हमने क्या सीखा है दावानल से?

याद कीजिए जब लॉस एंजेलेस (कैलिफोर्निया, अमेरिका) के जंगलों में लगी आग की भयावहता ने प्रकृति के रौद्र रूप के समक्ष मनुष्य और उसकी तमाम प्रगति की क्षण-भंगुरता का दुनिया को एक बार फिर बोध कराया था। इस भीषण दावानल ने कम से कम 25 लोगों की जानें लील लीं, 12,000 से अधिक इमारतें नष्ट या क्षतिग्रस्त हो गईं, लगभग 1,80,000 लोग विस्थापित हो गए। इस अग्निकांड के भयानक होने के कारणों पर विचार करें, तो जलवायु परिवर्तन मुख्य खलनायक प्रतीत होगा, जिसके लिए प्रकृति नहीं मनुष्य खुद ज़िम्मेदार है। मनुष्य जाति ध्यान दे या न दे, प्रकृति तो समय-समय पर खतरे से आगाह करती रहती है। बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण लंबे समय तक सूखा पड़ने और अधिक चरम मौसम की घटनाएँ और भी बड़े खतरे की पूर्वसूचनाएँ ही तो हैं! सयाने बता रहे हैं कि ये 100 मील प्रति घंटे तक की गति से चलने वाली मौसमी हवाएँ – सांता आना आग को तेजी से बड़े क्षेत्रों में फैलाती हैं।

लेकिन इसे भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि आग की कई घटनाओं के लिए आतिशबाजी जैसी मानव क्रियाएँ भी ज़िम्मेदार हैं। प्रकृति और मनुष्य की इस सामूहिक अग्नि-लीला में जीवन और संपत्ति का भारी नुकसान हुआ है। जाने कितने घर और व्यवसाय नष्ट हो गए। समझा जा सकता है कि धू-धू करती लपटों में स्थानीय अर्थव्यवस्था किस हद तक स्वाहा हो गई होगी। पर्यावरणीय नुकसान का अनुमान भी सहज है। बड़े क्षेत्र में प्राकृतिक आवास नष्ट हो गए। जैव विविधता का नुकसान हुआ। प्रकृति के संतुलन पर लगे ये घाव आसानी से भरने वाले नहीं। उससे जुड़ीं सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंताएँ भी कम नहीं हैं। आग के कारण वायु गुणवत्ता खराब हो गई है। श्वास रोगियों के लिए खतरा बढ़ गया है।

ये सब बातें यहाँ दोहराने का म़कसद कुछ अहम मुद्दों की ओर ध्यान दिलाना है। जैसे, इस दावानल ने दुनिया को दिखा दिया है कि जिन इलाकों में आग का खतरा हो, उनमें आवासीय क्षेत्रों का विस्तार इन आपदाओं को खुद बुलावा देने जैसा है। साथ ही, आग ने बिजली ग्रिड और जल आपूर्ति प्रणाली जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमज़ोरियों को उजागर किया है। कोढ़ में खाज यह कि प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती संख्या के कारण इन क्षेत्रों में बीमाकरण कठिन हो गया है। इससे आवास संकट पैदा हो सकता है।

ऐसे में कुछ उपाय बेहद ज़रूरी हैं। सबसे पहले तो, उन्नत वन प्रबंधन पर ध्यान देना होगा, ताकि जंगल की आग के लिए उपलब्ध ईंधन को कम किया जा सके। खतरे वाले इलाकों में अग्निरोधक सामग्री और डिज़ाइन की ज़रूरत वाले निर्माण नियमों को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए। बड़ी बात यह भी कि प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने के लिए बुनियादी ढाँचे को अपग्रेड करना होगा। बिजली लाइनों को मजबूत करना और अग्निशमन के लिए पर्याप्त जल दबाव सुनिश्चित करना बेहद ज़रूरी है। साथ ही, सार्वजनिक जागरूकता का महत्व भी जगज़ाहिर है। लोगों को आग के खतरों और आपातकालीन तैयारी के बारे में शिक्षित किया होता, तो शायद आग पर काबू पाने में इतना वक़्त न लगता और इतने लोग हताहत न हो पाते! कुल मिलाकर, इन आपदाओं के मूल कारणों को पहचानने, उनका समाधान करने और उनके प्रभाव को कम करने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की ज़रूरत है। वरना जलवायु परिवर्तन के प्रति लापरवाही इसी तरह जारी रही, तो वह दिन दूर नहीं, जब भू-मंडल पर हर दिशा में ऐसी ही ज्वालाएँ भड़केंगी! अंतत कवि अरविंद कुमार सिंहानिया के शब्दों में

दावानल में जो होकर फ़ना मर गए!
किसकी गलती से ये बेज़बाँ मर गए!!
आग ही आग फैली है चारों तरफ!
सारे बादल न जाने कहाँ मर गए!!

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