़ता है और फोटोग्राफर के पोज को दूल्हे की बची-खुची मुस्कान से वेल्ड करना पड़ता है। यदि एक भी जोड़ ढीला रह जाए तो अगले ही दिन दोनों परिवारों का बयान होता है- शादी में फलां वेल्डिंग ठीक ना थी, पकड़ टूटगी। काश! हर शादी में सच्चाई, सरलता और मजबूती की वेल्डिंग हो ताकि न रिश्ते ढीले पड़ें, न समाज टूटे और न पति-पत्नी हर साल वार्षिक सर्विसिंग की मांग करें।
वैसे भी आजकल जिस धड़ल्ले से तलाक के केस बढ़ रहे हैं, उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि जितना समय शादी की तैयारियों में लगता है, दुल्हा-दुल्हन की शॉपिंग में लगता है -उतना समय भी आजकल के लोग शादी तोड़ने का फैसला करने में नहीं लगाते। जितना समय शादी के लिए लड़का ढूंढने में लगता है, उससे भी कम समय में लड़का-लड़की फैसला कर लेते हैं कि अब साथ नहीं रहना है।
यानी ऐसा भी कहा जा सकता है कि दोनों में से कोई एक भी दुबारा सोचने तक के लिए राजी नहीं होता कि कैसे रिश्ते को बचाया जा सकता है? कैसे शादी के रिश्ते को एक और मौका दिया जा सकता है? कोई सोचने-समझने के लिए राजी ही नहीं होता। बस, एक बार कह दिया सो कह दिया। शादी को हमारी संस्कृति में पवित्र बंधन कहते हैं और इसके जन्म-जन्मांतर तक चलने की बात कही जाती है पर आजकल के माहौल में ये एक भी जन्म में चल जाए तो बड़ी बात लगती है।
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आज की शादी: भावनाओं से ज़्यादा जॉइंट और समझौते की इंजीनियरिंग
तभी तो लगता है कि शादी पूरी इंजीनियरिंग है। अगर सारे जॉइंट सही तो जिंदगी सही! वरना तिया-पांचा होने में देर नहीं लगती। वो जमाना कुछ और था जहाँ रिश्ते जरा-से फट जाते थे तो बहुएँ मन के छेद भी कपड़े की तरह बड़ी बारीकी से सी देती थी। अब तो एक भावनात्मक छेद हुआ नहीं कि पलक झपकते ही गायब! बाहर निकलने की कला ऐसी कि जैसे घर नहीं, हवाईअड्डे का रनवे हो और बहू ने मन में ही बोर्डिंग पास काट रखा हो। घर के बड़े समझ भी नहीं पाते कि गलती नमक में थी, लहजे में थी या किस्मत में पर बहू तो उड़ान भर चुकी होती है। पहले बहुएँ रफू करती थीं, अब रफू-चक्कर होती हैं।
रिश्ते मशीन नहीं कि पार्ट बदल जाए। रिश्ते कपड़ा नहीं कि फाड़कर नया ले आएँ। रिश्ते तो वही हैं जिन्हें टाँके डालकर, प्यार लगाकर, समझदारी से कमियों को अनदेखा कर, थोड़ा झुककर, थोड़ा हँसकर रफू किया जाता है और संभाल कर रखा जाता है। एक बर की बात है अक वेडिंग अर वेलडिंग का फर्क समझाते होये नत्थू बोल्या- वेलडिंग म्हं पहल्यां चिंगारी लिकडैं अर फेर गठबंधन हो ज्यै। वेडिंग म्हं पहल्यां गठबंधन हो सै अर फेर चिंगारियां सारी उमर लिकड़ती ए रहवैं।
शमीम शर्मा
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