बुशहर बचा क्यों? पुतिन ठिठके क्यों? ईरान-इजराइल युद्ध /अंतर्कथा
21 जून को रात देर गये अमेरिका के बी-2 बमवर्षकों ने ईरान के तीन आण्विक ठिकानों को निशाना बनाया। फोर्दो, नतांज और इस्फहान के अलावा अरक के निर्माणाधीन रियेक्टर पर भी धावा बोला गया, लेकिन ऑपरेशन मिडनाइट हैमर के अंतर्गत बुशहर स्थित आण्विक ठिकाने को बख्श दिया गया। यह सोचना खामखयाली है कि इसे सदाशयतावश छोड़ा गया। स्तविकतता यह है कि दुष्परिणामों के आकलन ने इसे नेस्तनाबूद होने से बचा लिया। अमेरिकी धावे से इसके बचे रहने का एक बड़ा कारण रूस की चेतावनी को माना जा रहा है।
रूस ने आगाह किया था कि यदि बुशहर के ठिकाने पर हमला होता है, तो बड़े पैमाने पर रेडियोधर्मिता फैल सकती है, जिसका दुष्प्रभाव मध्य पूर्व के अनेक राष्ट्रों को झेलना पड़ेगा। रूस ने जब यह चेतावनी दी, तब हिरोशिमा और नागासाकी के हिबाकुशाओं का दर्द भले ही स्मृति में नहीं रहा हो, लेकिन उसके जेहन में सन् 1986 में उक्राइना में चेर्नोबिल में परमाणु संयत्र में विस्फोट और विभीषिका की याद ताजा थी।
रेडियोधर्मिता के खतरे से बुशहर की रक्षा
फारस की खाड़ी के मुहाने पर स्थित बुशहर का परमाणु-संयत्र ईरान का सक्रियतम रियेक्टर है। पत्तन-नगर के इस ठिकाने पर प्रहार का अर्थ था बड़े स्तर पर रेडियोधर्मिता का प्रसार। यह खतरा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर कहर बरपा सकता था। पानी में घुलकर यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड पानी को विषाक्त कर देता, जबकि सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, बहरीन, ओमान और कतर के करोड़ों लोग शुद्धिकरण के पश्चात पीने के पानी के लिये इन्हीं स्रोतों पर अवलंबित हैं।
ये देश प्राय: अमेरिका के मित्र राष्ट्र हैं और वहां उसके सैनिक अड्डे भी स्थित हैं। खाड़ी के पानी में जहर घुलने का सीधा अर्थ था मध्य पूर्व में त्राहि-त्राहि। बहरीन जहां शुद्धकृत जल पर शत-प्रतिशत निर्भर है, वहीं सऊदी अरब 50 प्रतिशत। कतर जहां मुख्यत: निर्भर है, वहीं कुवैत और कतर समेत कुछ राष्ट्रों के पास जल को शुद्ध करने की कोई सुविधा नहीं है। जाहिर है कि बुशहर पर बम वर्षा से उपजी रेडियोधर्मिता से मध्यपूर्व में रेडियोदग्ध हिबाकुशाओं का समूह तो पनपता ही, एक बड़ी आबादी के सम्मुख पीने के पानी का ऐसा अभूतपूर्व संकट उठ खड़ा होता, जिसका सामना करना संभव नहीं होता।
इस भयावह त्रासदी की आशंका बुशहर स्थित परमाणु ठाकने का कवच सिद्ध हुई और उसे जीवनदान मिल गया। 23 जून, सोमवार को ईरान के विदेश मंत्री अरागाची सर्वोच्च शासक खामेनेई के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन के नाम खत के साथ क्रेमलिन में थे। ईरान की दिक्कत यह रही कि अमेरिका खुलकर इजराइल के पक्ष में आ गया और ईरान को घुटने टेकने पर मजबूर करता रहा। यह कहना कठिन है कि रूस शरणागत ईरान का किस हद तक साथ देता, लेकिन घटपाम दर्शाता है कि वह खम ठोंककर ईरान के पक्ष में आने से कतराता रहा।
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पुतिन की भूमिका और तीसरे युद्ध की आशंका
रूस के इस असमंजस का जवाब पुतिन ने सेंट पीटर्सबर्ग में इंटरनेशनल इकोनॉमिक फोरम में बोलते हुये बखूबी दिया। पुतिन ने कहा कि आज इजराइल की आबादी में 20 लाख से अधिक लोग वे हैं, जो पूववर्ती सोवियत संघ से वहां गये हैं। इजराइल एक तरह से रूसी भाषी राष्ट्र और रूस के वृहत्तर इतिहास का एक अध्याय है। पुतिन ने कहा कि रूस की 15 फीसद आबादी इस्लाम की अनुयायी है और इस्लामी राष्ट्रों से रूस के मैत्रीपूर्ण संबंध हैं। वह इस्लामी सहयोग संगठन का पर्यवेक्षक भी है।
प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि बुशहर स्थित परमाणु-ठिकाने की स्थापना में भी रूस का उल्लेखनीय योगदान रहा है। संदर्भों से स्पष्ट है कि मामला पेचीदा था रूस के खुलकर ईरान के साथ आने का सीधा अर्थ होता तृतीय विश्वयुद्ध को न्यौता। एक इंटरव्यू में पुतिन ने उक्राइना के साथ अनुपातिक युद्ध की बात कही थी।

यह अकारण नहीं है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ टेलीफोनिक-वार्ता में उन्होंने ईरान और इजराइल के मध्य मध्यस्थता की पेशकश की, जिसे हठी ट्रंप ने ठुकरा दिया था। बहरहाल, तेहरान की गुहार क्रेमलिन तक पहुंची लेकिन इससे पेश्तर कि क्रेमलिन कोई बड़ा फैसला करता, दुनिया के स्वयंभू चौधरी यानि अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने युद्ध विराम का ऐलान कर दिया।
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